आप भले रोमियो हों और मैं जूलियट, लेकिन गुजरात में माता-पिता की सहमति जरूरी होगी. अगर गुजरात पंजीकरण अधिनियम 2006 में प्रस्तावित विवादास्पद संशोधन पारित हो जाते हैं तो ऐसा ही होगा. 21वीं सदी की दूसरी चौथाई में ये प्रेमी जोड़े के माता-पिता होंगे जिन्हें 'हां' कहना होगा. या, ज्यादा संभावना है कि वे 'ना' कहेंगे.
मसौदा विधेयक कहता है कि मर्जी से शादी के इच्छुक जोड़ों को माता-पिता के सरकारी पहचान पत्र आधिकारिक पोर्टल पर अपने संपर्क के ब्योरों के साथ अपलोड करने होंगे और रिकॉर्ड पर बताना होगा कि माता-पिता ने विवाह को मंजूरी दी है या नहीं. रजिस्ट्रार दफ्तर 10 कार्य दिनों के भीतर दोनों के माता-पिता को सूचना देगा. वह सारे दस्तावेजों की छानबीन भी करेगा. शादी आवेदन के 30 दिन बाद ही रजिस्टर हो सकेगी.
विधानसभा में उपमुख्यमंत्री और गृह मंत्री हर्ष सिंघवी ने इस कदम को 'लव जिहाद' पर लगाम कसने, धोखाधड़ी रोकने और महिलाओं को जबरदस्ती या छल-कपट से बचाने का उपाय कहकर सही ठहराया. पाटीदार और ठाकोर समुदायों से आने वाले तमाम पार्टियों के सदस्य सरकार से माता-पिता की मंजूरी के बिना होने वाले वैवाहिक गठबंधनों को हतोत्साहित करने के लिए निर्णायक कदम उठाने की मांग करते रहे हैं.
गुजरात से कांग्रेस की अकेली लोकसभा सांसद गेनीबेन ठाकोर कहती हैं, ''सोशल मीडिया के असर में जवान लड़कियां धोखे से ऐसे रिश्तों में फुसला ली जाती हैं जो उनकी जिंदगी बर्बाद कर देते हैं. बेटियों को तकलीफ उठाते देख माता-पिता और पूरा समुदाय बेबस महसूस करता है. यह कानून बेहद जरूरी है.''
लड़कियां चुन नहीं सकतीं
ग्रामीण गुजरात में महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर काम कर रही कार्यकर्ताओं का कहना है कि शिक्षा के बढ़ते स्तर और जमाने के ऑनलाइन संपर्क में आने की वजह से युवतियां अपनी मर्जी के खिलाफ शादी से इनकार कर रही हैं. ये कार्यकर्ता 'लव जिहाद' को बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया हौवा कहकर उसकी कलई खोलती हैं और बताती हैं कि 'परेशान करने वाले' बहुसंख्यक मामले महज उन जोड़ों के हैं जिन्हें जाति या समुदाय के बाहर शादी करने के लिए घर से भागना पड़ता है.
तमाम लफ्फाजी के बाद भी नया प्रावधान असल में अपने बताए गए उद्देश्य के उलट काम कर सकता है. इससे भागकर शादी करने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं, क्योंकि जोड़े राज्य से बाहर शादी रजिस्टर करवाना चुन सकते हैं जबकि घर में हताशा और उत्पीड़न बढ़ सकता है.
सोसाइटी फॉर विमेंस ऐक्शन ऐंड ट्रेनिंग इनिशिएटिव्ज इन गुजरात की पूनम कथूरिया कहती हैं, ''पितृसत्तात्मक समुदाय महिलाओं की अपनी पसंद चुनने की स्वायत्तता और आजादी के खिलाफ है, यहां तक कि तब भी जब उन्हें अपना साथी उसी समुदाय से चुनना हो. गांवों में लड़कियों को अब भी व्यापारिक वस्तु की तरह देखा जाता है.''
वे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे के इस आंकड़े का हवाला देती हैं कि 24.3 फीसद महिलाओं की 18 साल की कानूनी उम्र पूरी करने से पहले ही शादी हो जाती है. वे यह भी कहती हैं, ''यह किस किस्म की मान्यता है कि माता-पिता अपनी बेटियों के लिए सिर्फ अच्छे से अच्छा ही चाहते हैं? आंकड़े तो कुछ और बताते हैं.'' बातें कड़वी हैं लेकिन अनुभव से मिली सचाई से मेल खाती हैं, क्योंकि कथूरिया घरेलू बदसलूकी और 'साटा-पाटा' की दमनकारी प्रथा की शिकार महिलाओं को बचाने का काम करती हैं. साटा-पाटा लड़की के बदले लड़की देकर की जाने वाली शादी है जिसमें दुल्हन की सहमति का विचार शून्य होता है और जो अक्सर चीजों की अदला-बदली की तरह होता है.
डरावना साया
हैरानी कि यह विधेयक किसी भी उम्र के हरेक वैवाहिक बंधन को संदेह की नजर से देखता है और अंतरजातीय या अंतरधार्मिक विवाहों पर सरकार की निगरानी का डरावना साया डाल देता है. इससे निजी स्वतंत्रता और निजता के अधिकार को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा हो गई हैं और बालिगों के बीच पूरी रजामंदी से होने वाले विवाह को 'असंवैधानिक' ठहराए जाने का खतरा है. वकील आनंद याग्निक मानते हैं कि यह विधेयक बुनियादी संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन करता है और ''18 की उम्र में अगर कोई व्यक्ति अपराध करे तो उसे 'जुवेनाइल' यानी नाबालिग नहीं माना जाता. वे वोट दे सकते हैं, संपत्ति खरीद सकते हैं, वाहन चला सकते हैं, लेकिन उन्हें यह फैसला करने में असमर्थ माना जा रहा है कि वे किसके साथ जिंदगी बिताना चाहते हैं. यह बेहद गुस्सा दिलाने वाला है.''
जहां तक 'लव जिहाद' की बात है, सरकार ने 2021 में धर्म की स्वतंत्रता अधिनियम, 2003 को संशोधित करके उसमें शादी से जुड़े धर्मांतरण को शामिल किया था. 2003 का यह कानून राज्य में धर्मांतरण को नियम-कायदों के दायरे में लाने के लिए बनाया गया था. यह बल, धोखे या प्रलोभन से करवाए गए धर्मांतरण को आपराधिक ठहराता है और धर्म बदलने से पहले जिले के अधिकारियों को बताना जरूरी बना देता है.
संशोधन से 'शादी करके' या शादी के उद्देश्य से धर्म बदलने को गैरकानूनी माने जाने पर दंडनीय बना दिया गया, सजा बढ़ा दी गई, रिश्तेदारों को शिकायत दर्ज करने की मंजूरी दी गई, और यह साबित करने का भार आरोपी पर डाला गया कि उसने अपनी मर्जी से धर्म बदला था. गुजरात हाइकोर्ट ने इसके प्रमुख प्रावधानों और अंतरधार्मिक विवाह को संदिग्ध मानने वाले प्रावधानों पर रोक लगा दी. सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की और मामला वहीं अटका हुआ है. अब नया विधेयक प्यार की संवैधानिक वैधता को स्थगित कर देता है.

