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ढह गए सपनों के घर

दशकों पहले जिन आदिवासियों की जमीनों को गैर-कानूनी तरीके से आम लोगों को बेच दिया गया था, वे अपने मालिकाना हक के लिए पहुंच रहे कोर्ट. जहां कई मकान पहले ही ढहा दिए गए, सैकड़ों अन्य पर पड़ रहा बुलडोजर का साया

रांची के मधुकम इलाके में बीती 11 फरवरी को आदिवासी जमीन पर गैरकानूनी रूप से बने कई घर ढहा दिए गए
अपडेटेड 1 अप्रैल , 2026

रांची के मधुकम इलाके में महादेव उरांव की जमीन को किसी अन्य व्यक्ति ने साल 1980-85 के दौरान गैरकानूनी तरीके से बेच दिया था. खरीदारों ने उस जमीन पर तीन मंजिला मकान तक बना लिए. वर्तमान तक यहां कुल 14 परिवार रह रहे थे. लंबी चली कानूनी लड़ाई के बाद, 11 फरवरी को हाइकोर्ट के आदेश पर इस जमीन पर बने 10 मकानों को तोड़ दिया गया.

इसी क्रम में कुछ और मकान भी तोड़े जाने थे, लेकिन निवासियों ने हाइकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और याचिका दायर कर महादेव उरांव के पक्ष में आए जमीन खाली कराने के फैसले को चुनौती दी. फिलहाल स्टे ऑर्डर लेकर आए मालिकों का कहना है कि उनके पास रजिस्ट्री से लेकर म्यूटेशन डीड जैसे तमाम कागजात मौजूद हैं.

साथ ही जमीन के सेटलमेंट को लेकर महादेव उरांव को दिए गए पैसों के लेनदेन से संबंधित सारे कागजात भी उनके पास मौजूद हैं. इस पेचीदगी के बीच, राज्य के हजारों गैर-आदिवासियों की नींद उड़ गई है, जिन्होंने बरसों पहले गैरकानूनी तरीके या धोखे में आकर आदिवासियों की जमीन पर मकान बना लिया है. 

झारखंड में इन दिनों ऐसे दावेदार सामने आ रहे हैं जिनकी जमीनों को 30-40 साल पहले सादे कागज पर हस्ताक्षर लेकर बेच दिया गया था. नियमत: जमीन उन्हीं की होने की वजह से कोर्ट का फैसले उनके पक्ष में आ रहा है और इन पर बने मकान तोड़ दिए जा रहे हैं. लगातार कोर्ट पहुंच रहे आदिवासियों के चलते रांची के विद्यानगर मोहल्ले में 400 से अधिक परिवारों पर फिलहाल तलवार लटक रही है.

मधुकम में जिनके घर तोड़े गए उनमें सुषमा देवी का घर भी शामिल है. वे कहती हैं, ''सब बर्बाद हो गया. मेरे ससुर इस जमीन को लेकर घर बनाए थे. हम यहीं ब्याह कर आए. पति रिक्शा चलाता है. नौ में से छह बेटियां शादी के लिए बची हैं. अब सिर से छत भी छिन गई.'' वहीं प्रमिला देवी आरोप लगाती हैं, ''जमीन का पैसा दो बार दिया गया, लेकिन जमीन मालिक ने धोखा दे दिया. परिवार में 15 लोग हैं. अब सबको लेकर कहां जाएं.''

राज्य में आदिवासियों की जमीन को सुरक्षित करने के लिए छोटानागपुर टेनेंसी (सीएनटी) ऐक्ट और संथाल परगना टेनेंसी (एसपीटी) ऐक्ट लागू हैं जिनके अंर्तगत क्रमश: 16 और 6 जिले आते हैं. सीएनटी ऐक्ट के तहत आने वाली जमीनों की खरीद-बिक्री केवल एक थाना क्षेत्र में रह रहे आदिवासी ही एक दूसरे के साथ (जिलाधिकारी के अनुमति से) कर सकते हैं.

