देहरादून के परेड ग्राउंड के नजदीक 8 फरवरी को जुटी भीड़ को देखकर लगता नहीं था कि उत्तराखंड को उसकी मासूमियत भरी नींद से झकझोरकर जगा देने वाले अंकिता भंडारी हत्याकांड को तीन साल बीत चुके हैं. या वाकई इस मामले ने अपना कानूनी सफर पूरा कर लिया, जिसमें कम से कम एक जाने-माने शख्स को सजा हुई.
फिर ऐसा क्यों था कि अंकिता न्याय यात्रा संयुक्त संघर्ष समिति सरीखे अर्थपूर्ण नाम वाली एक संस्था ने महापंचायत बुलाई, जो दरअसल अंकिता के लिए इंसाफ का कूच थी, और जिसमें विपक्ष के नेता, कार्यकर्ता और सिविल सोसाइटी के धड़े एक साथ आ गए? आम नागरिक उस वक्त आसपास इकट्ठा क्यों हो गए जब अंकिता के माता-पिता मंच से बोल रहे थे? सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में सीबीआइ की जांच की मांग को लेकर 11 फरवरी को पूरे राज्य में बंद क्यों किया गया?
इन सवालों के उत्तर जानने से पहले इस मामले पर दोबारा गौर करना मुनासिब होगा जिसने सवालों की झड़ी लगा दी. उसी से पता चलता है कि इस मामले ने राज्य के लोगों पर कितना गहरा असर डाला है, उत्तराखंड इस तरह बर्ताव क्यों कर रहा है मानो उसका नैतिक सुरक्षा कवच तार-तार हो गया हो और पुराने जमाने की कुलीनता के इर्द-गिर्द बुने गए समाज के तौर पर उसकी आत्मछवि ही दांव पर क्यों लगी है.
पूर्व सुरक्षा गार्ड और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता की बेटी अंकिता महज 19 साल की थी. 12वीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद वह कॉलेज जाना चाहती थी. मगर उसके पिता बरसों पहले रिटायर हो चुके थे और परिवार में पैसों की तंगी होने की वजह से वह ऋषिकेश के बाहरी इलाके के एक रिजॉर्ट में रिसेप्शनिस्ट का काम करने लगी. उसने यह नौकरी कुछ वक्त के लिए की थी ताकि घर का खर्च चलता रहे और शायद इस बीच वह बाद में कॉलेज की पढ़ाई के लिए पैसा भी जोड़ ले. वह इतने दिन भी नहीं जी पाई कि अपनी पहली तनख्वाह ले पाती.
सितंबर 2022 में अंकिता के लापता होने के छह दिन बाद पुलिस ने एक नहर से उसकी लाश बरामद की. जांचकर्ताओं ने कहा कि उस पर रिजॉर्ट के 'वीआइपी' मेहमानों को 'अतिरिक्त सेवाएं' देने का दबाव था, कुछ ऐसा जिसका उसने विरोध किया.
इसके बाद जो जनाक्रोश पैदा हुआ, उसने इस मामले को उत्तराखंड की राजनीति का केंद्रबिंदु बना दिया. मुख्य अभियुक्त रिजॉर्ट का मालिक पुलकित आर्य भाजपा के पूर्व मंत्री विनोद आर्य का बेटा था. पुलकित को मैनेजर सौरभ भास्कर और एक अन्य आदमी अंकित के साथ गिरफ्तार कर लिया गया. पुलकित ने झगड़े के बाद अंकिता को नहर में धकेल देने की बात कुबूल की. मई 2025 में कोटद्वार की अदालत ने इस तिकड़ी को दोषी पाया और तीनों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई. उससे पहले सितंबर, 2022 में ही भाजपा ने विनोद आर्य और उनके बड़े बेटे को पार्टी से निकाल दिया था.
मगर इनमें से कुछ भी मामले को खत्म नहीं कर सका. गिरफ्तारियों और धूमधाम से चले मुकदमे और दोषसिद्धि के बाद भी चुनिंदा भूल-चूकों और राजनैतिक बचाव और प्रभाव के आरोप सामने आते रहे, जिससे मामला सार्वजनिक विमर्श में जिंदा रहा. इन दावों के बाद कि भाजपा का एक बड़ा नेता इसमें शामिल रहा हो सकता है, अंकिता की हत्या के तीन से ज्यादा साल बाद अब यह मामला राजनैतिक चर्चाओं के केंद्र में लौट आया. आम तौर पर इस तरह के मामलों का धीरे-धीरे गला घोंट देने वाली खामोशी की सरकारी संहिता को धता बताते हुए दिसंबर के आखिर में सोशल मीडिया पर एक के बाद एक खुलासों के बाद नए कोण उभरकर सामने आए. हरिद्वार से भाजपा के पूर्व विधायक सुरेश राठौर की दूसरी पत्नी होने का दावा करने वाली उर्मिला सनावर ने फेसबुक पर एक लाइव सेशन किया और उसके बाद कई वीडियो पोस्ट किए.
