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करोड़ों के घोटाले में थार रहा प्यासा

बाड़मेर में तीन साल पहले सामने आया पानी के टांकों के निर्माण में सैकड़ों करोड़ का भ्रष्टाचार, लेकिन सरकारी अनदेखी ने न सिर्फ इसे जारी रखा, बल्कि दुगना कर दिया

पानी के टांके सिर्फ जल संग्रहण की व्यवस्था ही नहीं, बल्कि जीवन की डोर हैं
अपडेटेड 1 अप्रैल , 2026

थार के रेगिस्तान में पानी का हर कतरा सांस की तरह कीमती होता है. यहां सदियों से पानी के टांके सिर्फ जल-संग्रहण की व्यवस्था ही नहीं, बल्कि जीवन की डोर माने जाते रहे हैं. यह अमानवीय ही है कि यह टांके सरहदी जिलों में भ्रष्टाचार का जरिया बने हुए हैं.

बाड़मेर, नागौर, जैसलमेर जैसे रेगिस्तानी जिलों में मनरेगा (अब वीबी-जी राम-जी) के तहत टांकों के निर्माण में सामने आए फर्जीवाड़े ने सरकारी योजनाओं की विश्वसनीयता पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है.

प्रदेश की भजनलाल सरकार ने जब बाड़मेर जिले में टांकों और अन्य विकास कार्यों की जांच करवाई तो करीब 1472 करोड़ रुपए की वित्तीय अनियमितताएं मिलीं. पता चला कि हजारों टांके या तो महज कागजों में बने या किसी और के बनाए टांकों को सरकारी योजना का बताकर भुगतान उठा लिया गया. 

बाड़मेर जिले की शिव तहसील के जोरानाडा गांव के निवासी बरकत खान और पीरान खान के नाम से मनरेगा योजना के तहत दो पानी के टांके स्वीकृत हुए थे. परिवार ने अपनी मेहनत-मजदूरी से टांके बनवा लिए. पर जब वे भुगतान लेने विकास अधिकारी के पास पहुंचे तो उन्हें पता चला कि उनके हिस्से का भुगतान तो छह महीने पहले ही किया जा चुका है.

दरअसल, पंचायत के सरपंच और ठेकेदार ने पीरान और बरकत के घर बने टांकों को मनरेगा योजना के तहत दिखाकर भुगतान उठा लिया. पीड़ित परिवार के मुताबिक, इस पर सरपंच का जवाब और भी चौंकाने वाला था: ''मैं अपना घर भरने के लिए सरपंच बना हूं या तुम्हारा? कहीं भी पैसे नहीं मिलेंगे.''

ऐसा ही एक मामला बाड़मेर की पादरिया पंचायत में सामने आया. यहां टांके सिर्फ फाइलों में बनाए गए. पंचायत ने पहले से मौजूद टांकों को ही नया निर्माण दिखाकर पूरा भुगतान उठा लिया. ग्रामीणों ने जिला कलेक्टर से शिकायत भी की, मगर अब तक सरपंच या ठेकेदार के खिलाफ ठोस कार्रवाई नहीं हुई है. स्थानीय निवासी कमलेश कुमार कहते हैं, ''पंचायत के कागजों में टांकों के निर्माण सहित जो भी काम बताए गए हैं, वे हुए ही नहीं हैं. प्रशासन ने हमें निष्पक्ष जांच का हवाला दिया मगर जांच भी फाइलों में रह गई.'' 

साल 2011 से अक्तूबर 2025 तक मनरेगा के तहत पानी की समस्या से निबटने के लिए 3 लाख रुपए प्रति टांका का बजट दिया जाता था. इसमें 1.20 लाख रुपए सामग्री खरीद के लिए और 1.80 लाख रुपए मजदूरी मद में मिलते थे. मौजूदा भजनलाल सरकार में ग्रामीण विकास मंत्री डॉ. किरोड़ी लाल मीणा को जब इस मामले की शिकायत मिली तो राज्य स्तरीय जांच कमेटी गठित की गई.

कमेटी ने 20 अक्तूबर, 2025 को अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी. इस में बाड़मेर जिले के 47 कार्यों की औचक जांच में ही 1,476 करोड़ रुपए की गड़बड़ियां सामने आ गई. जिले में करीब 5 लाख 8 हजार टांके ऐसे पाए गए जिनका निर्माण हुआ ही नहीं, लेकिन उनका भुगतान सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज है. जांच के दौरान कुछ मामले ऐसे भी मिले जिनमें जिस जगह टांका बताया गया था, वहां रेत के टीलों के अलावा कुछ नहीं था.  

