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मायने नीतीश की विदाई के

जद (यू) के महारथी के राज्यसभा की राह पकड़ने के साथ ही बिहार ऐतिहासिक सियासी हस्तांतरण का साक्षी बनता दिख रहा. इसे मंडल युग पर गिरते पर्दे के साथ भगवा युग की शुरुआत मानी जा रही है

राज्यसभा के लिए 5 मार्च को पटना में अपना नामांकन करते नीतीश कुमार केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी के साथ
अपडेटेड 25 मार्च , 2026

जनता दल (यूनाइटेड) के एक बड़े नेता की मेज पर रखे एक मोमेंटो पर लिखा था, '2025 से तीस, फिर से नीतीश'. जैसे ही इस संवाददाता की नजर उस मोमेंटो पर पड़ी उन्होंने झट से वह मोमेंटो हटवा दिया. इस नारे को इन दिनों जद (यू) दफ्तर के हर कोने से भी हटवा दिया गया है.

यह नारा कुछ ही महीने पहले हुए बिहार विधानसभा चुनाव में वोटरों को भरोसा दिलाने के लिए गढ़ा गया था कि नीतीश कुमार चुनाव जीतकर साल 2025 से 2030 तक मुख्यमंत्री पद को संभालेंगे.

इसका मकसद विपक्ष के उस आरोप को काउंटर करना था कि भाजपा के नेता नीतीश को सिर्फ चुनाव तक इस्तेमाल कर रहे हैं और जीत के बाद किसी अन्य शख्स को मुख्यमंत्री बनाया जाएगा. 

उस चुनाव में जद (यू) विधायकों की संख्या को 43 से बढ़ाकर 85 तक पहुंचाने वाला यह नारा इन दिनों पार्टी के लिए मुसीबत का सबब बना हुआ है. जमीनी कार्यकर्ता और समर्थक लगातार सवाल कर रहे हैं कि नीतीश को तो 2030 तक मुख्यमंत्री रहना था, फिर वे अचानक राज्यसभा क्यों जा रहे हैं? ये कार्यकर्ता जद (यू) दफ्तर में हंगामा और तोड़फोड़ कर रहे हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर पर कालिख पोत रहे हैं. वे मंत्रियों-विधायकों को आने-जाने से रोक रहे हैं. उन्होंने पिछले दिनों प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा के दफ्तर में भी घुसने की कोशिश की.

कई कार्यकर्ता दफ्तर के बाहर पोस्टर लगाकर नीतीश से अपने फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग कर रहे हैं. इस मांग ने पोस्टकार्ड अभियान का रूप ले लिया है. यह अभियान छात्र जद (यू) उपाध्यक्ष कृष्णा पटेल चला रहे हैं. वे कहते हैं, ''नीतीश जी ने जो सात निश्चय, पार्ट 3 का संकल्प लिया है, उनके जाने के बाद उस संकल्प का क्या होगा?'' वहां पोस्टकार्ड पर संदेश लिखकर मुख्यमंत्री आवास भेज रहे लोगों में जद (यू) कार्यकर्ता भी हैं और नीतीश के समर्थक भी. 

कैसे दबाव में आए नीतीश
पार्टी कार्यकर्ताओं को यह बात जम नहीं रही है कि 85 विधायकों, 12 लोकसभा और 4 राज्यसभा सांसदों का नेता, जिसके चेहरे पर महज तीन महीने पहले चुनाव लड़कर एनडीए जीता है, वह मुख्यमंत्री की कुर्सी क्यों छोड़ रहा है. कार्यकर्ता मानते हैं कि ऐसा उन्होंने भाजपा के दबाव में और अपने करीबी नेताओं की धोखेबाजी की वजह से किया है. इसलिए विरोध में वे कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा, केंद्रीय मंत्री ललन सिंह, मंत्री विजय कुमार चौधरी और नीतीश के करीबी संजय गांधी तथा ललन सर्राफ को गद्दार बताते हुए उनके खिलाफ भी नाराजगी जता रहे हैं.

