राजधानी गंगटोक से लगभग 20 किलोमीटर दूर रांका में अनी मठ के पास लगाए गए अपने पेड़ों को देखने 37 वर्षीय मोहन गौतम लगभग हर महीने वहां जाते हैं. वे दरअसल यह जानने जाते हैं कि उनके बड़े बेटे प्रणव के नाम पर लगाए गए 108 पौधे अच्छी तरह से बढ़ रहे हैं या नहीं. गौतम ने लगाने के लिए फलदार पेड़ों को इसलिए चुना ताकि भविष्य में इनसे परिवार की आय में भी इजाफा हो सके. उसी के नजदीक स्थित रेशीथांग में उन्होंने अपने छोटे बेटे मुन्ना के लिए 108 और पौधे लगाए हैं जिसमें मौसम के साथ रंग बदलने वाले फूलों की किस्में हैं.
दरअसल, गौतम ऐसा करने वाले अकेले व्यक्ति नहीं है बल्कि पूरे सिक्किम में 'मेरो रुख, मेरो संतति' (मेरा वृक्ष, मेरी विरासत) पहल के माध्यम से घर-घर यही कहानी दोहराई जा रही है. इसके तहत किसी बच्चे के जन्म लेते ही उसके नाम पर 108 पौधे लगाए जाते हैं. फरवरी 2023 में इसकी शुरुआत हुई थी. उसके बाद से लेकर अब तक, इस योजना के तहत 9,234 नवजात शिशुओं का पंजीकरण हो चुका है. इसका सीधा-सा मतलब यह है कि अब तक इसके तहत 9,97,272 पौधे लगाए जा चुके हैं.
संवेदनशील पारिस्थितिकी वाले एक छोटे से हिमालयी राज्य में जन-भागीदारी से चलने वाली इस पहल का यह पैमाना दर्शाता है कि व्यक्तिगत जिम्मेदारी को बढ़ावा देने का प्रयास वाकई अपने मकसद में काफी कामयाब हो रहा है.
सरकारी अधिकारियों के मुताबिक इस पहल के पीछे विचार यही था कि वृक्षारोपण अभियान को यांत्रिक ढंग से न चलाया जाए. वन एवं पर्यावरण विभाग के प्रधान मुख्य वन संरक्षक और सचिव डॉ. प्रदीप कुमार इस संरक्षण को पारिवारिक जीवन की भावनात्मक संरचना का हिस्सा बनाने का एक सचेत प्रयास करार देते हैं. वे कहते हैं कि सिक्किमी समाज हमेशा से पहाड़ों, जंगलों, झीलों और झरनों को पवित्र मानता रहा है और यह कार्यक्रम उसी सोच-समझ से प्रेरित है. उनके मुताबिक, ''जन्म के समय वृक्षारोपण एक ऐसी पर्यावरणीय विरासत का निर्माण करता है जो बच्चे के साथ-साथ बढ़ती है.
इस पहल की एक और खासियत यह है कि इसमें आर्थिक प्रोत्साहन को भी शामिल किया गया है. 108 वृक्ष लगाने का काम पूरा होने, डिजिटली इसकी पुष्टि होने और भौगोलिक रूप से टैग किए जाने के बाद सिक्किम शिशु समृद्धि योजना के तहत बच्चे के नाम पर 10,800 रुपए का ब्याजयुक्त सावधि जमा खाता खोला जाता है, और यह एफडी बच्चे के 18 वर्ष के होने पर मैच्योर होगी. मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तमांग खुद परिवारों को अपने हस्ताक्षर वाला प्रमाणपत्र भेंट करते हैं. सावधि जमा की पासबुक पर भी उनकी तस्वीर अंकित रहती है.
