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एसआइआर के साइड इफेक्ट

मतदाता सूची में संशोधन के चलते मतुआ समुदाय के बड़े पैमाने पर नाम कटे, जिससे भाजपा के लक्ष्य में विडंबनापूर्ण उलटफेर. वहीं तृणमूल कांग्रेस के अल्पसंख्यक वोट बैंक का भी बड़ा हिस्सा असमंजस की स्थिति में है

7 मार्च को कोलकाता में एसआइआर के विरोध में प्रदर्शन के दौरान मतुआ समुदाय के साथ ममता बनर्जी
अपडेटेड 1 अप्रैल , 2026

पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची की स्पेशल इंटेंसिव रीविजन (एसआइआर) प्रक्रिया के बाद भी लगभग 60 लाख नाम अधर में लटके हुए हैं. अगर जांच प्रक्रिया के बाद ये नाम बहाल नहीं हुए तो राज्य के मतदाताओं की संख्या 70,816,630 से घटकर 64,452,609 रह जाएगी यानी करीब 10 फीसद कम. यह संख्या 2021 विधानसभा चुनाव में तथाकथित 'थर्ड फ्रंट' को मिले वोटों से भी ज्यादा है. इतना बड़ा हिस्सा चुपचाप चुनावी गणित से बाहर हो जाए, यह आसान नहीं होगा. 

तनाव 8 मार्च को उस समय चरम पर पहुंच गया जब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की अगुआई में चुनाव आयोग की पूरी पीठ 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले तैयारियों की समीक्षा के लिए कोलकाता पहुंची. उसी शाम जब उनका काफिला शहर से गुजर रहा था, वामपंथी कार्यकर्ताओं ने काले झंडे दिखाकर 'गो बैक' के नारे लगाए. विरोध का सिलसिला अगले दिन भी जारी रहा, जब कुमार कालीघाट मंदिर में पूजा करने पहुंचे. इस बीच मुख्यमंत्री ममता बनर्जी 6 मार्च से धरने पर बैठी हुई हैं. उनका आरोप है कि चुनाव आयोग और केंद्र सरकार मिलकर बड़े पैमाने पर चुनिंदा मतदाताओं के नाम सूची से हटाने की कार्रवाई कर रहे हैं. 

एसआइआर ने पश्चिम बंगाल में जनसांख्यिकीय और राजनैतिक अनिश्चितताओं का पिटारा खोल दिया है. राजनैतिक दल अब इसे खुलकर मुद्दा बना रहे हैं. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने 28 फरवरी को अंतिम एसआइआर सूची जारी होने के बाद एक सार्वजनिक कार्यक्रम में कहा, ''असल मतदाताओं के नाम भाजपा और चुनाव आयोग ने जानबूझकर हटाए हैं. यह बेहद दुखद और अमानवीय स्थिति है.''

विडंबनापूर्ण पैटर्न
एसआइआर के आंकड़ों से तीन अलग-अलग पैटर्न उभर रहे हैं. पहला एक विडंबना को सामने लाता है. राज्य की 84 अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति विधानसभा सीटों में कुल मिलाकर 1.87 लाख से ज्यादा नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं. इनमें से करीब 1.32 लाख नाम उन सीटों से हटे हैं जिन्हें 2021 में भाजपा ने जीता था, जबकि तृणमूल कांग्रेस के कब्जे वाली सीटों से लगभग 54,600 नाम हटाए गए. यानी इन आरक्षित सीटों में हुई कुल कटौती का लगभग 70 फीसद भाजपा के गढ़ माने जाने वाले इलाकों में केंद्रित है.

दूसरे शब्दों में कहें तो जिन 20 आरक्षित सीटों पर सबसे ज्यादा नाम हटाए गए, उनमें से 14 सीटें पिछली बार भाजपा ने जीती थीं. आरक्षित सीटों से इतर, एसआइआर के तहत जिन 10 विधानसभा क्षेत्रों में सबसे ज्यादा नाम हटाए गए, उनमें से नौ सीटें 2021 में भाजपा ने जीती थीं.

इनमें दाबग्राम-फुलबाड़ी, बगदा, शांतिपुर, बोंगांव उत्तर, रानाघाट दक्षिण, रानाघाट उत्तर पूर्व, रानाघाट उत्तर पश्चिम, चाकदह और सिलीगुड़ी शामिल हैं. इन सीटों पर बड़े पैमाने पर नाम कटने से एक सीधा सवाल उठता है: क्या एसआइआर की प्रक्रिया अंतत: भाजपा के लिए ही उल्टा असर पैदा करेगी?

दोहरी बेदखली का डर
दूसरी बड़ी चिंता मतुआ बेल्ट को लेकर है. जिन सीटों पर सबसे ज्यादा नाम हटाए गए हैं, उनमें से कई पर मतुआ समुदाय का प्रभाव है. यह दलित समुदाय मूल रूप से शरणार्थी पृष्ठभूमि का है और वर्षों में बांग्लादेश से आकर यहां बसा है. बंगाल में पिछले दशक में भाजपा के विस्तार की रणनीति काफी हद तक इसी समुदाय के राजनैतिक ध्रुवीकरण पर टिकी रही.

भाजपा के वरिष्ठ नेता और विधानसभा में विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी ने समुदाय को भरोसा दिलाने की कोशिश की है कि जिन मतुआ लोगों ने नागरिकता के लिए आवेदन किया है या करेंगे, उन्हें नागरिकता मिलेगी और वे फिर से मतदाता सूची में शामिल हो जाएंगे. लेकिन समुदाय में भरोसा अभी पूरी तरह लौटता नहीं दिख रहा. बगदा, बोंगांव उत्तर, शांतिपुर और रानाघाट क्षेत्र, नदिया और उत्तर 24 परगना के उसी व्यापक मतुआ बेल्ट का हिस्सा हैं. यही इलाके 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों में भी भाजपा के मजबूत प्रदर्शन के केंद्र रहे थे.

अल्पसंख्यक
तीसरा रुझान तृणमूल कांग्रेस से जुड़ा है. पूरे प. बंगाल में 60,06,675 मतदाताओं को 'विचाराधीन' बताया गया है, यानी उनकी पात्रता की जांच सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर न्यायिक अधिकारी कर रहे हैं. जिन 10 जिलों में सबसे ज्यादा मतदाता जांच के दायरे में हैं, उनमें से नौ जिलों—मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना, उत्तर दिनाजपुर, पूर्व बर्दवान, हावड़ा, नदिया और बीरभूम—में मुस्लिम आबादी 40 से 90 फीसद के बीच है.

अकेले मुर्शिदाबाद में 11 लाख से ज्यादा मामले, मालदा में 8 लाख से अधिक, और उत्तर 24 परगना में करीब 6 लाख मामले दर्ज हैं. ये जिले बंगाल के अल्पसंख्यक वोट बैंक का केंद्र माने जाते हैं. तृणमूल के लिए इन जिलों में बड़ी संख्या में मतदाताओं का एडजुडिकेशन के दायरे में आ जाना एक गंभीर राजनैतिक जोखिम बन सकता है. अगर इनमें से कुछ भी वोट अंतत: सूची से बाहर रह जाते हैं या लंबे समय तक अनिश्चितता में फंसे रहते हैं, तो चुनावी गणित बदल सकता है. 

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