वह क्या है जो अल्फांसो आम को वाकई अल्फांसो बनाता है—इसकी किस्म, इसका भूगोल या इसका इतिहास? यह सवाल उस विवाद के बीचोबीच है जो महाराष्ट्र और गुजरात के आम उगाने वाले किसानों के बीच चल रहा है.
विवाद उस वक्त पैदा हुआ जब वलसाड हापुस (अल्फांसो का दूसरा नाम हापुस है) के लिए जीआइ (जियोग्राफिकल आइडेंटिफिकेशन) टैग हासिल करने की कोशिश ने इस मशहूर फल के लंबे वक्त से केवल अपना होने के कोंकण के दावे को चुनौती दे दी.
जीआइ टैग कानूनी तमगा है जो किसी खास जगह से जुड़ी वस्तु की हिफाजत करता है, जबकि अल्फांसो का नाम 16वीं सदी के पुर्तगाली जनरल अल्फांसो डी अल्बुकर्क के नाम पर पड़ा था.
अल्फांसो को जीआइ टैग 2018 में मिला, जो महाराष्ट्र के पांच जिलों—सिंधुदुर्ग, रत्नागिरि, रायगढ़, ठाणे और पालघर—तक सीमित था. यहां के अल्फांसो उगाने वाले किसान इस टैग को इलाके की लैटेराइट या मखरैला मिट्टी, नमी, फूल आने के चक्र और सदियों से हो रही खेती की पहचान बताते हैं, जो इस फल को लजीज जायका देते हैं.
नवसारी कृषि विश्वविद्यालय के सहयोग से भारतीय किसान संघ (बीकेएस) ने 2022 में वलसाड हापुस के लिए जीआइ टैग का आवेदन दिया. सुनवाई के बाद अक्तूबर 2025 में कोंकण के अल्फांसो उगाने वाले किसानों ने इस पर ऐतराज जताया. पूर्व विधायक और देवगढ़ तालुका आंबा उत्पादक सहकारी संस्था मर्यादित के अध्यक्ष अजित गोगटे कहते हैं, ''हम इस कदम के खिलाफ हैं क्योंकि कोंकण में उगाए जाने वाले आम ही असली हापुस हैं. वलसाड में हापुस आम नहीं उगाए जाते और वहां के किसान इसे आम कह सकते हैं, हापुस नहीं.'' उन्होंने महाराष्ट्र सरकार से दखल देने का आग्रह भी किया.
कोंकण के किसान कहते हैं कि कर्नाटक और गुजरात के आमों की अक्सर गलत ब्रांडिंग की जाती है. अल्फांसो के गूदे से बने उत्पादों में सस्ते फल मिलाकर उन्हें रत्नागिरि या देवगढ़ के अल्फांसो बताकर बेचा जाता है. कोंकण हापुस आंबा उत्पादक आणि उत्पादक विक्रेता सहकारी संस्था रत्नागिरि के अध्यक्ष डॉ. विवेक भिडे कहते हैं, ''हम नहीं चाहते कि जीआइ टैग जेनरिक हो जाए.''
कानूनी विशेषज्ञ जीआइ कानून को और बारीकी से समझने की मांग करते हैं. वकील गणेश हिंगमिरे का कहना है कि महाराष्ट्र को व्यापक अल्फांसो (हापुस) टैग की बजाए रत्नागिरि अल्फांसो या देवगढ़ अल्फांसो सरीखे अलग जीआइ टैग की मांग करनी चाहिए. अलग-अलग जीआइ टैग से नवाजी गई गिर केसर और मराठवाड़ा केसर सरीखी मिसालों का हवाला देते हुए वे कहते हैं, ''हापुस एक वेराइटी है.''
यह दलील गुजरात के किसानों के तर्कों का सार है. जीआइ कानून भूगोल पर टिका है. रत्नागिरि हापुस, देवगढ़ हापुस और वलसाड हापुस जैसे इलाके के खास टैग की वकालत करते हुए किसान कहते हैं, ''हापुस के पहले लगाया गया प्रत्यय ही सबसे अहम है.'' फूल लगने के मौसम एक साथ नहीं आते और दो से तीन हफ्तों की बिक्री तथा उपयोग की अवधि के साथ वलसाड के आम कोंकण के बाजार में सेंध नहीं लगा सकते. वे कहते हैं, ''दोनों राज्यों के निर्यात का काम महाराष्ट्र के व्यापारी देखते हैं. मसला मार्केटिंग का है.''
विवाद का सियासी रंग
महाराष्ट्र में इस विवाद ने सियासी रंग ले लिया. विपक्षी महाविकास अघाड़ी के नेताओं का कहना है कि जीआइ टैग के दावे से उस ज्यादा बड़े पैटर्न की झलक मिलती है जिसमें भाजपा-शासित गुजरात महाराष्ट्र की संपत्तियों पर दावा ठोक देता है. भाजपा नेतृत्व वाले सत्तासीन गठबंधन का रुख ज्यादा नपा-तुला है.
मछली पालन मंत्री नीतेश राणे ने कहा कि कोंकण के सांसद यह मुद्दा केंद्र के समक्ष उठाएंगे, तो उद्योग मंत्री उदय सामंत ने किसानों के डर को यह कहकर कम किया कि रत्नागिरि और देवगढ़ अल्फांसो की प्रतिष्ठा कायम रहेगी. वहीं, बीकेएस का कहना है कि किसानों को एक-दूजे के खिलाफ खड़ा किया जा रहा. बीकेएस महासचिव आर.के. पटेल कहते हैं, ''हम अपने भाइयों से लड़ना नहीं चाहते.'' जाहिर है, दांव पर आम भर नहीं, नाम भी है.

