करीब दो दशकों में बिहार की राजनीति बार-बार उठे तूफानों से घिरी रही है, और इनमें से कई का मकसद नीतीश कुमार को राजनीति से ठिकाने लगाना ही लगता था. लेकिन पिछले साल 10वीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले नीतीश में सत्ता के केंद्र में लौट आने की एक खास काबिलियत रही है—और वह भी अपनी शर्तों पर.
2025 का विधानसभा चुनाव इस लिहाज से खास रहा. इसमें उन्होंने जनता दल (यूनाइटेड) और एनडीए सहयोगियों के साथ मिलकर 243 में से 202 सीटें हासिल कर जबरदस्त जीत दर्ज की. सहयोगी दल चुनाव की शुरुआत में उन्हें मुख्यमंत्री चेहरे के तौर पर पेश करने में हिचक रहे थे.
उधर, विरोधी—लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल (राजद) से लेकर प्रशांत किशोर की जन सुराज तक—उनकी सेहत पर सवाल उठा रहे थे और उन्हें बीते दौर की राजनीति का चेहरा बता रहे थे. लेकिन नीतीश ने जोरदार वापसी की. आज जद (यू) विधानसभा में भाजपा के बाद दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है. भाजपा के 89 के मुकाबले जद (यू) के 85 विधायक हैं.
राज्य से बाहर भी, 2025 की यह जीत नीतीश कुमार की राष्ट्रीय राजनीति में पकड़ को फिर से रेखांकित करती है. वे शायद इकलौते बड़े समाजवादी नेता हैं जिन्होंने पार्टी और सहयोगियों के दबाव के बावजूद अपने बेटे को राजनीति में आगे नहीं बढ़ाया. इस जीत ने उनकी उस दूरदर्शिता को भी उजागर किया, जिसके तहत उन्होंने एक ऐसे राज्य में, जहां अब भी उपनाम राजनैतिक पहचान की बुनियाद बने हुए हैं, महिलाओं को जाति से परे एक मजबूत वोट बैंक के रूप में तैयार किया.
एक ऐसे नेता के लिए जिसे एक तरफ 'सुशासन गुरु' कहा जाता है और दूसरी तरफ 'पलटू राम', दसवीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेना अपने आप में राजनैतिक परिभाषाओं को नए सिरे से गढ़ने जैसा था. यह किसी निर्बाध राज की घोषणा नहीं थी बल्कि यह इस सचाई की पुष्टि थी कि बिहार में किसी भी सत्ता समीकरण के लिए नीतीश कुमार आज भी अपरिहार्य बने हुए हैं. दरअसल, नीतीश ने अपनी पकड़ उस रणनीति के जरिए बनाए रखी है, जिसे कुछ विश्लेषक 'रणनीतिक परिवर्तनशीलता' कहते हैं, यानी सत्ता के समीकरण बदलते रहना, लेकिन उस नैतिक व्याकरण को न छोड़ना, जिसे मतदाता पहचानते हैं.
पिछले दो दशकों में यह छवि मजबूती के साथ बनी रही है. यह उन लोगों को आकर्षित करती है जो व्यवस्थित शासन चाहते हैं, और उनके लिए भी उपयोगी साबित होती है जो नीतीश को मिली वैधता उधार लेना चाहते हैं. लेकिन इस लंबी राजनैतिक उम्र के भीतर एक विरोधाभास भी छिपा है. इसके लिए सार्वजनिक मंच पर स्पष्ट सिद्धांत चाहिए, और निजी स्तर पर बारीक सामाजिक इंजीनियरिंग. नीतीश ने दोनों में महारत हासिल कर ली है.
सार्वजनिक तौर पर वे सड़क, बिजली, कानून-व्यवस्था की बात करते हैं. निजी बातचीत में वे ठंडे दिमाग से गठबंधन का गणित बैठाते हैं, जो नए लोगों को असहज कर सकता है. एक दशक पहले वही नीतीश सांप्रदायिक उथल-पुथल खत्म करने और 'सुशासन' लाने वाले नेता के रूप में सराहे जाते थे.
हाल के वर्षों में वही चालें आलोचकों को अवसरवाद लगने लगीं. हमेशा की तरह सचाई इससे कहीं ज्यादा जटिल है. यह स्थिरता उस राज्य में किसी मरहम से कम नहीं, जहां जातिगत समीकरण और स्थानीय संरक्षण नेटवर्क आज भी राजनैतिक पसंद तय करते हैं. नीतीश कुमार ने अलग-अलग स्तर की सफलता के साथ प्रशासनिक क्षमता को चुनावी पूंजी में बदला है. वे अनुशासन का विचार सामने रखते हैं—दफ्तरों में समय की पाबंदी, बेहतर सर्विस डिलिवरी और एक ऐसा प्रबंधकीय लहजा जिसमें भरोसेमंद शासन की बात होती है.
2025 में यह बात खास तौर पर मायने रखती थी. राष्ट्रीय बहसों और स्थानीय चिंताओं के बीच कई मतदाताओं ने सर्वे करने वालों से साफ कहा कि उन्हें ऐसी सरकार चाहिए जो बस ''काम करके दिखाए''. नीतीश का रिकॉर्ड, हकीकत और धारणा, दोनों में उन्हें यही भरोसा देता था.
दसवीं बार मुख्यमंत्री बनना जितना ऐतिहासिक है, उतना ही यह इस बात की याद भी दिलाता है कि आज के भारत में राजनैतिक टिकाऊपन के लिए एक मिश्रित कौशल जरूरी है: नैरेटिव पर पकड़, प्रशासनिक दक्षता और गठबंधन बनाने में फुर्तीलापन. नीतीश ने बीते 20 साल इसी कला को साधने में लगाए हैं. बिहार की राजनीति के केंद्र में उनका बने रहना उस राजनीति के पक्ष में तर्क है, जो बड़े-बड़े नारों के बजाए भरोसे और डिलिवरी को तरजीह देती है.
बार-बार नीतीशे कुमार
> चुनाव की घोषणा के वक्त 'लगभग खत्म' माने जा रहे नीतीश कुमार ने एनडीए को जीत दिलाकर देश में सियासी तौर पर साल की सबसे बड़ी वापसी की.
> मतदाता ऐसी सरकार चाहते थे जो ''काम करके दिखाए'', मुख्यमंत्री का रिकॉर्ड—वास्तविकता और धारणाओं में—इस भरोसे पर खरा उतरा.
> इस जीत ने महिलाओं को जाति-तटस्थ और भरोसेमंद वोट बैंक के रूप में साधने में नीतीश की दूरदर्शिता को भी रेखांकित किया.
दसवीं बार मुख्यमंत्री की शपथ लेने वाले नीतीश कुमार की राजनैतिक स्थिरता का ब्रांड उतनी जल्दी खत्म नहीं होता, जितना कि ज्यादातर पंडितों ने कभी कयास लगाया था

