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बच्चे छोड़ें सोशल मीडिया

सिद्धारमैया और चंद्रबाबू नायडू ने बच्चों के बेरोकटोक सोशल मीडिया इस्तेमाल के खिलाफ उठाया पहला कदम

इलस्ट्रेशन: राज वर्मा
अपडेटेड 1 अप्रैल , 2026

अजय सुकुमारन

भारत में अब एक अरब इंटरनेट यूजर हैं. लेकिन सबसे ज्यादा आइटी प्रभाव वाले दो राज्य अब बच्चों में सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर चिंतन कर रहे हैं. कर्नाटक और आंध्र प्रदेश की लगभग एक जैसी घोषणाएं एक ही दिन, 6 मार्च को हुईं. कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने राज्य के 2026-27 के बजट में 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध का प्रस्ताव रखा; उनके समकक्ष, चंद्रबाबू नायडू ने विधानसभा में बताया कि 13 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया सीमित करने की योजना 90 दिन में लागू की जाएगी. 

भारत में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की बड़ी संख्या भविष्य की तरक्की की गारंटी के लिए बड़ी उपलब्धि है. लेकिन इंटरनेट को लेकर अभी तक जो भी अध्ययन हुए हैं, वह कोई अच्छी तस्वीर नहीं बताते हैं. 

दुनिया की चिंता
किसी भी राज्य ने यह नहीं बताया है कि वे कौन सा तरीका या मॉडल अपनाएंगे, लेकिन दोनों दुनिया भर में बन रहे माहौल के हिसाब से कदम उठा रहे हैं. दिसंबर, 2025 में ऑस्ट्रेलिया दुनिया का ऐसा पहला देश बन गया जिसने 16 साल से कम उम्र के लोगों के लिए फेसबुक, इंस्टाग्राम, टिकटॉक, एक्स, रेडिट और यू-ट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध लगाया. नियम न मानने वाले ऐसे प्लेटफॉर्मों पर भारी जुर्माना लग सकता है. तब से, डेनमार्क, ब्रिटेन, फ्रांस, स्पेन और कई अन्य देश या तो पाबंदियों पर विचार कर रहे हैं या उन्हें लागू कर चुके हैं. एक तरीका चीन का है जिसने नाबालिगों के लिए रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक स्मार्टफोन कर्फ्यू 2023 में लागू किया था. 

कर्नाटक के आइटी मंत्री प्रियंक खड़गे ने इंडिया टुडे को बताया, ''मुझे नहीं लगता कि हम इस पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा सकते हैं, लेकिन किसी को इसके नियमन की जिम्मेदारी लेनी होगी... कंटेंट, उम्र का सत्यापन वगैरह. इससे जुड़े सभी हिस्सेदारों—अकादमिक संस्थाएं, कानूनी जगत से जुड़े लोग, तकनीक के जानकार और मीडिया प्लेटफॉर्मों को शामिल किया जाए.'' उनका कहना है कि कर्नाटक दो मकसद से टास्कफोर्स कमेटियां बना रहा है—गवर्नेंस में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जिम्मेदार इस्तेमाल के साथ-साथ सोशल मीडिया नियमन पर सलाह देना. 

बेंगलूरू के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ ऐंड न्यूरोसाइंसेज (निमहांस) में 'शट' क्लिनिक के प्रमुख डॉ. मनोज कुमार शर्मा बताते हैं कि दोस्तों की सलाह और फोमो (फियर ऑफ मिसिंग आउट यानी अलग पड़ जाने का डर) इंटरनेट गेमिंग या सोशल मीडिया की आदत बनने की एक बड़ी वजह है. 'शट' संक्षिप्त नाम है जिसका मतलब है 'सर्विस फॉर हेल्दी यूज ऑफ टेक्नोलॉजी'. यह क्लिनिक बच्चों में इंटरनेट की लत के खिलाफ विशेष मनोवैज्ञानिक इलाज मुहैया कराता है. डॉ. शर्मा कहते हैं, ''अधिकतर माता-पिता इसलिए परेशान हैं क्योंकि उन्हें बच्चे की लाइफस्टाइल बदली नजर आती है'' सोने-जागने की अनियमित आदतें, कम शारीरिक गतिविधियां, अलग-थलग रहना.'' विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक 10 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए स्क्रीनटाइम एक घंटे और 11-17 साल के बच्चों के लिए दो घंटे से अधिक नहीं होना चाहिए.

