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अनजानी गलतियों से सियासी खलबली

सीएम भगवंत मान अपनी पार्टी के 'पाप' बढ़ा रहे तो अकाली दल नाराज सिख श्रद्धालुओं को फिर से अपने साथ जोड़ने की योजना तैयार करने में जुटा है

15 जनवरी को स्वर्ण मंदिर परिसर में पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान
अपडेटेड 23 फ़रवरी , 2026

पंजाब में साल 2027 के विधानसभा चुनाव में अभी लंबा अरसा बाकी है, मगर किसी नाटकीय अंजाम के आसार अभी से नजर आने लगे हैं. इस साल 15 जनवरी को सामने आई एक तस्वीर ने सियासी मैदान में मची खलबली को स्पष्ट तौर पर जाहिर कर दिया, जब राज्य के उत्साही मुख्यमंत्री भगवंत मान को अकाल तख्त पर तलब किया गया. उसके बाद नंगे पैर, झुके सिर और विनम्र भाव के साथ पवित्र तख्त की ओर मान की पदयात्रा ने वह सब कुछ बयान कर दिया जो कहा जा सकता था.

आम आदमी पार्टी (आप) के पास अपनी गलतियों पर पछताने और संभवत: उन्हें सुधारने के लिए काफी वक्त है. पंथिक राजनीति आप के लिए एक नया मैदान है, इसलिए उसने जाने-अनजाने ऐसी बारूदी सुरंग में कदम रख दिया है, जहां उसका हर गलत कदम एक नया धमाका कर रहा है. ताजा विवाद मुख्यमंत्री मान के इस दावे से उपजा कि पंजाब पुलिस ने बंगा के रसोखाना श्री नभ कमल राजा साहिब में गुरु ग्रंथ साहिब के 328 लापता सरूपों में से 169 तलाश लिए हैं.

मान को उम्मीद थी कि उनकी इस बात से सिख श्रद्धालु खुश हो जाएंगे, लेकिन इसका एकदम उल्टा हो गया. मान के दावे ने लोगों को नाराज कर दिया और ऐसी असहज परिस्थिति में पार्टी को अपनी बात से पीछे हटना पड़ा. सबसे बड़ी बात यह है कि पार्टी ने यह कदम एक पुरानी गलती को सुधारने के इरादे से उठाया.

दरअसल, कुछ दिन पहले दिल्ली विधानसभा में आतिशी मार्लेना की कथित टिप्पणियों ने विरोधियों को आम आदमी पार्टी पर धर्म के प्रति असंवेदनशील होने का आरोप लगाने का मौका दे दिया. यह जाने-अनजाने में हुई ऐसी गलती थी, जिसने पार्टी को चुनावी सियासत के खेल के पहले दौर में ही बुरी तरह मात दे दी.

इतना ही नहीं, सियासी खेल के मैदान का दायरा भी अब काफी बढ़ गया है, जिसकी शायद पहले कल्पना भी नहीं की गई थी. इतना ज्यादा कि हार के बाद से सुस्त पड़ गई सुखबीर बादल की पार्टी शिरोमणि अकाली दल (एसएडी) को भी इस खेल में अब अपनी वापसी की उम्मीद नजर आने लगी है. दिलचस्प बात यह है कि अकाली दल उन्हीं पंथिक मुद्दों के जरिए अपनी पकड़ मजबूत करने का मौका देख रहा है, जिसके कारण ही उसे सत्ता से हाथ धोना पड़ा था.

पंथिक शून्यता

पंजाब की सत्ता सिख समाज के इर्द-गिर्द केंद्रित रही है या दूसरे शब्दों में कहें तो यही यहां की राजनीति का मूल आधार है. लेकिन साल 2017 के आसपास अकाली दल के पतन के साथ इसमें एक शून्यता उत्पन्न हो गई है. तबसे इस खालीपन को भरने की होड़ मची रहती है.

कट्टरपंथी, अकाली दल का विरोधी धड़ा, सत्ताधारी आम आदमी पार्टी, कांग्रेस और यहां तक भाजपा भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पंथिक राजनीति में अपनी जगह मजबूत करने की कोशिश में जुटी है. लेकिन, इसमें पैठ बनाने की राह इतनी आसान नहीं है, जिसका अंदाजा शायद अब आम आदमी पार्टी को भी हो गया है.

पंथिक मुद्दे ग्रामीण आबादी, खासकर जट्ट सिखों के लिए बेहद संवेदनशील रहे हैं. जट्ट सिख एक समय पर अकालियों का प्रमुख वोट बैंक हुआ करते थे. सुखबीर बादल से उनकी नाराजगी का मूल कारण शासन संबंधी नाकामियां थीं लेकिन यह नाराजगी साल 2015 की बेअदबी की घटनाओं और उसके बाद बहबल कलां में पुलिस फायरिंग पर पंथिक गुस्से के तौर पर फूटी. और, इसने मतदाताओं को 'धर्मनिरपेक्ष' विकल्पों की ओर रुख करने को प्रेरित किया.

इन मुद्दों पर कोई समाधान न निकलने के कारण आम आदमी पार्टी को लेकर भी असंतोष की लहर उठने लगी है, जिसके चमत्कारिक चुनावी वादे हकीकत की कसौटी पर खरे नहीं उतर पा रहे हैं. इन सबके बीच, पंथिक राजनीति में कट्टरपंथियों का हावी होना जारी है. यहां तक कि खालिस्तान समर्थक नारे भी फिर से बुलंद होने लगे हैं. 

वैसे, खडूर साहिब के सांसद अमृतपाल सिंह की गिरफ्तारी ने अस्थिरता के दौर को खत्म कर दिया है. आक्रामकता की धार कुंद हो गई है और जमीनी स्तर पर भी माहौल धीरे-धीरे शांत होता दिख रहा है.

तमाम उम्मीदें पाले पूर्व अकाल तख्त जत्थेदार ज्ञानी हरप्रीत सिंह की अगुआई वाला प्रतिद्वंद्वी अकाली 'सुधारवादी' गुट भी कमजोर पड़ रहा है. इस गुट का एक प्रमुख चेहरा रहे चरणजीत बरार, जो कभी सुखबीर के सहयोगी थे, हाल ही में भाजपा में शामिल हो गए हैं.

बादल का सूखा होगा खत्म

बदली स्थितियों में सिख समाज की राजनीति फिर अपनी जड़ों यानी शिरोमणि अकाली दल के पाले में केंद्रित होने लगी है. कुछ वर्षों से खत्म हो चुकी ताकत माने जा रहे अकाली दल को सिख गौरव के रक्षक की अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभाने का मौका मिलता दिख रहा है.

मान का बंगा वाली पहल क्यों उलटी पड़ गई? तथ्यगत खामियां, गुरुद्वारे में पुलिस के प्रवेश, और मान की ओर से प्रयुक्त भाषा ने कुल मिलाकर मामला बिगाड़ दिया. वित्त मंत्री हरपाल चीमा की डैमेज कंट्रोल की कोशिश भी काम नहीं आई. 21 जनवरी को वे हालात संभालने के लिए वहां पहुंचे और कहा कि 'कोई विसंगति नहीं मिली' और फिर उससे भी पलट गए.

आतिशी प्रकरण अभी भी सुलग रहा. ऐसे में आप के लिए परिदृश्य अभी साफ नहीं है. उधर, अपने अनुभव से और अधिक समझदार हो चुके सुखबीर नई फसल अच्छी होने की आस में हैं.

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