scorecardresearch

बीजद में बिखराव

उपचुनाव में हार और राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग से नवीन पटनायक की पार्टी की कमजोरी उभरकर सामने आई. पंचायत के स्तर पर नेताओं के पाला बदलने के साथ ही पार्टी नेतृत्व के फैसले पर उठने लगे सवाल

बीजद प्रमुख नवीन पटनायक मीडिया से बात करते हुए
अपडेटेड 7 अप्रैल , 2026

नवीन पटनायक मुश्किल में हैं. 5 मार्च, 2000 को उन्होंने पहली बार ओडिशा के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी. इसके बाद लगातार 24 साल तक वे इस पद पर बने रहे. अब वे विपक्ष में बैठने को मजबूर हैं. बतौर विपक्षी, पहले नुआपाड़ा विधानसभा उप-चुनाव और अब राज्यसभा चुनाव में चौथी सीट की हार ने नवीन पटनायक की पार्टी बीजू जनता दल (बीजद) के वैचारिकी कमजोरी को पूरी तरीके से बाहर कर दिया है.  

राज्यसभा चुनाव में बीजद के आठ विधायकों की हालिया क्रॉस-वोटिंग की घटना ने मार्च 2002 की यादें ताजा कर दी हैं, जब दिलीप रे की जीत को उस समय के मुख्यमंत्री पटनायक के लिए बड़ी शर्मिंदगी माना गया था. मार्च 2002 में करीब 15 बीजद विधायकों ने क्रॉस-वोटिंग की थी, जिससे उस समय शुरुआती दौर में मौजूद पार्टी पर पटनायक की पकड़ को लेकर गंभीर सवाल उठे थे.

हालांकि, 2002 का यह झटका उनको ज्यादा समय तक कमजोर नहीं कर पाया. इसके बजाए उन्होंने इस संकट का इस्तेमाल धैर्य और संगठनात्मक मजबूती के जरिए पार्टी में अनुशासन कड़ा करने के लिए किया.

दो दशक से ज्यादा समय बाद, 2026 का राज्यसभा चुनाव एक बार फिर दिलीप रे को विवाद के केंद्र में ले आया है. इस बार छह बीजद विधायकों के साथ दो निलंबित विधायकों ने भी पार्टी लाइन के खिलाफ वोट किया है. अब असली सवाल सिर्फ संख्या का नहीं, बल्कि नेतृत्व की प्रतिक्रिया का है. 2002 में पटनायक ने विश्वासघात की घटना को एक अवसर में बदलते हुए पार्टी की संरचना को मजबूत किया और अनुशासन को और सख्त किया. इस घटना ने अंतत: उनकी छवि एक ऐसे नेता के रूप में बनाई, जो झटकों को सहकर और मजबूत होकर उभर सकता है. मौजूदा क्रॉस-वोटिंग की घटना भी एक ऐसे ही निर्णायक मोड़ की तरह सामने आई है. 

आखिर बिखराव क्यों 
लेकिन बीजद के लिहाज से राजनैतिक मौसम बदल चुका है. पटनायक की ढलती उम्र और अगले नेता को लेकर चल रही उलझन के बीच कुछ खुलकर तो कुछ दबी जुबान, पार्टी के नेता यह कह रहे हैं कि आखिर पटनायक की वजह से हम अपनी राजनीति को क्यों खत्म कर लें. हालात ये हैं कि पहली हार मिलते ही वे बीजद को 'सिंकिंग बोट' मानने लगे हैं. 

आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? बीजद के रास्ते कांग्रेस पहुंचे नेता अमीय पांडव कहते हैं, ''नवीन पटनायक के पास कोई राजनैतिक प्रतिद्वंदी ही नहीं है. भला लड़ाई किससे करेंगे. उन्होंने भाजपा को कभी विपक्षी माना ही नहीं. वे आपस में सहयोग देते और लेते रहे. हार के बावजूद पार्टी के नेताओं को मोदी-शाह के खिलाफ बोलने की मनाही है. नेता अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं. जब तक अगले नेतृत्वकर्ता की तस्वीर साफ नहीं होती, बीजद हर दिन टूटती रहेगी.''  

