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यहां भगवा दल सांसत में

अकाली दल में अरविंद खन्ना की वापसी ने भाजपा की पंजाब इकाई की कमजोरी को उघाड़कर रख दिया. उसमें भरोसेमंद चेहरों की कमी तो है ही, केंद्रीय रणनीति को स्थानीय हकीकतों से जोड़ने के लिए भी उसे मशक्क्त करनी पड़ रही

संगरूर में 15 फरवरी को शिरोमणि अकाली दल में लौटने पर अरविंद खन्ना का स्वागत करते हुए सुखबीर बादल
अपडेटेड 11 मार्च , 2026

अभी हाल तक भाजपा की पंजाब इकाई के उपाध्यक्ष पद पर रहे अरविंद खन्ना की चुपचाप घर-वापसी सामान्य सियासी दलबदल से कहीं ज्यादा मायने रखती है. उनका स्वागत शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष और बचपन के दोस्त सुखबीर सिंह बादल ने किया और वे उसी पार्टी में लौट आए जहां से 1990 के दशक में उन्होंने अपना सियासी करिअर शुरू किया था. बादल ने उन्हें संगरूर विधानसभा क्षेत्र का हलका प्रभारी बनाया. इसे 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले उन्हें इस जगह के लिए तैयार करने के तौर पर देखा जा रहा है.

खन्ना के जाने से भाजपा की राज्य इकाई में गहरी ढांचागत कमजोरी सामने आई: पार्टी में ऐसे नेता की कमी है जिसकी जनता में व्यापक स्वीकृति या भावनात्मक जुड़ाव हो. खन्ना कभी अकाली युवा नेता हुआ करते थे और बाद में कांग्रेस में गए. 2002 में वे संगरूर से विधानसभा में दाखिल हुए और 2012 में पड़ोस की धुरी सीट से सदन में पहुंचे. 2015 में उन्होंने विधानसभा से इस्तीफा देकर राजनीति से संन्यास का ऐलान कर दिया. मगर यह अस्थायी रहा. 2022 में वे भाजपा में शामिल हो गए और संगरूर से विधानसभा और लोकसभा के चुनाव लड़े, मगर हार गए.

शहरी-ग्रामीण बंटवारा
निजी बातचीत में खन्ना ने माना कि पंजाब की ग्रामीण पट्टी में भाजपा के सेंध न लगा पाने ने उनके फैसले पर असर डाला. नवंबर में गांव-देहात की तरन तारन विधानसभा सीट के उपचुनाव में भाजपा प्रत्याशी को महज 6,200 वोट मिले और उसकी जमानत जब्त हो गई.

मोटे तौर पर शहरी रुझान वाली भाजपा को ग्रामीण इलाकों में पकड़ बनाने में मुश्किल हुई और यही अक्सर चुनावी नतीजे तय करता है. उसकी रणनीति अपने हिंदू शहरी आधार को अलग-थलग किए बिना खुद को पंथ-समर्थक दिखाने पर टिकी लगती है.

यह नाजुक संतुलन है, खासकर जब पंजाब के पुराने जख्मों के साथ उसका जुड़ाव उथल-पुथल भरा रहा है. ये जख्म ऑपरेशन ब्लूस्टार और उग्रवाद से निबटने से लेकर 1966 में हुए राज्य के पुनर्गठन की लंबी छाया और हाल ही किसान आंदोलन और बेअदबी के विवाद तक फैले हैं. यहां तक कि चंडीगढ़ और नदियों के पानी को लेकर उठे विवादों से भी यही धारणा मजबूत हुई कि भाजपा की पकड़ राज्य की नब्ज पर नहीं है.

संगठन का जोर प्रमुख जाट चेहरों पर रहा है: रवनीत सिंह बिट्टू को लुधियाना हारने पर भी केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह मिली; राज्य अध्यक्ष सुनील जाखड़ अनिच्छा के साथ इस पद पर बने हुए हैं; और राज्यसभा सांसद सतनाम सिंह संधू. मगर दिल्ली के रणनीतिक गुणा-भाग और पंजाब की हकीकतों के बीच की खाई पाटने में इनकी अपनी सीमाएं हैं.

पाला बदलने के बाद खन्ना ने अकाली दल-भाजपा गठबंधन को फिर जिंदा करने की बात कही. इसके हिमायती जाखड़ और पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह भी हैं. पर आरएसएस के नेटवर्क या राज्य भाजपा के पुराने नेताओं के बीच इनका कोई खास असर नहीं. बादल खुद साख के संकट का सामना कर रहे हैं, जिससे कुछ पर्यवेक्षकों का कहना है कि भाजपा को चाहिए, वह अकेले अपनी ताकत बढ़ाए और बादल को फिर से पार्टी खड़ी करने दे.

केंद्रीय नेतृत्व और राज्य इकाई के बीच अलगाव बार-बार सामने आता रहा है. जाखड़ 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद से ही संगठन की बैठकों में शामिल नहीं हो रहे हैं. उस साल जुलाई में भाजपा ने पूर्व राज्य प्रमुख अश्विनी शर्मा को कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया, जबकि राज्य की राजनीति में ऐसी दोहरी व्यवस्था बहुत कम देखने को मिलती है. भ्रम और बढ़ गया जब महामंत्री (संगठन) एम. श्रीनिवासुलु के रूप में तीसरी धुरी उभर आई.

राज्य के नेताओं ने आरोप लगाया कि वे कोर ग्रुप से बातचीत किए बगैर जिला बैठकें आयोजित कर रहे हैं. तालमेल की कमी उस वक्त जाहिर हो गई जब मोगा में अमित शाह की प्रस्तावित रैली के लिए सौंपे गए काम 15 फरवरी को चंडीगढ़ में एक बैठक के दौरान विरोध के बीच वापस लेने पड़े. यह उसी दिन हुआ जब खन्ना बादल के साथ मंच साझा कर रहे थे.

नीतिगत संकेतों ने तस्वीर को और ज्यादा उलझा दिया. इनमें चंडीगढ़ के विधायी दर्जे और पंजाब विश्वविद्यालय में सुधारों से जुड़े प्रस्तावों से लेकर किसान यूनियनों को भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर चर्चाओं से जोड़ने की जद्दोजहद तक शामिल है. 2020-21 के किसान आंदोलन और अकाली दल के साथ टूट के बाद भाजपा अभी तक ऐसा संगठन खड़ा नहीं कर पाई जो स्थानीय फैसले अच्छे से ले सके.

इस अलगाव की झलक 6 फरवरी को संसद के बाहर हुई घटना से भी मिली. जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने बिट्टू को कथित तौर पर 'गद्दार' कहा, तो भाजपा ने फटाफट इस बात को सिखों की बेइज्जती कहकर पेश किया और पूर्व कांग्रेसी नेता के बचाव में समुदाय के अपने नेताओं को उतार दिया—मगर करीब सारे दिल्ली के थे. नजारा साफ था: दिल्ली के सिख नेता पंजाब के नेता का बचाव कर रहे थे, जबकि राज्य मोटे तौर पर खामोश ही रहा. इसमें कोई हैरानी की बात नहीं थी क्योंकि पंजाब के ग्रामीण सिखों के बीच बिट्टू की लोकप्रियता काफी कम है. 

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