झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) 23 नवंबर, 2024 को दूसरी बार सत्ता में आई थी. वह भी अब तक की अपनी सबसे ज्यादा, कुल 34 सीटों के साथ. सियासी विश्लेषक तभी से कयास लगा रहे थे कि अब जेएमएम के विस्तार का वक्त आ गया है.
ठीक पांच महीने बाद, 14 अप्रैल, 2025 को रांची में पार्टी का 13वां महाधिवेशन हुआ. उसमें सबसे बड़ी बात यह निकल कर आई कि आने वाले वक्त में असम, ओडिशा, बिहार और बंगाल में जेएमएम का विस्तार किया जाएगा.
बिहार की ओर बढ़े कदम रुक गए. अब असम की बारी है. पहले राज्य के आदिवासी कल्याण मंत्री चमरा लिंडा को वहां के आदिवासियों का मन टटोलने भेजा गया. मुद्दे और मौके मुफीद दिखे. तब बीती 1 फरवरी को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने असम में कदम रखा. उन्होंने तिनसुकिया में ऑल आदिवासी स्टूडेंट्स एसोसिएशन ऑफ असम की ओर से आयोजित आदिवासी महासभा को संबोधित किया.
आखिर असम ही क्यों? जवाब असम के 825 चाय बागानों में है. वर्षों पहले, इन बागानों के संचालन के लिए देश के विभिन्न राज्यों से मजदूर लाए गए थे. तेजपुर विश्वविद्यालय से प्राप्त एक दस्तावेज के अनुसार, साल 1841 में पहली बार बिहार के छोटा नागपुर इलाके (अब झारखंड में) से मजदूरों को 'असम टी कंपनी' लाया गया. उसके बाद से यह सिलसिला 1960 तक जारी रहा.
इसमें अधिकतर उरांव, हो, मुंडा, संथाल और खड़िया जनजाति के आदिवासी मजदूर थे, जिन्हें असम में 'टी ट्राइब' कहा गया. अपने मूल प्रदेश में जो जनजाति थे, उन्हें यहां आजादी के बाद अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा न देकर ओबीसी बताया गया. दर्जे के हक की लड़ाई तब से जारी है.
अपनी पहली सभा में सोरेन ने दिवंगत गायक जुबिन गर्ग को याद करते हुए कहा, ''असम ऐसा राज्य है, जहां झारखंड, ओडिशा से अंग्रेज बंदूक के बल पर असम के चाय बागान में आदिवासियों को लेकर गए. आज यही लोग अपनी पहचान और हक की लड़ाई लड़ रहे हैं. आपकी लड़ाई के साथ हम लोग हैं और जरूरत पड़ी तो पूरे झारखंड के आदिवासी असम पहुंचेंगे.''
आदिवासियों के प्रमुख मुद्दे
क्या 'टी ट्राइब' असम के किसी आदिवासी नेता को छोड़ झारखंड के सीएम सोरेन में उम्मीद देख पाएंगे? ऑल आदिवासी स्टूडेंट्स एसोसिएशन ऑफ असम के महासचिव और डिब्रूगढ़ निवासी देबेन उरांव कहते हैं, ''भाजपा ने चाय बगानों में काम करने वालों की दैनिक मजदूरी 250 रुपये से बढ़ाकर 550 रुपये करने और वन पट्टा देने का वादा हमसे किया था. 1998 में कोकराझार में बोडो और आदिवासियों के संघर्ष में हमारे 8,000 से ज्यादा लोग मारे गए. बेघर हुए लोग आज तक शिविरों में रह रहे हैं. हमें उम्मीद है, हेमंत सोरेन इन सब मुद्दों पर न्याय दिलाएंगे.''
बीते विधानसभा चुनाव के दौरान प्रियंका गांधी चाय बगान मजदूरों के साथ दिखी थीं. उन्होंने वादा किया था कि दैनिक वेतन 550 रुपये कर दिया जाएगा. असम में जब कांग्रेस दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है, उससे उम्मीद क्यों नहीं. देबेन कहते हैं, ''भाजपा से पहले उन्हीं से उम्मीद थी. आखिर मिला क्या?''
कुल मिलाकर, एसटी का दर्जा, डेली वेज, वन पट्टा और विस्थापितों का पुनर्वास आदिवासियों के चार प्रमुख मुद्दे हैं जिनके सहारे सोरेन असम की राजनीति में पैर जमाना चाहते हैं. मगर प्रदेश के सीएम हिमंत बिस्व सरमा अभी से उनकी राह मुश्किल करने लगे हैं. दरअसल, असम सरकार ने नवंबर, 2025 को असम फिक्सेशन ऑफ सीलिंग लैंड होल्ड अधिनियम पारित किया गया था.
इसके तहत बीती 9 फरवरी से उन्होंने 'टी ट्राइब' को जमीन का पट्टा देना शुरू कर दिया है. पहले चरण में सरकार 125 चाय बगान वालों को जमीन का मालिकाना हक देगी. वहां प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मकान बनवाए जाएंगे. इसके लिए किसी सरकारी अनुमति की जरूरत नहीं होगी. नियम यह है कि हक मिलने के बाद वे 20 साल तक जमीन बेच नहीं सकेंगे.