हाल ही निलंबित विधायकों में से एक सौविक बिस्वाल कहते हैं, ''टूटती नहीं रहेगी, बल्कि टूट चुकी है. नवीन निवास में आग लगी हुई है. मेरे पिता तीन दशक से पार्टी से जुड़े रहे. खुद की संपत्ति बेच कर पार्टी को खड़ा किया है. लेकिन जब 'बीजू नवीन इंस्पिरेशनल फाउंडेशन' के गठन की वैधानिकता और उसमें बतौर अध्यक्ष वी.के. पांडियन और सचिव संतृप्त मिश्र की नियुक्ति पर सवाल किया, तो एक झटके में उन्हें पार्टी से निकाल दिया.'' वे यह भी कहते हैं, ''मैंने बीजद के कैंडिडेट को वोट न देकर अपने पिता के अपमान का बदला लिया है. बीजू पटनायक की लीगेसी को बढ़ाने का हकदार पांडियन और संतृप्त मिश्र जैसे आज आए लोग कैसे हो सकते हैं. अगर कोई है, तो वे दिलीप रे हैं.'' गौरतलब है कि दिलीप रे बीजद के संस्थापक सदस्यों में से एक रहे हैं.

क्या सचमुच सब कुछ इतना जल्दी बिखर जाएगा? पटनायक के राजनैतिक सचिव और हाल ही राज्यसभा के लिए चुने गए संतृप्त मिश्र कहते हैं, ''पतझड़ का मौसम है, कमजोर पत्ते गिरेंगे ही और नए पत्ते आएंगे. बीजद बहुत बड़ी पार्टी है. दो-चार लोगों के जाने से यह कहना कि पार्टी टूट चुकी है, अनुभवहीन व्यक्ति ही ऐसा कह पाएगा. आठ दस विधायकों और उनके समर्थकों के जाने से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला.

यह बात सही है कि चुनाव की हार को पचा पाना थोड़ा मुश्किल रहा है, लेकिन कार्यकर्ता अटूट हैं. जहां तक बात नेतृत्व की है, मध्य अप्रैल तक बहुत कुछ स्पष्ट हो जाएगा.'' इन सब के बीच बीजद के नेताओं को साफ संदेश मिला है कि या तो पटनायक के तय किए व्यक्ति को बतौर नेतृत्वकर्ता स्वीकारो, या फिर अपने लिए अलग राह देखो.

बिखराव जमीनी स्तर पर भी है. बीजद ने बीते 24 साल में ग्रासरूट स्तर पर कार्यकर्ताओं की मजबूत फौज तैयार की. यही वजह है कि राज्य के 80 फीसद से ज्यादा ग्राम पंचायतों या नगर निकायों पर बीजद समर्थित लोग ही काबिज हैं. लेकिन सत्ता हाथ से निकलते ही इस फौज के बिखरने की भी शुरुआत हो चुकी है. बीते एक साल में हर दिन किसी न किसी पंचायत में लोग बीजद छोड़ भाजपा का दामन थाम रहे हैं. टूट सीधे तौर पर राजनीति से प्रेरित न लगे, इसके लिए भाजपा ने रणनीतिक सेंधमारी की है.

राज्य सरकार ने ओडिशा पंचायत समिति लेखा प्रक्रिया (संशोधन) नियम, 2025 के मुताबिक ब्लॉक से जिला स्तर तक के अधिकारियों को अधिक वित्तीय अधिकार दे दिए गए हैं, जिससे वे निर्वाचित प्रतिनिधियों के काउंटर-सिग्नेचर के बिना ही बिल पास किए जा सकें. अब बीडीओ 20 लाख, इंजीनियर 5 लाख से 4 करोड़ रुपए तक की योजनाओं को बिना किसी पंचायत प्रतिनिधि के अनुमोदन या हस्ताक्षर के भी पास कर सकते हैं. अब व्यवस्था में खुद को बनाए रखने के लिए बीजद समर्थित पंचायत प्रतिनिधि भाजपा में शामिल हो रहे हैं.  