खुलासों का खेल
यह सनसनीखेज सुर्खियों से पूरी तरह मुक्त नहीं था, क्योंकि उनकी क्लिप वायरल हो गईं, उर्मिला जान के खतरे का दावा करते हुए किसी अज्ञात जगह जा छिपीं, वहां से उन्होंने और भी क्लिप जारी कीं, और अपने खिलाफ (मूल दावों की सच्चाई को लेकर) दायर एफआइआर को इसका हिस्सा करार दिया. वे सिर्फ तभी लौटीं जब सरकार ने उन्हें सुरक्षा का भरोसा दिलाया. मगर उन्होंने जो दावे किए, वे इतने संगीन थे कि सभ्य समाज का गुस्सा एक बार फिर भड़क उठा. आखिर उनमें 'वीआइपी' शख्सियतों की मिलीभगत की तरफ इशारा जो किया गया था.
इस तरह जनवरी में विरोध प्रदर्शनों की नई लहर आ गई, जो अब 'उत्तराखंड बचाओ' आंदोलन के ज्यादा बड़े छत्र तले एकजुट हो रहे हैं. इस तरह के सामूहिक नैतिक आक्रोश का उमड़ना दिल्ली के निर्भया आंदोलन या कोलकाता के आरजी कर विरोध प्रदर्शनों की तरह था. मामले के ब्योरों से पता चलता है कि ऐसा क्यों हुआ: उनमें कहानी की मुख्य बातें एक जैसी हैं, जो मनहूस और मायूस करने वाली रंगतों में ढली हैं, और उनसे एक बार फिर पता चलता है कि आधुनिक माहौल में युवतियां किन खतरों से घिरी हैं, जिन्हें इस मामले में ताकतवर लोगों के शामिल होने के सीधे इशारों ने और ज्यादा बढ़ा दिया.
सनावर के वीडियो उत्प्रेरक बन गए. एक क्लिप में उन्होंने दोहराया कि अंकिता को इसलिए मार डाला गया क्योंकि उसने एक राजनैतिक नेता को, जिसे उन्होंने 'गट्टू' कहा, 'अतिरिक्त सेवाएं' देने से इनकार कर दिया था. दूसरी में उन्होंने एक ऑडियो क्लिप साझा की और दावा किया कि यह राठौर के साथ एक बातचीत थी, जिसमें उन्होंने इस मामले के सिलसिले में कथित तौर पर भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव और उत्तराखंड प्रभारी दुष्यंत गौतम का नाम लिया था. जवाब में राठौर ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की और आरोपों से इनकार करते हुए दावा किया कि ऑडियो क्लिप एआइ से जाली ढंग से बनाई गई थी. जल्द ही दोनों के खिलाफ आइटी कानून के तहत एफआइआर दर्ज कर ली गई.
जनाक्रोश के आगे घुटने टेकते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर धामी ने 9 जनवरी को मामले की सीबीआइ जांच के आदेश दे दिए. फरवरी के शुरू में सीबीआइ की विशेष अपराध शाखा ने जांच राज्य पुलिस से अपने हाथों में लेते हुए 'अज्ञात वीआइपी' के खिलाफ दिल्ली में विधिवत मामला दर्ज कर लिया. उसकी टीम 2 फरवरी को जांच शुरू करने के लिए उत्तराखंड पहुंच गई.
इससे उबाल शांत नहीं हुआ. मुख्यमंत्री को लिखी एक चिट्ठी में अंकिता के पिता वीरेंद्र भंडारी ने कहा कि उस कथित 'वीआइपी' की पहचान अभी सामने नहीं आई है. महापंचायत में उन्होंने और उनकी पत्नी सोनी देवी ने सीबीआइ की जांच की शर्तों को हल्का करने पर सवाल उठाए. उन्होंने जांच का दायरा बढ़ाने, सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त जज से निगरानी करवाने और मामले से जुड़े सभी कॉल रिकॉर्ड की छानबीन करने की मांग की.
विरोध प्रदर्शन इस मामले में पहले भी हुए, खासकर तब जब प्रशासन ने तुरत-फुरत 'बुलडोजर न्याय' प्रदान करते हुए हत्या के बाद रिजॉर्ट के एक हिस्से को ढहा दिया. यह कदम तब विवादों से घिर गया जब आरोप लगाए गए कि यह राजनैतिक सबूत मिटाने की कोशिश थी. संदेह साफ तौर पर हरे जख्म की तरह बने हुए हैं.
खास बातें
> अंकिता भंडारी ने 'अतिरिक्त सेवाएं' देने से इनकार किया, जिसकी वजह से उसकी हत्या कर दी गई
> सीबीआइ उस 'वीआइपी' की खोज में, जिसको कथित तौर पर मना करने की वजह से अंकिता की जान ली गई

