तमिलनाडु में इन दिनों बहुत-सी नजरें एक चलती-फिरती लकीर पर गड़ी हैं, और वह है अभिनेता विजय और उनकी तमिलगा वेत्री कलगम (टीवीके) की शक्ल में उभरा नया एक्स-फैक्टर. वे अपनी स्वतंत्र राह गढ़ने की कोशिश कर रहे हैं, जो लंबे वक्त से दो दलों के फंदे में फंसे मतदाताओं के लिए विरला 'तीसरा विकल्प' है.
ऐसे में शुरुआती अनुमानों में उन्हें ऐसी राजनैतिक ताकत के तौर पर आंका जा रहा है जिसे दो मुख्य द्रविड़ मोर्चों में से किसी के भी साथ न जाने वाली राजनैतिक ताकतों के मुकाबले कहीं ज्यादा समर्थन मिल रहा है. विजय की संभावनाओं पर इससे फर्क नहीं पड़ता कि सुर्खियां उनसे भरी पड़ी हैं.
नए प्रतीक चिह्न (सीटी) का आवंटन, सितंबर में करूर में भगदड़ के मामले में सीबीआइ का समन, मतदान से पहले उन्हें राजनैतिक कक्षा में स्थापित करने के लिए बनाई गई फिल्म को लेकर सेंसर की परेशानियां, गठबंधन की वार्ताएं...विभिन्न दिशाओं से मिल रहे पेचीदा इशारों के हिसाब से तस्वीर बहुत कुछ साफ होने लगी है.
विजय हाल के वक्त में केवल सत्तारूढ़ द्रविड़ मुनेत्र कलगम (द्रमुक) को निशाना बनाने की चुनिंदा आलोचना से हटकर सभी को समान रूप से निशाना बनाने लगे हैं, और ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कलगम (अन्नाद्रमुक) पर भी खुलकर हमले कर रहे हैं. ऐसे में आने वाले विधानसभा चुनाव का अनुमान लगाना मुश्किल हो गया है, खासकर जब उनकी वोट हिस्सेदारी की क्षमता की थाह नहीं है. टीवीके के एक आयोजन के दौरान करूर में मची भगदड़ (जिसमें 41 लोग मारे गए थे) की लंबी छाया ने लगता है पिछले समीकरण बदल दिए हैं.
दोस्ती में खटास
उस भगदड़ के फौरन बाद अन्नाद्रमुक ने टीवीके का साथ दिया और उसे राजनैतिक तौर पर अलग-थलग पड़ने से असरदार ढंग से बचा लिया था, यहां तक कि उसे द्रमुक विरोधी मोर्चे में शामिल होने का न्यौता भी दिया था. विजय भी महीनों तक रणनीतिक ढंग से अनुकूल हावभाव दर्शाते रहे. उन्होंने भारतीय जनता पार्टी को जगह देने के लिए द्रमुक को दोषी ठहराया और इसे 'अप्रत्यक्ष आत्मसमर्पण' तक कह डाला जबकि भगवा पार्टी के असल सहयोगी दल को ज्यादा छूट दी.
वह अस्थायी धुरी करूर पर हो रही विजय की लगातार जांच-पड़ताल के आगे टिक नहीं पाई. इसमें सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सीबीआइ जांच भी शामिल थी. शायद यह लंबे वक्त से चली आती कड़वाहट का नतीजा हो, शायद बढ़ता एहसास कि उन्हें एकला चलो से ज्यादा फायदा हो सकता है. जो भी हो, उन्हें अब अन्नाद्रमुक के बड़े नेताओं पर तंज कसते देखा जा रहा है, जिसमें वे उस पर तमिलनाडु के साथ 'मेल न खाने वाली' ताकत के साथ अपने काफिले को जोड़कर अपनी ही विरासत को धोखा देने का बड़ा आरोप लगा रहे हैं. इससे भविष्य में साथ आने की गुंजाइश दरअसल बहुत कम हो गई है. जवाब में अन्नाद्रमुक के नेतृत्व ने चुप्पी ओढ़ ली, लेकिन उसकी आइटी शाखा ने विजय पर आक्रामक हमले बोलते हुए उनके वित्तीय स्रोत, साख और करूर के बाद उनके आचरण पर सवाल उठाए.
अभी तक कोई विधिवत जनमत सर्वेक्षण नहीं हुआ है, लेकिन राजनैतिक ट्रैकर और पार्टियों के भीतर घूम रहे अनौपचारिक सर्वे इशारा कर रहे हैं कि टीवीके को पहले अकेले चुनाव लड़ने वाले दलों के मुकाबले कहीं ज्यादा वोट मिल सकते हैं. खास तौर पर युवा मतदाता और पहली बार वोट देने वाले उनके बाहरी होने के आकर्षण से खिंचे चले आ सकते हैं. थोड़ी अच्छी वोट हिस्सेदारी अहम हो सकती है. पहले माना जा रहा था कि द्रमुक को इससे नुक्सान होगा, अब अन्नाद्रमुक का आधार भी सुरक्षित नहीं है. मुकाबले को बदलने के लिए टीवीके को शायद बहुत ज्यादा सीटें जीतने की जरूरत न पड़े. उसकी मौजूदगी ही कई मुकाबलों को तिकोना बना सकती है, जिससे दोनों बड़ी द्रविड़ पार्टियों का गणित उलझ सकता है.
तमिलनाडु में अच्छी राजनैतिक पूंजी खड़ी करने के लिए सांस्कृतिक मोर्चे पर उथल-पुथल से बेहतर और कुछ नहीं होता, इसलिए विजय की फिल्म जन नायकन की रिलीज के लिए केंद्रीय प्रमाणन बोर्ड के प्रमाणपत्र में हो रही लंबी देरी उनके लिए इस पटकथा को दिलचस्प बना सकती है. इसकी कानूनी लड़ाई अंतत: सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गई, और टीवीके समर्थक इसे संस्थानिक ढंग से बाहें मरोड़ने के और सबूत के तौर पर पेश कर रहे हैं. संक्षेप में कहें तो प्रेशर कुकर की 'सीटी' बजने का क्षण आ रहा है.
खास बातें
> सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर करूर भगदड़ केस की सीबीआइ जांच, फिल्म जन नायकन पर सेंसर के अड़ंगे ने विजय की लोकप्रियता बढ़ाई
> अभिनेता अन्नाद्रमुक से विमुख हो गए और अच्छे वोट शेयर की संभावना के बीच उन्होंने अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा की