जद (यू) नेता मानते हैं कि उनके इस गुस्से की वाजिब वजहें हैं क्योंकि 2 मार्च तक वे यही समझ रहे थे कि पार्टी की तरफ से कर्पूरी ठाकुर के पुत्र रामनाथ ठाकुर और नीतीश के पुत्र निशांत को राज्यसभा भेजा जा रहा है. इसकी पुष्टि श्रवण कुमार और अशोक कुमार चौधरी जैसे जद (यू) नेताओं के बयान से भी हुई थी, जब उन्होंने कहा था कि निशांत का राजनीति में आना तय हो गया है और होली के ठीक बाद वे पार्टी जॉइन करने वाले हैं.

मगर 3 मार्च को जब देर तक जद (यू) की तरफ से उम्मीदवारों की सूची जारी नहीं हुई, तो लोग आशंकित होने लगे. दरअसल, तब तक एनडीए की ओर से भाजपा और राष्ट्रीय लोक मोर्चा ने अपने उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी थी. अगले दिन होली और उसके अगले दिन राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन दाखिल करने की अंतिम तारीख थी.

3 मार्च की शाम मुख्यमंत्री आवास का माहौल बदलने लगा. बताया गया कि दिल्ली से कोई संदेश आया है, जिसके बाद मुख्यमंत्री काफी तनाव में हैं. उन्होंने अपने करीबियों से बताया कि उन पर पद छोड़ने का काफी दबाव है. फिर कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा को मध्यस्थता की जिम्मेदारी दी गई. इस बीच पार्टी और परिवार के करीबी लोगों ने मुख्यमंत्री को सलाह दी कि किसी दबाव में न आएं.

अगर छोड़ना ही है तो सब कुछ छोड़कर निकल आएं. अगली सुबह नीतीश के पुराने करीबी नेता बिजेंद्र प्रसाद यादव, उनके एक करीबी मित्र, पुत्र निशांत और कुछ अन्य लोग बैठे थे. कहा जाता है कि नीतीश ने लगभग मन बना लिया था कि अगर दबाव बढ़ा तो वे मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ देंगे. मगर जब संजय कुमार झा दिल्ली का संदेश लेकर आए तो नीतीश का मन बदलने लगा. बातचीत के बाद नीतीश ने अपने करीबियों से कहा कि अब फैसला हो चुका है. वे राज्यसभा जाएंगे. उसके बाद से यह उथल-पुथल मची है.

इस फैसले से क्या बदलेगा
इस फैसले को एक तरह से बिहार की राजनीति से नीतीश की विदाई के तौर पर देखा जा रहा है. 5 मार्च को नामांकन में शामिल होने आए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने नीतीश के परिचय में जो लंबा भाषण दिया, उसे एक तरह से विदाई भाषण के तौर पर देखा गया. यह माना जा रहा था कि दोनों के बीच नई सरकार को लेकर चर्चा हुई क्योंकि पिछली रात मुख्यमंत्री आवास में नीतीश ने अपने करीबियों के साथ इस मुद्दे पर लंबी बातचीत की थी.

शाह ने पटना के अपने इस संक्षिप्त दौरे में नई सरकार की घोषणा को टाल दिया. जानकार इसकी वजह जद (यू) कार्यकर्ताओं के असंतोष को मानते हैं. इस असंतोष को रोकने के लिए 6 मार्च को नीतीश ने पार्टी के सभी सांसदों और विधायकों की बैठक बुलाई और उनसे कहा कि राज्यसभा जाने का फैसला उनका है और वे उन्हें दिल्ली जाने दें. नीतीश के करीबी ललन सिंह ने मीडिया को यह भी बताया कि अगला मुख्यमंत्री वही बनेगा जिसे नीतीश चुनेंगे. जद (यू) कार्यकर्ता इन बयानों के बाद शांत होंगे या नहीं, यह देखने की बात होगी.