बड़ों को भी इस मामले में मदद की जरूरत पड़ सकती है. शर्मा कहते हैं कि शट के एक ताजा अध्ययन में पाया गया कि अगर काम से जुड़े इस्तेमाल को भी शामिल किया जाए तो बड़ों में स्क्रीन का इस्तेमाल 8 से 12 घंटे के बीच था. ''इसलिए, अगर हमें बच्चों में हेल्दी इस्तेमाल को बढ़ावा देना है, तो बड़ों के इस्तेमाल पर भी काम करना होगा.'' वे कहते हैं कि मां-बाप के दखल के लिए परिवार के भीतर बातचीत को मजबूत करने की जरूरत है ताकि बच्चे साइबर-बुलीइंग या गलत कंटेंट जैसे मुद्दों पर खुलकर बात कर सकें.

बेंगलूरू की लॉ फर्म ट्राइलीगल में पार्टनर राहुल मत्थन, जो टेक्नोलॉजी लॉ के स्पेशलिस्ट हैं, कहते हैं, ''सभी इस बात पर सहमत हैं कि एक तय उम्र से कम के बच्चों के ऑनलाइन स्पेस पर नजर रखने की जरूरत है.'' हाल में अधिसूचित डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन रूल्स, 2025 के मुताबिक अगर बच्चे का पर्सनल डेटा शामिल है, तो माता-पिता या गार्जियन से मंजूरी जरूरी है. इस रोशनी में देखें तो कर्नाटक और आंध्र प्रदेश बस अगला कदम उठाते लग रहे हैं.

सोशल मीडिया पर यूजर की उम्र को वेरिफाइ करना भी एक चुनौती है. मत्थन का मानना है कि भारत इसकी टेक्नोलॉजी खोजने के लिए दूसरों से बेहतर स्थिति में है. वे कहते हैं, ''किसी दूसरे देश के पास इतने बड़े पैमाने पर डिजिटल पहचान नहीं है, जितनी हमारे पास है'' और सुझाव देते हैं कि प्राइवेसी की सुरक्षा करते हुए आधार नंबर में तारीख बताने वाले संकेत को उम्र के वेरिफिकेशन के डिजिटल टोकन में बदल दिया जाए. 

सतर्क कदम
लेकिन पहले दूसरे चीजें भी दुरुस्त करनी होंगी. इनमें एक पूरी तरह से लीगल-टेक्निकल है. सोशल मीडिया नेशनल ज्यूरिस्डिक्शन में आता है और यह साफ नहीं है कि राज्य इस पर कानून बना सकते हैं या नहीं. हालांकि शिक्षा—और इस तरह से स्कूलों में फोन का रेगुलेशन—उनके दायरे में आता है.

खड़गे मानते हैं, ''इसमें थोड़ा कन्फ्यूजन है,'' और कहते हैं कि इसीलिए कर्नाटक में प्रस्तावित रेगुलेशन पर होने वाली चर्चा में कानूनी विशेषज्ञ समेत सभी हिस्सेदार शामिल होंगे. उनका कहना है कि 'सावधानी से आगे बढ़ना' जरूरी है क्योंकि यह वैश्विक स्तर पर एक नया और अनजाना क्षेत्र है. खड़गे कहते हैं, ''हम ऐसी कोई अप्रत्याशित प्रतिक्रिया भी नहीं चाहते जिससे बच्चे बिना रोकटोक वाले सोशल मीडिया पर चले जाएं.''

अब जब आइटी के लिहाज से भारत के दो सबसे अनुभवी राज्यों ने पहला कदम उठाया है, उम्मीद है कि यह बहस जल्द ही देश भर में पहुंचेगी. 

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