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कट्टरता का दोहरा तड़का

मुर्शिदाबाद ने आधुनिक राजनीति में भी अपनी अहमियत कभी नहीं गंवाई, खासकर सांप्रदायिक मुद्दे पर इसकी भूमिका सुरक्षित रहती है

TMC के पूर्व विधायक हुमायूं कबीर
अपडेटेड 23 फ़रवरी , 2026

बंगाल के नवाबों की पुरानी राजधानी मुर्शिदाबाद ने आधुनिक राजनीति में भी अपनी अहमियत कभी नहीं गंवाई, खासकर सांप्रदायिक मुद्दे पर इसकी भूमिका सुरक्षित रहती है. यहां तक कि 2014 से पहले बनिस्बत स्थिर रहते हुए भी इसके सामाजिक तापमान में हिंसक बढ़ोतरी के कुछ दौर आए.

पिछले दशक में यह और ज्यादा संवेदनशील होता गया. वहीं, बीते अप्रैल में यह सरहदी जिला आगजनी की चपेट में आ गया और हफ्तों सियासी सुर्खियों में रहा. आज यहां डरावने ढंग से ध्रुवीकरण करने वाली शख्सियतों की एक जोड़ी उभरकर आई है.

इनमें एक हिंदू है और दूसरा मुसलमान, जो वैसे तो एक ही सिक्के के दो विपरीत पहलू हैं, मगर एक साथ वे इन गर्मियों में होने वाले चुनावों के लिए सियासी कड़ाहे को जबरदस्त गरमाए रखने का वादा करते हैं.

सिक्का उछालें तो उसके एक तरफ आपको कार्तिक महाराज यानी बेलडांगा के भारत सेवाश्रम संघ के स्वामी प्रदीप्तानंद मिलेंगे, जो बहुत गुस्सैल ढंग से लड़ाकू जबान वाले संत की छवि में फिट बैठते हैं. दूसरी बातों के अलावा उन्होंने धर्म की सशस्त्र रक्षा और हिंदू घरों में शस्त्रास्त्रों की पूजा का आह्वान किया, महात्मा गांधी के प्रति श्रद्धा पर दुख जताया और 'लव जिहाद' के मुद्दे को हवा दी.

दूसरी तरफ भरतपुर के विधायक हुमायूं कबीर हैं, जो हाल में अपने इलाके में 'बाबरी मस्जिद' बनाने का वादा करके खुद को देशभर की सुर्खियों में ले आए थे. उनकी यह पेशकश तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) तक की मंजूरी की देहरी से बाहर थी, जिसने उन्हें फौरन निलंबित कर दिया.

भगवा और हरा
कार्तिक काफी पहले ही स्वच्छंद भगवा धर्मगुरु की पारंपरिक भूमिका से बहुत आगे आ गए और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की तरफ खिंचते दिखाई दे रहे हैं, फिर भले ही वे पार्टी का सीधा समर्थन करने से बचते हों. 2025 में पद्मश्री से सम्मानित कार्तिक ने कोलकाता के ब्रिगेड परेड मैदान में भगवद्गीता के पाठ की अगुआई करके और उसमें लाखों की भीड़ जुटाकर ऊंचा आसन हासिल कर लिया.

इसे आध्यात्मिक जमावड़े की तरह पेश किया गया, मगर असल में इसने विभिन्न वर्गों में हिंदू गोलबंदी के ताकतवर माध्यम का काम किया और भाजपा के इकोसिस्टम को संगठित आधार मुहैया करवाया. राज्य के सभी प्रमुख नेता उनके पीछे एकजुट हो गए और उन्हें चुनाव में टिकट मिलने की संभावना भी है. सार्वजनिक आयोजनों में पार्टी के नेताओं के साथ उनकी बढ़ती नजदीकी से इन अटकलों को बल मिला. कम से कम इतना तो कहा ही जा सकता है कि भाजपा को वहां एक असरदार सरपरस्त मिल गया है.

जहां तक कबीर की बात है, उन्होंने नई जनता उन्नयन पार्टी बनाकर टीएमसी के साथ अपने रिश्ते खत्म होने को औपचारिक रूप दे दिया और विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी के उम्मीदवार घोषित करने लगे हैं. पार्टी लॉन्च करने से पहले टीएमसी के जिला नेताओं के साथ महीनों उनके खुलेआम टकराव हुए और पार्टी की तरफ से अनुशासन की कार्रवाई करने की चेतावनियां दी गईं, जिसका मतलब यह है कि उनका जाना सियासी और निजी दोनों था.

