
दीपक नौटियाल का पत्थर और मिट्टी से बना घर उत्तराखंड की एक घाटी में हल्की चढ़ाई पर स्थित है. बड़ी-बड़ी खिड़कियों से अंदर आती रोशनी और गुनगुनी गर्माहट, आंगन में फलों के पेड़ और जहां तक नजर पहुंचे, हरियाली ही हरियाली दिखती है.
2020 में, 45 वर्ष की उम्र में दीपक ने कॉर्पोरेट नौकरी छोड़कर अपने गांव लौटने का फैसला किया ताकि अपने बूढ़े माता-पिता की देखभाल कर सकें. और जैसा वे बताते हैं, अपने पैतृक गांव की बिगड़ी स्थिति पर सिर्फ आंसू बहाने के बजाए कुछ करने के लिए उन्होंने यहां लौटना बेहतर समझा.
दीपक जिस बिगड़ी स्थिति की बात कर रहे हैं, वह पलायन के एक लंबे दौर से उपजी है जिससे यह पहाड़ी राज्य लगातार जूझता रहा है. उत्तराखंड में लगभग 86 फीसद इलाका पहाड़ी है और यहां 70 फीसद लोग अब भी ग्रामीण इलाकों में रहते हैं. दशकों से ये पहाड़ियां लोगों को बस अपने घर-बार छोड़कर जाते देखने की आदी रही हैं, जो पहले काम की तलाश में आसपास के शहरों में, फिर भारत के अन्य हिस्सों और विदेश तक में जाकर बस गए.नतीजा, निर्जन गांव और खाली पड़े घरों की गहरी खामोशी.
उत्तराखंड के पहाड़ों से पलायन कोई नई बात नहीं है. यह ब्रिटिश राज में शुरू हुआ, जब गढ़वाल और कुमाऊं रेजिमेंट में नियमित भर्ती और मैदानी इलाकों में कभी-कभी होने वाले बड़े मजदूर आंदोलनों ने इस इलाके को पहली बार बड़ी दुनिया से जोड़ा. ब्रिटिश भर्ती से आय बढ़ने के साथ लोगों को शहरी जिंदगी का अनुभव भी मिला.
20वीं सदी के आखिर में जब खेती करना फायदेमंद नहीं रहा तो पलायन की मानो बाढ़ आ गई. पहले ज्यादातर मर्द कमाने के लिए बाहर जाते थे. अब पूरे परिवार ही बाहर चले जाते हैं, जिसका असर साफ तौर पर स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी दिखता है जो खेती या अन्य काम-धंधों के बजाए बाहर से आने वाले पैसों पर निर्भर हो गई है.
राज्य सरकार पुष्टि करती है कि पलायन उत्तराखंड की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है. उत्तराखंड ग्रामीण विकास और पलायन रोकथाम आयोग के मुताबिक, वर्ष 2011 से 2022 के बीच कुल 1.16 करोड़ आबादी में से 6,90,000 से ज्यादा लोगों ने 'कुछ समय के लिए’ अपने घर छोड़े; जबकि 1,47,000 लोग हमेशा के लिए चले गए. इसी दौरान 758 गांव (कुल 16,800 गांवों में से) ऐसी जगहों में तब्दील हो गए जिन्हें अधिकारी ''भुतहा गांव’’ कहते हैं, जहां शायद ही कोई बचा रह गया हो.
कुल मिलाकर, अनुमानत: 81 लाख ग्रामीण आबादी में से 10 फीसद से ज्यादा लोग बाहर जा चुके हैं. यह समस्या चीन और नेपाल से लगी राज्य की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर बसे विकास खंडों में खास तौर पर ज्यादा गंभीर है, जहां पूरे समुदाय का पलायन हो चुका है. 2022 के एक सर्वे ने समस्या की गंभीरता को रेखांकित किया; अपने घर-बार छोड़कर जाने वालों में से आधे से ज्यादा ने नौकरियों की कमी को मुख्य कारण बताया. 15 फीसद लोग पढ़ाई के बेहतर अवसर न होने और करीब 9 फीसद बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव के कारण पलायन कर गए.