इन नियमों को धता बताते हुए बीते पांच दशकों से राज्य में आदिवासी जमीन को गैर-कानूनी तरीके से गैर-आदिवासी बनाकर बेचा और खरीदा जा रहा है. इसके लिए जमीन दलाल कलकत्ता डीड (बंगाल विभाजन से पहले के बिहार, झारखंड और ओडिशा की जमीनों के दस्तावेज) की नकल कर पुरानी स्याही, मुहर, सिग्नेचर और कैथी लिपी के प्रयोग से फर्जी तरीके से आदिवासी जमीन को गैर-आदिवासी दिखाते हैं. इसमें जमीन दलाल से लेकर उच्च स्तरीय सरकारी अधिकारी शामिल रहते हैं. मकान भले ही तोड़े जा रहे हैं, लेकिन कभी किसी दोषी पर कार्रवाई नहीं हो रही है. इधर राज्य भर में आदिवासी जमीनों की घेराबंदी तोड़ रहे हैं. बीते दो महीने में ऐसे 60 से अधिक मामले सामने आए हैं. 

मुश्किलें और बढ़ेंगी 
राज्य में साल 1969 में स्थापित अनुसूचित क्षेत्र विनियमन (एसएआर) अदालतें गैर-आदिवासियों को अवैध रूप से हस्तांतरित जमीन को आदिवासियों को वापस दिलाने का काम करती हैं. राज्य के रेवेन्यू कोर्ट में जमीन से जुड़े कुल 56,441 केस पेंडिंग हैं, जिनमें एसएआर कोर्ट के कई मामले शामिल हैं. नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ स्टडी ऐंड रिसर्च इन लॉ रांची के प्रोफेसर रामचंद्र उरांव कहते हैं, ''सरकारी अधिकारियों ने गैर-कानूनी तरीके से आदिवासियों की जमीन का नेचर बदल दिया. सरकार ने उस पर नक्शा भी पास किया और टैक्स भी लिया.

अब कोर्ट मानवीय आधार पर कुछ समय के लिए स्टे लगा सकता है, लेकिन फैसला हमेशा जमीन के असली मालिक आदिवासी के पक्ष में ही आएगा.'' साल 2019 में सुभाष और गौतम मोदी नाम के बिल्डर 25 और 15 मंजिल की दो इमारतों का निर्माण लगभग पूरा ही करने वाले थे कि हाइकोर्ट ने असली मालिक तेतरा पाहन और जतरू पाहन के पक्ष में जमीन वापस करने का फैसला दे दिया.

निर्माण रोक दिया गया और मामला अब भी सुप्रीम कोर्ट में है. आदिवासी एक्टिविस्ट प्रेमशाही मुंडा कहते हैं, ''आदिवासियों की जमीन, जिसमें भुईंहरी, खुंटकटी, डाली कतारी आदि नेचर की जमीनों पर राज्यभर में कब्जा हो रहा है.'' मुंडा का दावा है कि पूर्व में जेल जा चुकी जैप-आइटी विभाग की सचिव पूजा सिंघल के परिजनों का एक बड़ा निजी अस्पताल भुईंहरी जमीन पर बना है. वे कहते हैं, ''सरकार को उसे भी गिराना होगा.'' 

लगातार कोर्ट पहुंच रहे आदिवासियों के चलते रांची के सैकड़ों परिवार बेघर होने की कगार पर

समाधान क्या है? 
पूर्व विधायक देवकुमार धान कहते हैं, ''हेमंत सरकार के दोनों कार्यकाल में आदिवासियों के जमीन-संबंधित विवादों के लिए तीन कमेटियां बनी. लेकिन आज तक एक ने भी रिपोर्ट पेश नहीं की.'' बीती 26 अप्रैल को ऐसे ही एक मामले की सुनवाई के दौरान हाइकोर्ट के चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की पीठ ने नाराजगी जताते हुए कहा, ''कमेटी पर कमेटी बनाने का कोई औचित्य नहीं है, जमीन पर ठोस कार्रवाई दिखनी चाहिए.''

हाइकोर्ट की वकील शालिनी साबू कहती हैं, ''एसटी लैंड को गैर-आदिवासी कभी खरीद ही नहीं सकते हैं. हां स्कूल, अस्पताल आदि बनाने के लिए विशेष परिस्थिति में सरकार जरूर ले सकती है.'' वे बताती हैं कि जिलाधिकारी अपनी शक्ति का बेजा इस्तेमाल कर बड़ी कंपनियों, धन्नासेठों और आम लोगों को भी जमीन हस्तांतरित करते रहे हैं. विडंबना यह है कि इसका खामियाजा आम लोग भुगत रहे हैं.

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