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एक विचार का अवसान

पवार परिवार के फिर से एक होने की योजना अजित के जाने के साथ ही खत्म होती दिख रही है. उपमुख्यमंत्री बनने वाली उनकी पत्नी सुनेत्रा अपनी एनसीपी के लिए स्वतंत्र भविष्य की रूपरेखा तैयार कर रहीं

31 जनवरी को उपमुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के समय सुनेत्रा पवार, राज्यपाल आचार्य देवव्रत के साथ
अपडेटेड 19 फ़रवरी , 2026

उलझे सियासी नक्शे की दो रेखाएं दोबारा मिलती नजर आ रही थीं. मगर 28 जनवरी की धुंधली सुबह उपमुख्यमंत्री 66 वर्षीय अजित पवार की विमान हादसे में मौत के साथ ये रेखाएं ठिठक गईं. परिवार के भीतर सदमे और शोक की लहर भी जल्द ही कड़वी सियासी हकीकत में बदल गई. अजित की पार्टी के एक प्रभावशाली गुट ने उनकी पत्नी सुनेत्रा के रूप में महाराष्ट्र को नया उपमुख्यमंत्री दे दिया. गंभीर मुद्रा में, सफेद शॉल में लिपटी 62 वर्षीया सुनेत्रा ने 31 जनवरी को शपथ ली. 

यह एक सुनियोजित तख्तापलट जैसा कदम था. दो साल से अधिक समय तक कड़वाहट भरी दूरी के बाद अजित और उनके चाचा पूर्व केंद्रीय मंत्री शरद पवार अब हाथ मिलाने की स्थिति में थे. वह संभावित घटनाक्रम राज्य की सियासत की चूलें हिला सकता था. आखिरकार, विपक्ष का एक बड़ा योद्धा भाजपा के प्रभाव क्षेत्र में आ जाता. उससे महाविकास अघाड़ी (एमवीए) को गहरा झटका लगता और राष्ट्रीय स्तर पर इंडिया गठबंधन का मनोबल भी हिल जाता. मगर इससे कई विधायक भरोसेमंद नेतृत्व की तलाश में शरद पवार की ओर रुख कर सकते थे.

इससे पुनर्गठित एनसीपी में शरद पवार गुट को निर्णायक बढ़त मिल जाती. इसलिए पहले वाले खेमे ने इस संभावना को शुरुआत में ही कुचल देना बेहतर समझा और सुनेत्रा के 'राजतिलक' की व्यवस्था कर दी.

बंटी हुई राय
नए घटनाक्रम से खिन्न नजर आ रहे शरद पवार ने पत्रकारों से कहा कि चार महीनों की बातचीत के बाद समझौता तय हो चुका था और औपचारिक विलय का ऐलान अजित की निर्धारित तारीख 12 फरवरी को होना था. मगर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस इसका प्रतिवाद करते हुए कहते हैं कि अगर बातचीत आखिरी चरण में पहुंची होती तो अजित भाजपा को जरूर जानकारी देते. फिर भी, व्यावहारिक संबंध बनाने की कोशिशें काफी हद तक सार्वजनिक रूप से नजर आ रही थीं. दोनों एनसीपी ने गठबंधन करके पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ के स्थानीय निकाय चुनाव लड़ा, भले उन्हें सफलता नहीं मिली थी.

खैर, पवार के संकेत के मुताबिक, फिलहाल वह करार ठंडे बस्ते में है. उन्होंने यह भी बताया कि सुनेत्रा को उपमुख्यमंत्री चुने जाने की जानकारी उन्हें पहले से नहीं थी. इस मोर्चे पर तब भी थोड़ी हलचल दिखी जब केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि राज्यसभा सांसद प्रफुल्ल पटेल यह पद संभालेंगे. पटेल ने तुरंत इस बात का खंडन किया, मगर उनका नाम चर्चा में आ गया. साल 2023 में एनसीपी के बंटवारे के पीछे जिन अहम ताकतों का हाथ माना जाता है उनमें पटेल के साथ सुनील तटकरे, छगन भुजबल और धनंजय मुंडे शामिल हैं.

इस मौजूदा पटकथा में भी वे अहम किरदार बताए जा रहे हैं. दोनों पार्टी के पुनर्मिलन के विरोधी खेमे से जुड़े एनसीपी के एक नेता ने इंडिया टुडे से कहा कि सुनेत्रा को आगे लाने का मकसद 'जन-सहानुभूति' को साधकर एनसीपी को एक स्वतंत्र इकाई के रूप में मजबूत बनाना है.

यह आसान नहीं होगा. शपथ ग्रहण ने कई लोगों की भौंहें चढ़ा दी हैं और प्रतिद्वंद्वी दलों ने भी नरमी नहीं बरती है. शिंदे शिवसेना से सामाजिक न्याय मंत्री संजय शिरसाट ने सवाल उठाया कि जब राज्य शोक में डूबा है, तब भी इतनी जल्दबाजी क्यों दिखाई गई. विश्लेषकों का तर्क है कि भाजपा 2029 के विधानसभा चुनाव अकेले लड़ने का मन बना सकती है. कांग्रेस के एक नेता ने कहा कि भाजपा एनसीपी पर हावी हो जाएगी और मंत्रिमंडल के पुराने चेहरों को भी बदल सकती है. 

परिवार के विरोध के बावजूद अगर अजित पुनर्मिलन की राह पर आगे बढ़ रहे थे तो इसकी वजह यह आशंका थी कि भाजपा धीरे-धीरे अपने सहयोगियों की सियासी जमीन पर कब्जा जमा सकती है. जाहिर है, एनसीपी के अस्तित्व की चिंताएं अजित के साथ खत्म नहीं हुई हैं.

खास बातें

अजित और उनके चाचा पूर्व केंद्रीय मंत्री शरद पवार हाथ मिलाने की स्थिति में थे

सुनेत्रा का 'राजतिलक' एक सुनियोजित तख्तापलट जैसा कदम

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