पलायन का जिन्न
एक छोटे-से गांव बैंगवाड़ी, जो पौड़ी जिले में आता है, में अकेले रहने वाले भारत-तिब्बत सीमा पुलिस के पूर्व सब-इंस्पेक्टर 85 वर्षीय प्रताप सिंह कहते हैं, ''यहां आपका स्वागत सिर्फ खाली पड़े घर और दरवाजों पर लटकते ताले ही कर सकते हैं.’’ उनके दो भाइयों में से एक पौड़ी शहर में बस गए, दूसरे देहरादून में.
उनकी तीन बेटियां और एक बेटा, सभी राज्य से बाहर रहते हैं. वे उदासी भरे स्वर में कहते हैं, ''यहां लोग तभी वापस आते हैं जब कोई शादी या रस्म होनी होती है.’’ गांव के प्रधान मानवेंद्र रावत बताते हैं कि गांव के 392 पंजीकृत मतदाताओं में से 125 कहीं और रहते हैं. उनकी पीड़ा है, ''मनरेगा के काम भी अधूरे पड़े हैं क्योंकि इन्हें पूरा करने वाला कोई नहीं.’’

स्थानीय स्कूलोंं की इमारतें अब भी हैं लेकिन वहां बमुश्किल ही कोई बच्चा आता है. शिक्षक स्कूल को खुला रखने और ट्रांसफर से बचने के लिए अक्सर बच्चों के आने-जाने, खाने और यूनिफॉर्म का खर्च अपनी जेब से उठाते हैं. फिर भी दूरदराज इलाकों में हर साल स्कूल बंद होते जा रहे हैं. कई परिवारों ने आसपास तेंदुए दिखने के बाद अपने बच्चों को स्कूल भेजना बंद कर दिया है. हर गुजरते साल के साथ पौड़ी की ढलानें वीरान होती जा रही हैं, जंगल घने होते जा रहे हैं, और गांवों में कभी-कभार ही चहल-पहल दिखती है.
अगर पौड़ी की पहाड़ियां लोगों के बाहर जाने की गवाह बन रही हैं तो नजदीकी जिला टिहरी गढ़वाल बताता है कि पलायन किस स्तर पर हो रहा है. घनसाली तहसील के कई गांवों से लोगों का बाहर जाना इतना आम हो चुका है कि अब इसे 'मिनी जापान’ कहा जाने लगा है. यह नाम ऐसे तमाम युवाओं की पलायन के बाद मिला है जो काम की तलाश में विदेश, खासकर जापान चले गए हैं.
सरपोली गांव में दिहाड़ी मजदूर सज्जन सिंह कहते हैं, हालात ऐसे हैं कि वापस लौटना लगभग नामुमकिन है. गांव के 111 परिवारों में से 60 पहले ही देहरादून, दिल्ली या मुंबई में रह रहे हैं और कुछ विदेश की राह पकड़ चुके हैं. सज्जन अपनी छोटी-सी जमीन पर खेती-बाड़ी के साथ मरम्मत वगैरह का काम भी कर लेते हैं. वे कहते हैं, ''मैं कम से कम 20 परिवारों को जानता हूं जो बेहतर सुविधाएं मिलने पर वापस लौट आएंगे.’’
यहां जो परिवार बचे हैं, उनमें ज्यादातर की कहानी जानी-पहचानी ही है, मर्द दूरदराज की जगहों पर फंसे हैं, औरतें घर संभाल रही हैं, और बच्चे बिना पिता के बड़े हो रहे हैं. सरपोली से कुछ किलोमीटर दूर मथकुरी सैन हिंडाव गांव में स्थानीय निवासी बताते हैं कि करीब 2,500 लोगों में से 1,500 से ज्यादा अब दूसरी जगहों पर जाकर बस गए हैं. इनमें करीब 250 जर्मनी, जापान और कतर जैसे देशों में हैं. घर भेजे गए पैसों से नए घर तो बने लेकिन परिवार अंदर से खोखले हो चुके हैं.
28 वर्षीय मुकेश आर्य दुबई में चार साल रसोइये का काम करने के बाद हाल ही में लौटे हैं. वे बताते हैं, ''वहां पैसा तो अच्छा था लेकिन शांति नहीं थी. यहां स्थिति इसके ठीक उलट है.’’ उनके बड़े भाई अभी दुबई के होटल में काम करते हैं; छोटा भाई मुंबई में है. सात महीने पहले, मुकेश यहीं रहने का पक्का इरादा करके लौट आए.