मुर्शिदाबाद में उन्होंने 'बाबरी मस्जिद' बनाने का जो वादा किया है, वह साफ तौर पर राजनैतिक कारसाजी है. उन्हें मदद इस बात से भी मिल रही है कि यह जगह बेलाडांगा में है जो कार्तिक के आश्रम का मुख्यालय भी है. इसका शिलान्यास करते हुए कबीर ने इसे बढ़ते दबाव के बीच सामुदायिक एकजुटता की कार्रवाई और राष्ट्रीय सार्वजनिक स्थल को दोबारा हासिल करने का रक्षात्मक कदम बताया. विरोधी इस परियोजना को जानबूझकर किया जा रहा भड़काऊ काम करार देते हैं.

भारत सेवाश्रम संघ के कार्तिक महाराज जिन्हें पद्मश्री मिल चुका है

सियासी तौर पर मामूली शख्सीयत होने के नाते कबीर की उड़ान का रास्ता काफी महत्वाकांक्षी है. हाल के बयानों में उन्होंने खुलेआम गठबंधन का विचार सामने रखा, और दावा किया कि बाहरी समर्थन से वे मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार भी बन सकते हैं. दिलचस्प यह कि इसमें भाजपा का समर्थन टटोलने की साफ पेशकश भी शामिल थी बशर्ते वह उन्हें मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार स्वीकार करे.

भाजपा ने इस कदम को नौटंकी बताकर फौरन खारिज कर दिया और कबीर को उपद्रवी या विरोधियों का प्यादा करार दिया. सूत्रों का कहना है कि वे भारतीय सेक्युलर फ्रंट सरीखे संगठनों या शायद वामदलों के साथ भी बातचीत कर रहे हैं. फिलहाल कोई भी इस बात पर बड़ा दांव लगाने के लिए तैयार नहीं कि चारों तरफ हाथ-पैर फैला रहे कबीर का ऊंट असल में किस करवट बैठेगा.

दुष्ट या पीड़ित?
कबीर बहुत ज्यादा महत्वाकांक्षी हैं, तो 2025 में कार्तिक के खिलाफ भी पुलिस में शिकायत की गई थी. इसमें 2013 के गंभीर अपराधों का आरोप लगाया गया, जिसके जवाब में उन्होंने कानूनी संरक्षण के लिए कलकत्ता हाइकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. समर्थक इस केस को राजनीति से प्रेरित बताते हैं तो बदले में आलोचक उनके सियासी अनुमोदन को सनक और खतरों से भरा कहते हैं.

यह या तो दुष्टता है या पीड़ित होना है. ऐसे में कार्तिक को वह सबसे जोरदार संसाधन भर-भरकर मिल रहा है जिसे लोगों का ध्यान कहते हैं. उसी तरह जैसे कबीर को मिल रहा है. ये एक दूसरे की परछाइयां साथ मिलकर सुनिश्चित कर रहे हैं कि बंगाल में वोट देने का वक्त करीब आने के साथ शांत ढंग से सोचना कम होता जाए.

इसका असर मुर्शिदाबाद और उसके बाहर भी देखा जा सकता है. राज्य के मुख्य हिस्से के ऊपरी पूर्वी छोर पर स्थित मुर्शिदाबाद की पहचान लंबे वक्त से इसकी बांग्लादेश से सटी लंबी और हलचल भरी सरहद से जुड़ी है, और इसकी वजह से ध्यान में आने वाली 'जनसांख्यिकी' से भी, जो आज मुस्लिम आबादी का अनुपात बढ़ने के रूप में चिन्हित होती है. कुछ अनुमानों के मुताबिक, 2026 में यह 70 फीसद तक ज्यादा हो गई, और इतने गैरबराबर ढंग से फैली है कि इलाके हिंदू/मुस्लिम में बंट गए हैं.

मगर माहौल में हल्के-फुल्के बदलाव भी पूरे बंगाल के लिए अहम होंगे. कबीर मुसलमान वोटों को बांट सकते हैं, जो टीएमसी का मूल वोट बैंक हैं. कार्तिक की भी इसी तरह पूरे बंगाल में पहचान है. दोनों भाजपा को बढ़त देते हैं. थोड़े में कहें तो मुर्शिदाबाद बेहद संवेदनशील भूकंपीय इलाके का नाभिकेंद्र बन गया है.

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