यही नहीं, एसटी का दर्जा देने के लिए नवंबर, 2025 में ही ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स का गठन किया गया था. उनके प्रस्ताव पर 'टी ट्राइब', ताई ओहोम, कोच राजबंशी, चुटिया, मटक और मोरंग जाति को एसटी का दर्जा दिया जाए. इस प्रस्ताव को कैबिनेट से पारित कर गृह मंत्रालय को भेज दिया गया है. अगर आगामी चुनाव से पहले यह दर्जा दे दिया गया तो हेमंत सोरेन के तरकश में कोई तीर नहीं बचेगा. वैसे, जेएमएम उम्मीद लगाए बैठी है कि ऐसा चुनाव से पहले न हो.
सोरेन के लिए दूसरी मुश्किल असम में संगठन की गैरमौजूदगी है, जिसके सहारे असल लड़ाई लड़ी जाएगी. देबेन उरांव को फिर भी उम्मीद है. वे कहते हैं, ''हेमंत सोरेन की सभा के बाद हम विभिन्न आदिवासी समुदायों के बीच 50 से अधिक सभाएं कर चुके हैं. हमारे बीच से ही नेता, कार्यकर्ता और प्रत्याशी निकलेंगे.'' जेएमएम के सूत्र इस बात पर मुहर लगाते हैं. पार्टी के महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य कहते हैं, ''संगठन वहां पहले था, बीते वर्षों में थोड़ा कमजोर जरूर हुआ है, लेकिन खत्म नहीं हुआ है. दूसरी बात कि स्थानीय आदिवासियों में हमारी स्वीकार्यता है.
खासकर झारखंड से दशकों पहले वहां पलायन कर पहुंचे 'टी ट्राइब' के बीच जेएमएम की स्वीकार्यता है.'' सूत्रों के मुताबिक, हाल ही में आईपैक ने असम में एक सर्वे किया है, जिसकी रिपोर्ट की प्रतीक्षा जेएमएम कर रही है. यह बात तय है कि पार्टी पूरे दमखम और संसाधनों के साथ असम विधानसभा चुनाव लड़ने की तैयारी कर चुकी है. संभावना यह भी है कि प्रस्तावित बंगाल विधानसभा चुनाव को छोड़ असम में पूरा ध्यान लगाया जाए.
विस्तार या बदले की राजनीति
बीते झारखंड विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा ने शिवराज सिंह चौहान को चुनाव-प्रभारी और हिमंत बिस्व सरमा को सह-प्रभारी नियुक्त किया था. लेकिन नेतृत्व सरमा ही करते नजर आए. इस बार सरमा के राज्य में सोरेन की बारी है. असम सरकार के हाथों आदिवासियों के कथित शोषण को उजागर कर सोरेन और जेएमएम खुद को उनके पक्षधर के रूप में पेश कर रहे हैं.
इससे उन आदिवासी मतदाताओं के बीच समर्थन मजबूत हो सकता है, जो स्थानीय प्रशासन से उपेक्षित महसूस करते हैं. मगर यह देखना जरूरी होगा कि असम में सोरेन की इन राजनीतिक गतिविधियों को कांग्रेस का कितना साथ मिल पाता है. बिहार विधानसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन का हिस्सा होने के बावजूद सीट न मिलने का ठीकरा आरजेडी पर फोड़ा गया, यहां गेंद कांग्रेस के पाले में होगी.
असम में हेमंत सोरेन के बयानों का राजनीतिक महत्व कई कारणों से अहम माना जा रहा है. राज्य में 'टी ट्राइब' कुल आबादी का 17 फीसद हैं. यह समुदाय कुल 126 सीटों में से 40 पर उलटफेर करने की क्षमता रखता है. सोरेन को अपने शुरुआती चरण में ही ऑल आदिवासी स्टूडेंट्स एसोसिएशन ऑफ असम जैसे संगठन का साथ मिल गया है. मगर क्या 'टी ट्राइब' सिर्फ इसलिए एकजुट होकर सोरेन का साथ देगी कि उनके पूर्वज झारखंड से थे? 'टी ट्राइब' की मांगों के आधार पर यह माना जा सकता है कि वे सामाजिक और संवैधानिक अधिकारों के तौर पर भले ही कमजोर रहे हों, लेकिन राजनीतिक रूप से पूरी मजबूत हैं.
समुदाय के बड़े नेता, पूर्व केंद्रीय मंत्री और वर्तमान में राज्यसभा सदस्य रामेश्वर तेली कहते हैं, ''जिस संगठन का हेमंत सोरेन को साथ मिला है, उसमें क्रिश्चियन समुदाय के लोगों की बहुलता है. उनके साथ देने से भाजपा के प्रदर्शन पर कोई असर नहीं पड़ेगा, कांग्रेस पर भले ही पड़ जाए. हेमंत सोरेन वहां कुछ नहीं कर पाएंगे. दूसरी बात कि हेमंत सोरेन संताल जनजाति से हैं, असम में इस जनजाति की संख्या महज 0.1 फीसद के असापास है.'' ऐसे में पांव पसारने की उनकी उम्मीदों पर काले बादल मंडरा रहे हैं.