उन्होंने किराने की एक छोटी-सी दुकान खोली लेकिन यहां बसने से पहले ही खुद को बेहतर स्वास्थ्य एवं शिक्षा सुविधाओं की मांग को लेकर पिलखी से अखोरी तक निकाले गए मशाल जुलूस में शामिल पाया. सबसे नजदीकी अस्पताल पिलखी से 43 किमी दूर है, और फिर वह प्राथमिक चिकित्सा केंद्र भर है. सबसे बड़ी स्वास्थ्य सुविधा श्रीनगर में सेना के बेस हॉस्पिटल के तौर पर उपलब्ध है और गंभीर मामलों में परिवारों को देहरादून भागना पड़ता है. पूरे इलाके में ब्लड बैंक या अल्ट्रासाउंड जैसी सुविधाएं भी नहीं हैं. वे सुकून की तलाश में लौट तो आए लेकिन बुनियादी अधिकारों की लड़ाई सामने है.
अर्थव्यवस्था नदारद
एचएनबी गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान विभाग के प्रमुख प्रो. एम.एम. सेमवाल आगाह करते हैं कि अगर सब कुछ ऐसे ही चलता रहा तो इसके नतीजे और भी गंभीर हो सकते हैं. उनके मुताबिक, ''सीमावर्ती इलाके पूरी तरह खाली हो जाएंगे और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न होगा. सतत विकास के बजाए आपदा प्रबंधन पर ध्यान देने से संसाधन खत्म हो चुके हैं. पहाड़ों के लिए अगला बड़ा खतरा 2026 में होने वाला परिसीमन है.
अगर यह आबादी के आधार पर किया गया तो मैदानी इलाकों को ज्यादा सीटें मिल जाएंगी. इससे राज्य में सिर्फ 14 फीसद हिस्सेदारी वाले क्षेत्र का प्रतिनिधित्व बढ़ जाएगा जबकि 86 फीसद हिस्सेदारी वाले पहाड़ी क्षेत्रों का राजनैतिक महत्व घट जाएगा. इससे पलायन में और तेजी भी आ सकती है.’’
कोठार गांव के बाल गंगा डिग्री कॉलेज में इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर डॉ. रघुवीर स्थिति को और स्पष्ट करते हैं. उनके मुताबिक, ''असल में उत्तराखंड की अपनी कोई अर्थव्यवस्था नहीं है. ज्यादातर लोग धार्मिक पर्यटन पर निर्भर हैं, और वह भी साल में बमुश्किल छह महीने चलता है.’’ उनकी राय है कि राज्य को तीर्थयात्रियों और पर्यटकों पर निर्भर रहने के बजाए जड़ी-बूटियों, पहाड़ी फसलों और छोटे पैमाने पर होने वाली पैदावारों में अपनी आर्थिक ताकत को फिर से तलाशना चाहिए.
सरकारी प्रयास जारी
राज्य सरकार केंद्र के वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम को आगे बढ़ा रही है. उत्तराखंड में भारत की उत्तरी सीमाओं पर गांवों के 'समग्र विकास’ के लिए 2023 में शुरू की गई यह योजना पिथौरागढ़, चमोली और उत्तरकाशी के दूरदराज के इलाकों में नए बुनियादी ढांचे, घर और रोजी-रोजगार के मौके उपलब्ध कराने का वादा करती है. अधिकारियों को उम्मीद है, सड़कें, होमस्टे प्रोत्साहन राशि और डिजिटल कनेक्टिविटी ''सीमाओं पर रौनक फिर बढ़ा देगी.’’
मिलम (पिथौरागढ़ जिला) में कुछ घर पहले ही बन चुके हैं. ये सबसे पुराने भुतहा गांवों में से एक है, जो 1962 की लड़ाई के बाद खाली हो गया था. लड़ाई से पहले मिलम भारत-तिब्बत मार्ग पर फलता-फूलता कारोबार हब था, जहां लगभग 500 भोटिया परिवार रहते थे. इन्हें ट्रांस-हिमालयी कारोबार के लिए जाना जाता था. सीमा बंद हुई तो उनमें से अधिकांश चले गए. आज मिलम में ज्यादातर घर खंडहर हैं लेकिन कुछ परिवार गर्मियों में जड़ी-बूटियां और ऊंचाई पर होने वाली फसलें उगाने के लिए लौट आते हैं.
