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स्कूल फीस पर संतुलन की पहल

स्कूलों की फीस बढ़ाने को लेकर चल रही अनिश्चितता के बीच दिल्ली सरकार ने नए नियम लाकर यह स्पष्ट कर दिया कि मौजूदा सत्र में फीस वृद्धि नहीं होगी

दिल्ली सरकार ने स्कूलों की फीस बढ़ोतरी पर लगाया अंकुश
अपडेटेड 19 फ़रवरी , 2026

दिल्ली में निजी गैर-सहायता प्राप्त (प्राइवेट अनएडेड) स्कूलों में फीस बढ़ाने पर बहुत समय से अभिभावकों और स्कूल संचालकों के बीच विवाद रहा, मगर अब इसका स्थायी समाधान रेखा गुप्ता सरकार ने निकाल लिया है. 2025 में जब फीस के नियमन को लेकर प्रदेश की भारतीय जनता पार्टी सरकार नया कानून लेकर आई तो भ्रम पूरी तरह दूर नहीं हुआ.

स्कूलों की ओर से नए कानून के प्रावधानों की व्याख्या करके यह बात कही जा रही थी कि वे चालू सत्र में भी फीस बढ़ाने के लिए स्वतंत्र हैं. दूसरी तरफ, अभिभावकों का कहना था कि स्कूल ऐसा नहीं कर सकते. यह मामला उच्चतम न्यायालय पहुंचा. दिल्ली सरकार ने 2 फरवरी को उच्चतम न्यायालय में कहा कि उसने 30 जनवरी, 2026 को जो नए नियम बनाए हैं, उसके मुताबिक, निजी स्कूल चालू सत्र में फीस नहीं बढ़ा सकते. सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि यह कानून अगले शैक्षणिक सत्र से लागू किया जाएगा.

दरअसल, नए शैक्षणिक सत्र के लिए राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के प्राइवेट अनएडेड स्कूलों ने दाखिले की प्रक्रिया शुरू कर दी है. ऐसे में फीस के विषय पर स्पष्टता की जरूरत थी. जब इस मामले में अभिभावकों और स्कूलों के बीच विवाद बढ़ता गया तो दिल्ली सरकार ने 2025 के दिल्ली स्कूल शिक्षा अधिनियम के तहत 30 जनवरी, 2026 को नए दिशानिर्देश जारी करके यह साफ कर दिया कि शैक्षणिक सत्र 2025-26 के लिए कोई भी निजी स्कूल सरकार से मंजूर फीस स्ट्रक्चर से एक भी रुपया अधिक नहीं वसूल सकता. इसमें यह भी स्पष्ट किया गया है कि किसी नए शुल्क, विशेष मद या विकास शुल्क के बहाने भी अभिभावकों से कोई पैसा नहीं लिया जा सकता है.

प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में यह भी कहा है कि 10 फरवरी तक नए कानून के तहत हर स्कूल में स्कूल लेवल फीस रेगुलेशन कमेटी (एसएलएफआरसी) बनानी होगी. यही समिति अगले तीन शैक्षणिक सत्रों यानी 2026-27, 2027-28 और 2028-29 के लिए फीस तय करेगी. इसमें अभिभावकों की भी भागीदारी रहेगी. कमेटी बनने के 14 दिन के अंदर स्कूल को अगले तीन साल की प्रस्तावित फीस की लिस्ट जमा करनी होगी. कमेटी बनने के 30 दिन के अंदर सरकार हर जिले में अपील कमेटी बनाएगी, जहां अभिभावक फीस से जुड़ी अपनी शिकायत लेकर जा सकेंगे.

इस बारे में दिल्ली सरकार में शिक्षा विभाग के मंत्री आशीष सूद कहते हैं, ''यह फैसला अभिभावकों के लिए सबसे ज्यादा फायदेमंद है. इससे स्कूल मनमाने ढंग से ज्यादा फीस नहीं वसूल पाएंगे. कमेटी का काम इस साल फीस बदलने का नहीं बल्कि आने वाले वर्षों में अभिभावकों के हितों की रक्षा करने का होगा.'' 

अनुमान है कि दिल्ली में स्कूलों में पढ़ाई करने वाले बच्चों में से आधी से अधिक हिस्सेदारी वैसे बच्चों की है जो निजी स्कूलों में पढ़ रहे हैं. इनमें भी बड़ी संख्या ऐसे मध्यम और निम्न-मध्यम वर्गीय परिवारों की है, जिनके लिए हर साल फीस में 10-20 फीसद की वृद्धि उनके परिवार के बजट को पूरी तरह बिगाड़ देती है. अभिभावकों का आरोप है कि कई स्कूल बिना किसी पूर्व सूचना के साल की शुरुआत में ही हजारों रुपए अतिरिक्त मांग लेते हैं.

