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न्यायिक चौकसी में एसआइआर

बंगाल में मतदाता सूची से लाखों नाम हटाने से जुड़े लंबित विवादों के मामले में शीर्ष अदालत को अभूतपूर्व ढंग से देना पड़ा दखल

कोलकाता में चुनाव अधिकारी 27 दिसंबर को एसआइआर सूची पर काम करते हुए
अपडेटेड 19 मार्च , 2026

पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर) के बाद अंतिम सूची जारी किए जाने से महज चार दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने अपनी निगरानी का स्तर बढ़ाकर गंभीर की श्रेणी में कर दिया. सामान्यत: एक नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया में सीधे तौर पर न्यायिक हस्तक्षेप की यह दुर्लभ मिसाल थी.

24 फरवरी के इस आदेश ने मूलत: एसआइआर तंत्र की कुछ गंभीर कमियों को उजागर किया. यह मानते हुए कि प्रक्रिया विश्वास जगाने और लाखों विवादित दावों का समय पर समाधान पक्का करने में नाकाम रही है, देश के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने सेवारत और सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारियों की एक बड़ी टीम को प्रक्रिया में तैनात करने का आदेश सुनाया.

यह हस्तक्षेप महीनों से हो रही देरी और मुकदमेबाजी के बाद किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में 'तार्किक विसंगतियों' और 'अपुष्ट' मामलों को आधार बनाया गया है. अदालत के समक्ष पेश आंकड़ों के मुताबिक, डेटा डिजिटलीकरण और पुन: सत्यापन के दौरान करीब 1.36 करोड़ प्रविष्टियों को संदिग्ध पाया गया. इनमें करीब 45 से 50 लाख मामले, कुल मतदाताओं में करीब 7 फीसद, अभी अनिर्णीत हैं.

अंतिम सूची जारी करने की 28 फरवरी की समयसीमा नजदीक आने के बीच पीठ ने कहा कि मताधिकार की निष्पक्षता की रक्षा के लिए असाधारण कदम उठाने की जरूरत है.

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तृणमूल सांसद अभिषेक बनर्जी 3 फरवरी को दिल्ली में एसआइआर को लेकर आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस म

न्यायाधीशों की भूमिका बढ़ी
कलकत्ता हाइकोर्ट ने लंबित दावों की जांच के लिए हर जिले में तीन सदस्यीय न्यायिक पैनल गठित किए. न्यायिक अधिकारियों की छुट्टियां घटा दी गईं और ओडिशा तथा झारखंड हाइकोर्टों से अतिरिक्त तैनाती की मांग की गई.

अधिकारियों का कहना है कि राज्य के 294 विधानसभा क्षेत्रों में 150 से 294 सेवारत और सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को तैनात किया जा सकता है. प्रक्रिया को स्थानीय चुनौतियों से मुक्त रखने के लिए अदालत ने जिला कलेक्टरों और पुलिस अधीक्षकों को पूरी लॉजिस्टिक्स और सुरक्षा सहायता मुहैया करने का निर्देश दिया है.

चुनाव आयोग ने न्यायालय को सूचित किया कि विसंगतियां डेटा के डिजिटलीकरण के दौरान उपजी हैं, जिसमें वर्तनी, माता-पिता के नाम और पते को लेकर पुराने विवरण में विसंगतियां मुख्य हैं. उसने प्रक्रियात्मक कठिनाइयों को भी स्वीकारा और कुछ श्रेणियों के मामलों में सुनवाई को अस्थायी रूप से निलंबित कर नाम काटने से बचने के लिए उन्हें निर्णय लेने वाली श्रेणी में शामिल किया.

हालांकि, समयसीमा से पहले लंबित मामलों के भारी बोझ ने न्यायालय को हस्तक्षेप के लिए प्रेरित किया. अपनी मौखिक टिप्पणियों में पीठ ने कहा कि मानवीय या तकनीकी प्रक्रियाओं से होने वाली त्रुटियों के कारण मताधिकार से वंचित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती. पीठ ने कहा कि लक्ष्य चुनाव आयोग को हटाना नहीं, बल्कि निष्पक्षता, पारदर्शिता और तर्कसंगत प्रक्रिया सुनिश्चित करना है.

हालांकि, कोर्ट का इस तरह हस्तक्षेप करना असामान्य है लेकिन कानूनी जानकारों का मानना है कि अदालत का नजरिया संतुलित था. इसने राजनैतिक आरोपों पर टिप्पणी से परहेज किया और पूरी तरह संस्थागत जवाबदेही और ठोस उपायों पर ध्यान केंद्रित किया. लेकिन परोक्ष रूप से ही सही, इसकी वजह से पहले से ही कायम विवाद और गहरा गया. तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने कहा कि यह आदेश उसके इस आरोप पर मुहर लगाता है कि एसआइआर का इस्तेमाल भाजपा के फायदे के लिए किया गया. वहीं, भाजपा ने टीएमसी पर स्थानीय स्तर पर प्रक्रिया को बाधित करने का आरोप लगाया. 

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