तय करना होगा विरोधी 
आने वाले दिनों में पूरी कवायद या यूं समझिए कि पार्टी को बनाए रखने की खातिर खुद के लिए एक मजबूत राजनैतिक विरोधी ढूंढ़ना होगा. वरिष्ठ राजनैतिक विश्लेषक रवि दास कहते हैं, ''बीजद को भाजपा के साथ अब तक चल रहे सहयोगात्मक विरोधी का रुख बदलना होगा. कांग्रेस को रिवाइव करने में अभी काफी वक्त लगेगा. ऐसे में उसको विरोधी बनाकर कुछ हासिल नहीं होगा.'' वे यह भी कहते हैं, ''दूसरी बात, पटनायक ने आज तक एकाध लोगों को छोड़कर किसी पर पूरा भरोसा नहीं किया. यही वजह है कि राज्य स्तर पर नेतृत्व करने वाला नेता नहीं मिल रहा.

गैर-ओड़िया व्यक्ति के भरोसे पार्टी चलाना तो दूर की बात, पार्टी बचा तक नहीं पाएंगे. तीसरी बात, हारने के बाद उन्होंने कहा था कि वे राज्य के सभी जिलों का दौरा करेंगे, लेकिन दो साल बीत गए, आज तक ऐसा नहीं हो पाया. उनके कार्यकर्ता अकेला महसूस कर रहे हैं. जनता को अभी भी बीजद से ही उम्मीद है.'' रवि दास की बात में दम है. बीते विधानसभा चुनाव में हारने के बावजूद पार्टी को 40.22 फीसद वोट मिले थे. जबकि भाजपा को 40.07 फीसद. 

इधर ओडिशा में बीजद के कार्यकर्ताओं और मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि वी.के. पांडियन के इशारे पर ही कुछ कहते या करते हैं. ऐसे में बीते तीन (विधानसभा, उप चुनाव और राज्यसभा) हार के जिम्मेदार वे भी हैं. अगर ऐसे में पटनायक अपना उत्तराधिकारी पांडियन को चुनते हैं, तो बीजद के लिए सत्ता में लौटना इतना आसान तो नहीं रहेगा.

इधर, नाराज विधायक व अन्य नेता अलग गुट बनाने को तैयार हैं. वक्त आने पर इसे मूर्त रूप देने से पहले फिलहाल ऐसे लोग भाजपा नेता विजय महापात्र के परोक्ष नेतृत्व और दिलीप रे के मार्गदर्शन में खुद को एकजुट रखने की कोशिश करेंगे. कोशिश यह भी है कि पांडियन और संतृप्त मिश्र विरोधी नेताओं, कार्यकर्ताओं की आवाज का यह मुख्य मंच भी बने.  

पूर्व में उपजे पार्टी के अंदरूनी संकट को अब तक अवसर में बदलते आए नवीन पटनायक फिलहाल अपने राजनैतिक जीवन के सबसे बड़े संकट से जूझ रहे हैं. संकट यह भी है कि कैसे बीजू पटनायक की विरासत को बीजद का प्रमुख अस्त्र बनाकर रखा जाए. क्योंकि जीत के बाद दिलीप रे ने साफ कहा कि बीजू पटनायक के साथ बिताए दिन पर वे एक किताब लिखने जा रहे हैं.

उन्होंने कहा, ''कैसे बीजू बाबू मुझे राजनीति में लेकर आए. मुझे बहुत-सी बातें पता हैं, जो शायद बहुत कम लोगों को मालूम हैं. मेरा मानना है कि अब समय आ गया है कि लोगों को इसके बारे में पता चले.'' जाहिर है, राजनीति में कुछ किताबें हंगामा लेकर आती हैं. 

Advertisement
Advertisement