हालांकि, इस फर्जीवाड़े की परतें तीन साल पहले ही खुलनी शुरू हो गई थीं. साल 2022-23 में तत्कालीन अशोक गहलोत सरकार के ग्रामीण विकास और पंचायतीराज विभाग ने मनरेगा में अधिक खर्च करने वाली ग्राम पंचायतों की जांच करवाई. अकेला बाड़मेर जिला ऐसा था जहां टांकों के निर्माण में 20 जिलों जितना पैसा खर्च कर दिया गया था. ऐसे में बाड़मेर जिले की धोरीमन्ना, आडेल, पायलाकलां, गिडा, रामसर, गुडामालानी, फागलिया और कल्याणपुर पंचायत समितियों में जाकर जब काम की असल स्थिति देखी गई तो 700 करोड़ रुपए से अधिक की अनियमितताएं सामने आईं. 

तत्कालीन ग्रामीण विकास मंत्री रमेश मीणा ने नोटशीट के जरिए इस मामले पर गंभीर आपत्तियां दर्ज करवाई थीं. इंडिया टुडे के पास मौजूद नोटशीट की कॉपी के मुताबिक, मीणा ने लिखा था कि करीब 750 करोड़ रुपए के कार्य महज कागजों पर हैं. 

मगर विडंबना यह कि इसके बावजूद ठेकेदारों को भुगतान और फर्जीवाड़ा बदस्तूर जारी रहा. यह सरकारी अनदेखी का ही नतीजा है कि फर्जीवाड़े की रकम आज बढ़कर 1,472 करोड़ रुपए तक पहुंच गई है. बात सिर्फ इतनी ही नहीं, साल 2022 से 2023 के बीच नागौर जिले में मनरेगा के तहत बने पानी के टांकों में अनियमितताओं के चलते संबंधित ठेका फर्मों का करीब 250 करोड़ रुपए का भुगतान रोक दिया गया था.

इसे लेकर नागौर के तीन विधायकों ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर भुगतान जारी करवाने का आग्रह किया. मुख्यमंत्री कार्यालय से 10 फरवरी 2023 को वित्त विभाग के सचिव के नाम से पत्र जारी कर 250 करोड़ रुपए का बकाया लौटाने के लिए कहा. इस पत्र के बाद पूरी राशि का भुगतान कर दिया गया.  

डॉ. किरोड़ी लाल मीणा ने इंडिया टुडे को बताया, ''जब मेरे सामने पूर्व मंत्री की वह नोटशीट आई, जिसमें करीब 750 करोड़ रुपए की अनियमितताओं का जिक्र था, तो मुझे यकीन ही नहीं हुआ कि पानी का भी इतना बड़ा घोटाला हो सकता है. मगर जब मैंने विभागीय टीम से इसकी विस्तृत जांच करवाई तो सामने आया कि यह फर्जीवाड़ा तो लगभग दोगुना है.''

मीणा ने आगे कहा, ''थार के प्यासे इलाकों के नाम पर जनता की गाढ़ी कमाई लूटी गई है. मैं साफ कर देना चाहता हूं कि इस मामले में चाहे कोई कितना ही प्रभावशाली क्यों न हो, बख्शा नहीं जाएगा.''

मामला बाहर आने के बाद अब राज्य सरकार ने छह राज्य स्तरीय जांच कमेटियों का गठन किया है जो बाड़मेर सहित जैसलमेर, नागौर व अन्य जिलों में मनरेगा योजना के तहत बनाए गए पानी के टांकों की विस्तृत जांच करेंगी. साथ ही, केंद्र सरकार ने नए टांकों के निर्माण पर रोक लगा दी है. सरकार के आदेश में कहा गया, ''केंद्रीय ग्रामीण विकास व पंचायतीराज मंत्रालय की एनएलएम (नेशनल लेवल मॉनिटरिंग) कमेटी की ओर से बाड़मेर टांकों के कार्यों की जांच कराई गई है जिसमें वित्तीय अनियमितताओं का खुलासा हुआ है और इन टांकों का कृषि एवं सिंचाई में कोई उपयोग नहीं हो रहा है.

चूंकि इससे मनरेगा योजना के उद्देश्य की पूर्ति नहीं हो रही है, इसलिए आगामी आदेशों तक टांकों के निर्माण पर रोक लगाई जाती है.'' हालांकि, आदेश जारी होने के कुछ दिनों तक विपक्ष ने इसे लेकर सरकार पर हमले किए. 

थार के रेगिस्तान में जहां पानी की हर बूंद जीवन बचाती है, वहां टांकों के नाम पर हुआ यह घोटाला सिर्फ आर्थिक अपराध ही नहीं, बल्कि उस भरोसे पर भी चोट है जिसके सहारे सरकारें रेगिस्तान की प्यास बुझाने के दावे करती रही हैं.

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