भाजपा युग की शुरुआत
ऐसा माना जा रहा है कि नीतीश के कुर्सी छोड़ने के बाद बिहार में भाजपा अपना मुख्यमंत्री बनाएगी और जद (यू) के हिस्से उप-मुख्यमंत्री का पद आएगा. कहा जा रहा है कि जद (यू) विधानसभा अध्यक्ष और गृह विभाग भी अपने खाते में चाहता है. मगर भाजपा अभी इन शर्तों पर राजी नहीं हुई है. इस तरह से 2005 के बाद से लगातार बिहार की सत्ता की धुरी बने रहने वाले नीतीश के युग का अब अंत होगा. बिहार में अब तक भाजपा का मुख्यमंत्री नहीं था, मगर अब नीतीश की विदाई के बाद यह रास्ता भी साफ हो गया है.

इस बारे में पूछने पर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी ने इंडिया टुडे से कहा, ''नई सरकार में अभी काफी वक्त है. वक्त आने पर उस बारे में चर्चा होगी. अभी तो राज्यसभा चुनाव होने हैं और उसके नतीजे आने हैं. नीतीश जी ने स्वेच्छा से राज्यसभा जाने का फैसला किया है, हम उनकी इच्छा का सम्मान करते हैं.''

माना जा रहा है कि सत्ता हस्तांतरण के सवाल को कम से कम 9 अप्रैल तक टाल दिया गया है, जब तक मौजूदा राज्यसभा सदस्यों का कार्यकाल है. जद (यू) कार्यालय में चल रहे विरोध के सवाल पर सरावगी कहते हैं, ''यह जद (यू) का आंतरिक मामला है. हम बस इतना कह सकते हैं कि जिन लोगों ने हमारे नेता मोदी जी की तस्वीर पर कालिख पोती है, वे एनडीए कार्यकर्ता नहीं हो सकते.''

 

जॉर्ज फर्नांडीस के साथ मिलकर समता पार्टी की शुरुआत

बिहार में अपना मुख्यमंत्री बनाने के लिए भाजपा 2015 से ही प्रयास करती रही है. 2015 में जद (यू) और राजद ने एक साथ चुनाव लड़ा था. तब भाजपा 2014 के करिश्मे को बिहार में दोहरा नहीं पाई. फिर 2020 के विधानसभा चुनाव में जद (यू) को सिर्फ 43 सीटें मिलीं मगर इस संभावना को देखते हुए कि नीतीश कभी भी राजद के साथ जा सकते हैं, भाजपा ने उन्हें मुख्यमंत्री का पद दिया.

इस चुनाव में नीतीश की सेहत का मसला उठा तो जद (यू) की तरफ से भाजपा को भरोसा दिलाया गया कि वे नीतीश के पुत्र निशांत को उनके उत्तराधिकारी के रूप में तैयार कर रहे हैं. यह तय था कि नीतीश सत्ता छोड़ेंगे मगर सत्ता का हस्तांतरण इतनी जल्दी होगा, यह अंदाजा किसी को न था. जद (यू) के भीतर तनाव की असल वजह यही मानी जा रही है.

इस बीच, विपक्ष भी हमलावर है. नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने कहा कि भाजपा ने पूरी तरह नीतीश कुमार को हाइजैक कर लिया है. अब वह इसी तरह जद (यू) को भी खत्म करेगी. वहीं, जद (यू) के लिए  '2025 से 30, फिर से नीतीश' का नारा तैयार करने वाले और खुद को नीतीश का वैचारिक समर्थक बताते रहे दुर्गेश का कहना है, ''नीतीश के इस फैसले से पार्टी फिर से 1996 की स्थिति में आ गई है.

अब उनके बदले जो भी जद (यू) को संभालेगा उसे अपनी शुरुआत वहीं से करनी पड़ेगी.'' टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान के पूर्व प्राध्यापक पुष्पेंद्र कहते हैं, ''यह बदलाव सिर्फ सत्ता का नहीं, सत्ता के मिजाज का भी होगा. नीतीश ने भाजपा के साथ रहते हुए भी अपनी सरकार में लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता के विचार को कमोबेश जिंदा रखा था. अगली सरकार किस मिजाज से काम करती है, यह देखने वाली बात होगी.'' जाहिर है, मुख्यमंत्री के रूप में नीतीश की विदाई के बाद बिहार एक नए दौर में दाखिल हो रहा है. 

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