यह रकम कभी स्मार्ट क्लास, कभी एसी चार्ज तो कभी मेंटेनेन्स फीस के नाम पर अभिभावकों से मांगी जाती है. यह प्रावधान खास तौर पर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अभिभावक संगठनों का आरोप रहा है कि कई स्कूल सरकारी आदेशों को दरकिनार कर अलग-अलग मदों में पैसा वसूलते हैं. ऐसे में इन बच्चों और इनके अभिभावकों के लिए सरकार का हालिया निर्णय राहत की खबर लेकर आया है.

हालांकि, दिल्ली सरकार के इस निर्णय से हर कोई खुश नहीं है. स्कूलों के संचालकों का कहना है कि इस तरह का कोई भी निर्णय उनके लिए गुणवत्ता वाली शिक्षा उपलब्ध कराने की राह में मुश्किलें पैदा करता है. इस बारे में दक्षिणी दिल्ली के एक स्कूल के संचालक कहते हैं, ''बढ़ती महंगाई, शिक्षकों के वेतन, इन्फ्रास्ट्रक्चर में निवेश और नई शैक्षणिक जरूरतों के बीच अगर हमें फीस तय करने की स्वतंत्रता नहीं दी गई तो गुणवत्ता बनाए रखना मुश्किल हो जाएगा. हम अगर शिक्षकों का वेतन हर साल नहीं बढ़ाएंगे तो हमारे यहां अच्छे टैलेंट को रोककर रखना मुश्किल हो जाता है. हम यह समझते हैं कि ऐसे निर्णयों के लिए सरकार पर राजनैतिक दबाव रहता है लेकिन सरकार को हमारी चिंताओं पर भी सहानुभूति के साथ विचार करके कोई निर्णय लेना चाहिए.''

दिल्ली में स्कूल फीस को लेकर विवाद कोई नया नहीं है. 2000 के दशक की शुरुआत से ही निजी स्कूलों पर मनमानी फीस वृद्धि के आरोप लगते रहे हैं. 2009 में शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के बाद सरकार की भूमिका और बढ़ी, लेकिन फीस नियंत्रण का सवाल लगातार अदालतों में पहुंचता रहा. 2016-17 में जब कई प्रतिष्ठित निजी स्कूलों ने एक साथ फीस में भारी बढ़ोतरी की थी तो उस समय अभिभावकों का गुस्सा सड़कों पर फूट पड़ा था.

उस समय दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार थी. उस सरकार ने ऑडिट, बढ़ी हुई फीस वापस लेने और स्कूल प्रबंधन के खिलाफ सख्त कार्रवाई की बात की लेकिन तब भी इस समस्या का ठोस समाधान नहीं निकल पाया. कोविड महामारी के दौरान यह विवाद और गहराया. ऑनलाइन कक्षाओं के बावजूद पूरी फीस वसूलने को लेकर अभिभावकों और स्कूलों के बीच विवाद बढ़ा और मामला अदालतों में पहुंचा. अदालतों ने अक्सर इस पूरे मामले पर संतुलित रुख अपनाने की कोशिश की लेकिन स्थायी ढांचा नहीं बन पाया.

इसी पृष्ठभूमि में दिसंबर 2025 में दिल्ली सरकार ने दिल्ली स्कूल शिक्षा (फीस निर्धारण और विनियमन में पारदर्शिता) अधिनियम, 2025 को अधिसूचित किया. इस कानून का मकसद फीस तय करने की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाना है. कानून में यह प्रावधान किया गया है कि फीस बढ़ाने के निर्णय में अभिभावकों की भागीदारी सुनिश्चित हो और स्कूलों की तरफ से होने वाली मनमानी वृद्धि पर रोक लगे. 

आशीष सूद कहते हैं, ''बीते कुछ वर्षों में अभिभावकों से स्कूल फीस को लेकर लगातार शिकायतें मिल रही थीं. कई स्कूल बिना ठोस कारण के फीस बढ़ा देते थे, जिससे मध्यम वर्ग और गरीब परिवारों पर बोझ पड़ता था. स्कूल स्तर पर समिति को अनिवार्य करने से ऐसी शिकायतों का समाधान स्कूल स्तर पर ही हो सकेगा.''

खास बातें

> कोई भी निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूल 2025-26 सत्र के लिए पहले से मंजूर फीस स्ट्रक्चर से अधिक फीस नहीं ले सकता

> एक्टिविटी फीस, डेवलपमेंट चार्ज या किसी अन्य नाम से किसी भी प्रकार का नया शुल्क लगाने की अनुमति नहीं होगी

> अगर किसी स्कूल ने पहले ही अतिरिक्त फीस वसूल ली है तो उसे भविष्य के फीस भुगतान में एडजस्ट करना होगा या वापस करना होगा.

> शिक्षा निदेशालय को शिकायत मिलने पर जांच करके सख्त कार्रवाई करने का व्यापक अधिकार होगा

> नए कानून के तहत हर स्कूल में स्कूल लेवल फीस रेगुलेशन कमेटी बनानी होगी. यह समिति अगले तीन वर्षों के लिए फीस तय करेगी

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