युमनाम खेमचंद सिंह को हमेशा से कड़ी चुनौतियां पसंद रही हैं. 30 दिसंबर, 2025 की सुबह एक ताइक्वांडो ट्रेनिंग हॉल के अंदर 62 वर्षीय नेता करीने से बिछी मैट पर नंगे पांव खड़े थे, उनकी मांसपेशियां पूरी तरह तनी थीं. जब उनकी उम्र के लोग जोड़ों के दर्द और दवाइयों के सहारे जी रहे होते हैं, वे घंटों कड़ी ट्रेनिंग कर रहे थे.
कुछ समय बाद वे फिफ्थ-डैन ब्लैक बेल्ट के साथ बाहर निकले और सिओल स्थित ग्लोबल ट्रेडिशनल ताइक्वांडो फेडरेशन से यह सम्मान पाने वाले पहले भारतीय बन गए. कुछ दिनों बाद खेमचंद फिर सामने आए, जब वे उखरुल और कामजोंग की नगा पहाड़ियों से गुजरते हुए कुकी-जो गांवों और इंफाल से विस्थापितों को शरण देने वाले राहत शिविरों का दौरा करने पहुंचे.
ढाई साल से ज्यादा समय से मणिपुर जातीय आधार पर अलग-अलग हिस्सों में बंटा हुआ है, मैतेई लोगों को कुकी इलाकों में जाने की छूट नहीं है और कुकी इंफाल घाटी में नहीं जाते हैं. खुद एक मैतेई होने के नाते भाजपा विधायक ने वह कर दिखाया जिसकी हिम्मत उनके समुदाय के किसी और व्यक्ति ने नहीं की थी, राजनेताओं की तो बात ही जाने दीजिए.
खेमचंद ने 4 फरवरी को जब मणिपुर के 13वें मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली तो उन्होंने अपने राजनैतिक जीवन में एक और पड़ाव पार किया. वे राष्ट्रपति शासन के एक साल बाद पहले मुख्यमंत्री बने हैं. एक ऐसे राज्य में जहां 2023 के मध्य में भड़की जातीय हिंसा 260 से ज्यादा लोगों की जान ले चुकी है और करीब 60,000 विस्थापित हुए हैं. जाहिर है, हालात बदलने के लिए उनको बहुत मशक्कत करनी पड़ेगी.
मुख्यमंत्री के नाम पर सहमति बनाना भाजपा के लिए आसान नहीं रहा. बीरेन सिंह दावेदारी छोड़ने को तैयार नहीं थे लेकिन कुकी-जो समुदाय के किसी भी पार्टी विधायक ने उनकी वापसी का समर्थन नहीं किया, उन्हें मैतेई का साथ जरूर मिला. केंद्रीय नेतृत्व ने यह भी महसूस किया कि बीरेन या उनकी पसंद के किसी नेता को पद पर बैठाने से कुकी-जो नेताओं और सिविल सोसाइटी के साथ किसी भी तरह की सुलह की कोशिश परवान नहीं चढ़ पाएगी.
खेमचंद, बीरेन के मंत्रिमंडल में काम करते हुए भी उनके आलोचक रहे हैं. आरएसएस के करीबी और नगा और बीरेन की तरह खेमचंद ने भी सियासत की शुरुआत डेमोक्रेटिक रिवोल्यूशनरी पीपल्स पार्टी से की थी, जो केंद्र सरकार की तरफ से नगा विद्रोही समूह एनएससीएन (आइएम) के साथ 1997 के संघर्ष विराम को बढ़ाने के खिलाफ मैतेई आंदोलन से उपजी थी.
बीरेन सिंह 2002 में उसी पार्टी से विधायक चुने गए, जिसका बाद में उन्होंने कांग्रेस में विलय कर दिया. लेकिन खेमचंद ने इंतजार किया, खेल प्रशासन में अपने कौशल को निखारा और 2012 में सिंगजामेई से तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार के तौर पर पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ा. हालांकि उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा.
2013 में वे भाजपा में शामिल हो गए और 2017 में सिंगजामेई से जीते. 2022 में फिर चुने जाने के बाद वे मंत्री बने और कई अहम मंत्रालय संभाले. खेमचंद बाद में बीरेन के खिलाफ भाजपा के असंतुष्ट विधायकों में शामिल हो गए. 2024 में उन्होंने सार्वजनिक तौर पर बीरेन के इस्तीफे की मांग उठाई. 9 फरवरी, 2025 को सीएम के इस्तीफे से कुछ दिन पहले खेमचंद दिल्ली में थे और केंद्रीय नेतृत्व को आगाह कर रहे थे कि असंतुष्ट विधायक कांग्रेस के अविश्वास प्रस्ताव का समर्थन कर सकते हैं, जिससे सरकार गिरने का खतरा है.
कांगपोकपी से विधायक नेमचा किपगेन को डिप्टी सीएम बनाया गया है, वे इस पद पर पहुंचने वाली पहली महिला और पहली कुकी-जो नेता हैं. उनकी शादी थांगबोई किपगेन से हुई है, जो कुकी नेशनल फ्रंट के चेयरमैन हैं. कुकी नेशनल फ्रंट एक उग्रवादी समूह है जो 2008 से केंद्र सरकार के साथ सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशंस समझौते में शामिल है. माओ से नगा पीपल्स फ्रंट के विधायक लोसी दिखो दूसरे डिप्टी सीएम बने हैं. मणिपुर के तीनों मुख्य समुदायों को शामिल करने से एक संतुलन और समावेश का संकेत मिलता है. हालांकि खेमचंद के कार्यकाल का सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या बीरेन सिंह की लॉबी उन्हें आसानी से शासन करने देगी?
चुनौतियां बड़ी-बड़ी
> 260 से ज्यादा मौत, विस्थापन और गहरे जातीय विभाजन से जूझते राज्य में शांति बहाल करना
> राजमार्ग फिर से खोलना, चेकपॉइंट हटाना, उग्रवादियों को निशस्त्र करना, हिंसा के आरोपियों की गिरफ्तारी
> पहाड़ियों और घाटी के बीच सुरक्षित यात्रा सुनिश्चित करना; 55,000 से ज्यादा शरणार्थियों को फिर से बसाना
> पूर्व सीएम बीरेन सिंह के प्रभाव के बावजूद स्वतंत्र रूप से शासन चलाना, भाजपा के अंदर प्रतिद्वंद्वियों से निबटना
> कुकी-जो विधायकों और नागरिक समाज संगठनों का भरोसा जीतना, 10 कुकी-जो भाजपा विधायकों में से पांच खेमचंद सरकार में शामिल होने के खिलाफ हैं
> केंद्र शासित प्रदेश की कुकी-जो की मांग और किसी भी क्षेत्रीय विभाजन के मैतेई विरोध के बीच संतुलन साधना

