scorecardresearch

यूरिया आपके द्वार

मध्य प्रदेश में लंबी कतारों में इंतजार करने के बजाए, किसान अब खाद की निश्चित मात्रा ऑनलाइन ऑर्डर कर सकते हैं

भोपाल की हुजूर तहसील में 18 फरवरी को एक सरकारी खरीद-बिक्री केंद्र से खाद ले जाते किसान
अपडेटेड 11 मार्च , 2026

मध्य प्रदेश सरकार ने आखिरकार एक ऐसी समस्या को सुलझाने की दिशा में कदम बढ़ा दिया है, जिसके बारे में उसका दावा है कि ऐसी कोई समस्या है ही नहीं. पिछले दिसंबर में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कृषि मंत्री एदल सिंह कंषाना ने राज्य में खाद का कोई संकट होने से इनकार किया और कहा था, ''मुझे एक भी ऐसा किसान दिखाओ जो उर्वरक की कमी के कारण अपनी फसल न उगा सका हो...'' इसके बावजूद कि बीते एक साल उर्वरक को लेकर संघर्ष और लूटमार मची रही. यहां तक, हाल ही में दो किसानों ने वितरण केंद्र के बाहर इंतजार करते हुए दम तोड़ दिया था.

मंत्री ने भले ही समस्या से इनकार किया, मगर उनका विभाग ई-विकास (ई-वितरण एवं कृषि उर्वरक आपूर्ति समाधान) नामक पहल को प्रायोगिक परीक्षण के तौर पर शुरू कर रहा था. ये परीक्षण पिछले साल जबलपुर, विदिशा और शाजापुर जिलों में शुरू किए गए. इसमें ऑनलाइन सुविधा के तहत किसान अपने आधार नंबर का उपयोग करके लॉग इन करते हैं और क्यूआर कोड के जरिए पूर्व निर्धारित मात्रा में उर्वरक खरीद सकते हैं.

यही नहीं, उन्हें अब किसी नजदीकी निजी या सरकारी केंद्र से उर्वरक की होम डिलिवरी का विकल्प भी मिलता है. यह तकनीक एग्रीस्टैक संचालित है, जो एक सरकारी डेटाबेस है. इसमें मौजूदा समय में राज्य के 94 फीसद किसानों की बोई फसलों और उनके स्वामित्व वाले कुल रकबे का ब्योरा दर्ज है. उर्वरक की मात्रा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आइसीएआर) की तरफ से अनुशंसित की गई है और अनुरोध के आधार पर इसे बढ़ाया भी जा सकता है.

कतार नहीं, बस क्यूआर कोड
कृषि सचिव निशांत वारवाडे के मुताबिक, पिछले साल लगभग 650 खुदरा विक्रेताओं के जरिए करीब 1.77 लाख किसानों ने इस सेवा का लाभ उठाया. इसका भू-स्वामित्व से ऑनलाइन जुड़ाव यह पक्का करता है कि ''सिर्फ असली किसान ही उर्वरक खरीदें.'' वैसे राज्य में बड़ी संख्या में काश्तकारों के लिए ऑफलाइन खरीद का विकल्प खुला रखा गया है.

उपलब्धता की कमी के अंदेशे में जमाखोरी के मुद्दे की ओर इशारा करते हुए वे कहते हैं, ''यह प्लेटफॉर्म छोटे, मध्यम और बड़े किसानों में कोई भेद नहीं करता. उर्वरकों का भंडार करने का अंतर्निहित लाभ (जो बड़े किसानों को मिलता था) अब खत्म हो गया है.'' उनका कहना है, ''हमारे आकलन से पता चला कि कुछ स्थानों पर वितरण संबंधी समस्याएं थीं, लेकिन वह समस्या काफी हद तक स्व-निर्मित थी.''

ई-विकास का असर भी तुरंत नजर आने लगा. विदिशा में उर्वरक को लेकर कानून-व्यवस्था से जुड़ी घटनाओं की संख्या 2024 में 12 से घटकर पिछले साल एक रह गई. शाजापुर (पांच से शून्य) और जबलपुर (आठ से एक) में भी यही स्थिति दिखी. उर्वरक बिक्री पर भी असर पड़ा, पायलट प्रोजेक्ट वाले जिलों में इस दौरान यूरिया की बिक्री नौ फीसद बढ़ी. इसका असर राज्य के दूसरे जिलों में भी पड़ा, जहां 22 फीसद की वृद्धि देखी गई. हालांकि, पायलट प्रोजेक्ट वाले जिलों में एनपीके (नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश) की बिक्री में छह फीसद की कमी आई. लेकिन बाकी जिलों में स्थिति 2024 जैसी ही रही.

अत्यधिक इस्तेमाल का नुक्सान
सरकार ने एक समस्या के समाधान के लिए कदम बढ़ाया है मगर अन्य समस्याएं बनी हुई हैं. उनमें सबसे गंभीर है एनपीके, यानी तीन पोषक तत्वों का अत्यधिक इस्तेमाल. कृषि उपज के मामले में किसी भी चीज का ज्यादा इस्तेमाल हमेशा अच्छा नहीं होता. मगर मध्य प्रदेश में प्रति हेक्टेयर एनपीके का इस्तेमाल कुछ वर्षों से लगातार बढ़ता जा रहा है जो 2001 और 2021 के बीच लगभग तीन गुना हो गया है. मसलन, आइसीएआर गेहूं में 90:60:40 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के अनुपात में एनपीके के इस्तेमाल की सलाह देता है.

मगर मध्य प्रदेश में 'देर से बुवाई वाली स्थितियों' यानी सबसे अच्छे गेहूं की उपज वाले क्षेत्र में किसान प्रति हेक्टेयर 110-120 किलोग्राम नाइट्रोजन का उपयोग कर रहे हैं. किसानों में यह गलत धारणा है कि ज्यादा खाद डालने से उपज भी ज्यादा होती है, जबकि विज्ञान के लिहाज से इसका कोई आधार नहीं. ऐसे हालात में अगर राज्य सरकार बिक्री की मात्रा घटाने का प्रयास करती है, तो पहले से ही नाराज किसान वर्ग और भी भड़क सकता है. ऐसे में आइसीएआर की तरफ से अनुशंसित मात्रा से ज्यादा उर्वरक इस्तेमाल करने वालों की पहचान करने और उन्हें जागरूक करने की योजना बनाई जा रही है.

मध्य प्रदेश के सभी जिलों में मौजूदा रबी मौसम के लिए यह पहल लागू की जा रही है और राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने की योजना प्रधानमंत्री के पास भेजी जा चुकी है, मगर इसे हाइकोर्ट में चुनौती दी गई है. कृषि आदान विक्रेता संघ की मांग है कि किसानों को सीधे दुकानों से खाद खरीदने की अनुमति दी जाए, जबकि आलोचकों का कहना है कि इस तरह का कदम जमाखोरी और कालाबाजारी को बढ़ावा दे सकता है. वैसे, याचिका पर अभी फैसला नहीं हुआ है मगर शायद इसका अस्तित्व ही इसका प्रमाण है कि इस पहल को और भी तेजी से लागू किया जाना जरूरी है. 

Advertisement
Advertisement