इस वर्ष अप्रैल में केंद्र ने वाइब्रेंट विलेज कार्यक्रम के दूसरे चरण को मंजूरी दी और इसे सीमावर्ती राज्यों के कुछ और खास गांवों तक विस्तारित कर दिया. अतिरिक्त सचिव (ग्रामीण विकास) अनुराधा पाल कहती हैं कि ''इस योजना के तहत कुछ सीमावर्ती गांवों में नए होमस्टे बने लेकिन रिवर्स माइग्रेशन पर इसके असर के बारे में कुछ भी कहना अभी जल्दबाजी होगी.’’
यहीं पर सवाल सवाल उठता है कि क्या उत्तराखंड खुद को फिर तलाश पाएगा? अपने लोगों को यहीं बसने के और कारण दे पाएगा? फिलहाल तो पहाड़ियां सुनसान क्षेत्रों और उम्मीद के बीच राह तक रही हैं.
सरपोली गांव, टिहरी गढ़वाल
सरपोली गांव में सीता देवी दो कमरों के मकान में रहती हैं. बगल में ही उनकी जेठानी मीरा देवी रहती हैं. मीरा की बेटी और दामाद नैनीताल में काम करते हैं. सीता के पति दो साल से रूस में हैं. वे वहां होटल में बावर्ची का काम करते हैं. उनका बड़ा बेटा भी इसी पेशे में है और दुबई में काम करता है. छोटा बेटा मुंबई में है. घर में रौनक बस त्योहारों के दौरान रहती है जब उनके बेटे अपने परिवारों के साथ आते हैं.
सीता का वन्न्त रोजमर्रा के कामों में बीत जाता है—पानी लाना, खाना बनाना, अपनी जमीन पर जंगली जानवरों के आने पर नजर रखना. उनके पति नौकरी छोड़कर लौटना चाहते हैं लेकिन करार से बंधे हैं. दोनों औरतों के बीच साझा चिंताओं और छोटी-मोटी खुशियों को लेकर बातचीत चलती रहती है. गांव में जहां तकरीबन हरेक परिवार विभिन्न शहरों और देशों में बंटा हुआ है, सीता और मीरा उस बची-खुची जिंदगी की पतवार थामे हैं जिसे उन्होंने मिलकर बनाया है.
बैंगवाड़ी गांव, पौड़ी गढ़वाल
बैंगवाड़ी गांव में थोड़ी-सी पहाड़ी चढ़ते ही 150 साल पुराना एक मकान मिलता है. इसकी मोटी पत्थर की दीवारें और लकड़ी का बरामदा सामने सुनसान सीढ़ीदार खेतों को तकते रहते हैं. यहीं सरकारी स्कूल के सेवानिवृîा ङ्क्षप्रसिपल द्वारिका प्रसाद ममगाईं और उनकी पत्नी कृष्णा देवी चुपचाप अपने दिन बिताते हैं. द्वारिका प्रसाद किताबें पढ़ते हैं और अपने घर के बाहर लगे छोटे-छोटे फलदार पेड़ों पर नजर रखते हैं. कृष्णा देवी खाना बनाती, साफ-सफाई करती और अपने छोटे-से किचन गार्डन की देखरेख करते धीरे-धीरे घर में डोलती रहती हैं. उनके पैरों में अब पहले वाली ताकत नहीं रही, चलने में दिन्न्कत होती है.
उनका बेटा दिल्ली में काम करता है और जब भी आ पाता है, मिलने आ जाता है. वह अन्न्सर उनसे शहर में ही आकर रहने के लिए कहता है न्न्योंकि वहां चिकित्सा सहायता तत्काल मिल जाती है जिससे जिंदगी आसान होगी. बुजुर्ग दंपती ने उसकी यह दलील कई बार सुनी लेकिन कभी गंभीरता से नहीं लिया. ममगाईं कहते हैं, ''हमारा दिल इसकी इजाजत नहीं देता.’’ उन्हें जाना-पहचाना माहौल ही पसंद है, फिर भले ही चौतरफा पसरी खामोशियां ही न्न्यों न हों और परेशानी आन पडऩे पर तत्काल कोई मदद न भी मिले. उनकी मौजूदगी से यह घर आसपास के उन कई मकानों की तरह भुतहा भी नहीं हो जाता जिन पर ताले पड़े हैं.