ताकत 108 की
दरअसल, बौद्ध और हिंदू परंपराओं में गहराई से समाया अंक 108 समग्रता और निरंतरता का प्रतीक है. अधिकारियों का तर्क है कि सांस्कृतिक लिहाज से प्रभावशाली इस अंक का उपयोग कार्यक्रम को पर्यावरण नीतियों में अक्सर नजर आने वाली अमूर्तता से बचाता है. गंगटोक के संभागीय वन अधिकारी क्षितिज सक्सेना कहते हैं, ''हम हरेक वृक्षारोपण को चिह्नित करने के लिए बौद्ध ध्वज के पांच रंगों का इस्तेमाल करते हैं ताकि आध्यात्मिकता और सहभागिता की भावना को बढ़ावा मिल सके और लोग अपने वृक्षारोपण को पहचान सकें.'' रंगीन चिह्न परिवारों को अपने पौधों का पता लगाने में मदद करते हैं और पेड़ों के व्यापक आध्यात्मिक और सांस्कृतिक उद्देश्य की याद दिलाते हैं.
संरक्षक बने लोग
वन अधिकारी स्वीकार करते हैं कि वृक्षारोपण का दीर्घकालिक अस्तित्व हमेशा एक चुनौती रहा है. परिवारों को भावनात्मक और आर्थिक अधिकार सौंपकर राज्य प्रभावी तौर पर संरक्षण की जिम्मेदारी निचले स्तर पर हस्तांतरित कर रहा है. माता-पिता वृक्षारोपण स्थलों का नियमित दौरा करते हैं, जरूरत पड़ने पर पहरेदारी करते हैं और चराई या किसी तरह का नुक्सान न होने को पक्का करते हैं. इस तरह अक्सर किसी भी आधिकारिक गश्ती दल से कहीं ज्यादा सतर्कता से अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं. इससे पौधों के जीवित रहने की दर में भी सुधार होता है.
विशेषज्ञों का मानना है कि इस मॉडल में पारिस्थितिकी, संस्कृति और नीति निर्माण का दुर्लभ संगम है. दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) में विकास अर्थशास्त्री और वरिष्ठ प्रोफेसर महेंद्र पी. लामा इसे सरकार की स्वागतयोग्य पहल बताते हैं. साथ ही, प्रोफेसर महेंद्र इस बात पर भी जोर देते हैं कि सिक्किम की नाजुक पारिस्थितिकी को बनाए रखने के लिए आम लोगों की अधिकतम भागीदारी सुनिश्चित करना आवश्यक है. उनके मुताबिक, इस योजना की ताकत एक ऐसा सामाजिक मानदंड स्थापित करने में निहित है जहां पर्यावरण संरक्षण रोजमर्रा की जिंदगी का अभिन्न अंग बन जाता है. इसके पीछे कहीं न कहीं एक आर्थिक पहलू भी काम कर रहा है. कई माता-पिता फल या फूल देने वाली प्रजातियां चुनते हैं. आगे चलकर ऐसे पेड़ अतिरिक्त आय, चारा या मिट्टी के स्थिरीकरण और जल संरक्षण जैसी पारिस्थितिकी तंत्र वाली सेवाएं प्रदान करने में अहम साबित हो सकते हैं.
मेरो रुख, मेरो संतति को साल 2023 में दुबई में आयोजित संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (सीओपी-28) में सामुदायिक नेतृत्व वाली कार्रवाई की एक मिसाल के तौर पर दर्शाया गया था. लेकिन, इसका असल प्रभाव तो रांका और रेशीथांग सरीखी जगहों पर ही दिखाई देता है, जहां माता-पिता नियमित तौर पर उन जगहों पर जाते हैं जहां वृक्षारोपण किया गया होता है, ठीक उसी तरह जैसे वे अपने खेतों का मुआयना करते हैं. थोड़े बड़े हो चुके वृक्षों के बीच खड़े गौतम उनके बारे में उसी सुरक्षात्मक भाव से बात करते हैं, जिस तरह वे अपने बच्चों के प्रति रखते हैं. वे कहते हैं, ''ये वृक्ष अब मेरे बच्चों के समान हैं. जैसे मैं अपने दो बेटों को कोई नुक्सान नहीं होने देता, उसी तरह इन वृक्षों की भी रक्षा करूंगा.''

