लखनऊ के डॉ. राम मनोहर लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय का सभागार 14 दिसंबर को एक संगठनात्मक घोषणा का गवाह भर नहीं बना, बल्कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में अगले कुछ वर्षों की दिशा का संकेत भी दे गया.
जैसे ही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नए प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर पंकज चौधरी के नाम का ऐलान हुआ, पूरा हॉल 'बीजेपी जिंदाबाद', 'मोदी-मोदी' और 'योगी-योगी' के नारों से गूंज उठा. तालियों के शोर और 'भारत माता की जय' के उद्घोष के बीच यह साफ हो गया कि पार्टी नेतृत्व एक लंबे इंतजार को खत्म कर चुका है.
यह नियुक्ति सिर्फ एक पद परिवर्तन नहीं है. वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में गिरावट और 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी के बीच यह भाजपा की सामाजिक और राजनैतिक रणनीति का अहम पड़ाव है. गोरखपुर से सटी महाराजगंज लोकसभा सीट से सात बार सांसद पंकज चौधरी के सामने चुनौती सिर्फ संगठन चलाने की नहीं, बल्कि पार्टी को फिर से उस भरोसे और धार तक ले जाने की है, जिसने कभी यूपी को भाजपा की सबसे बड़ी प्रयोगशाला बना दिया था.
सत्ता और संगठन का संतुलन
प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद चौधरी ने जिस तरह अपने पहले संबोधन में शब्दों का चयन किया, वह अपने आप में एक संदेश था. ''यह जिम्मेदारी मुझे रूल करने के लिए नहीं, बल्कि रोल अदा करने के लिए मिली है,'' उनका यह वाक्य पार्टी के भीतर चल रही उस बहस की ओर इशारा करता है, जिसमें संगठन और सरकार के रिश्तों को लेकर असहजता रही है. प्रदेश अध्यक्ष पद की घोषणा के बाद उन्होंने पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ नेता डॉ. रमापति राम त्रिपाठी के साथ-साथ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के भी पैर छुए.
राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह महज शिष्टाचार नहीं था. लखनऊ के बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में प्रोफेसर सुशील पांडेय कहते हैं, ''भाजपा में प्रतीकों की राजनीति बहुत मायने रखती है. योगी के पैर छूना यह संदेश देता है कि संगठन और सरकार के बीच किसी तरह की खींचतान नहीं होगी. कम से कम सार्वजनिक तौर पर.''
दरअसल, 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद पार्टी के आंतरिक आकलन में यह बात खुलकर सामने आई थी कि कार्यकर्ताओं में उत्साह की कमी रही. कई जिलों से शिकायतें आईं कि प्रशासन पार्टी कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं की बात नहीं सुन रहा. निगमों और बोर्डों में राजनैतिक नियुक्तियां लंबे समय से लटकी पड़ी हैं, जिससे कार्यकर्ताओं में असंतोष बढ़ा.
भाजपा के एक वरिष्ठ नेता नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, ''देखिए, चुनाव के वक्त संगठन को सरकार की जरूरत होती है और सरकार को संगठन की. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह तालमेल कमजोर पड़ गया हरै. पंकज चौधरी की पहली और सबसे बड़ी चुनौती इसी दूरी को पाटने की होगी.''
मनोबल की परीक्षा
यूपी भाजपा के लिए 2024 का लोकसभा चुनाव एक बड़ा झटका था. 2019 में जहां पार्टी ने 62 सीटें जीती थीं, वहीं 2024 में यह आंकड़ा घटकर 33 रह गया. समाजवादी पार्टी (सपा) ने 37 सीटें जीतकर न सिर्फ बढ़त बनाई, बल्कि यह संकेत भी दिया कि प्रदेश की राजनीति में समीकरण बदल रहे हैं. प्रोफेसर पांडेय बताते हैं, ''यह गिरावट सिर्फ सीटों की नहीं थी. यह मनोबल की हार भी थी. भाजपा का सबसे मजबूत पक्ष उसका कैडर रहा है.
अगर वही थका हुआ और उपेक्षित महसूस करने लगे, तो संगठन की धार स्वाभाविक तौर पर कुंद हो जाती है.'' चौधरी के सामने चुनौती है कि वे इस टूटे मनोबल को कैसे फिर से खड़ा करें. 2026 के पंचायत चुनाव और 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले संगठन को सक्रिय और एकजुट रखना आसान न होगा. खासकर उस समय जब स्थानीय निकाय चुनाव में टिकट के दावेदारों की संख्या हमेशा ज्यादा रहती है और टिकट न मिलने पर बगावत की अंदेशा बना रहता है.
पूर्वांचल बनाम पश्चिम यूपी
चौधरी गोरखपुर के रहने वाले हैं और इस तरह वे पूर्वांचल से हैं. इससे पहले भूपेंद्र चौधरी पश्चिमी यूपी के जाट नेता थे. अगस्त 2022 में उनकी नियुक्ति को क्षेत्रीय संतुलन के तौर पर देखा गया था क्योंकि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी पूर्वी यूपी से हैं. अब जब प्रदेश अध्यक्ष भी पूर्वांचल से हैं, तो पश्चिमी यूपी में संतुलन बनाए रखना एक बड़ी चुनौती बनकर उभरता है. खासकर राष्ट्रीय लोकदल के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए, जो राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का सहयोगी है और जाट बेल्ट में मजबूत पकड़ रखता है.
मेरठ के एक भाजपा नेता कहते हैं, ''पश्चिमी यूपी में किसान आंदोलन के बाद राजनैतिक माहौल पहले जैसा नहीं रहा. यहां संगठन को ज्यादा ध्यान और संवाद की जरूरत है. प्रदेश अध्यक्ष का यहां नियमित आना-जाना और स्थानीय मुद्दों पर पकड़ बनाना जरूरी होगा.'' माना जा रहा है कि इसी संतुलन को साधने के लिए योगी सरकार के प्रस्तावित मंत्रिमंडल विस्तार में पश्चिमी यूपी से कुछ चेहरों को जगह मिल सकती है. साथ ही, नई प्रदेश कार्यकारिणी में भी क्षेत्रीय और सामाजिक संतुलन पर जोर दिया जाएगा.
कुर्मी फैक्टर पर नजर
चौधरी कुर्मी समुदाय से हैं, जो यूपी की ओबीसी आबादी का 7 फीसद से कुछ ज्यादा है. पूर्वी और मध्य यूपी में इस समुदाय की अच्छी मौजूदगी है. भाजपा नेतृत्व के भीतर यह आम धारणा है कि उनकी नियुक्ति सपा के पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक अभियान का जवाब है. लेकिन यह राह आसान नहीं. 2024 के लोकसभा चुनाव में कुर्मी समुदाय के एक बड़े हिस्से ने सपा-कांग्रेस गठबंधन का समर्थन किया था (देखें बॉक्स).
लखनऊ के जय नारायण डिग्री कॉलेज में राजनीति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर बृजेश मिश्र कहते हैं, ''कुर्मी समुदाय कभी भी एकमुश्त किसी पार्टी के साथ नहीं रहा. पंकज चौधरी का कुर्मी होना एक अवसर जरूर है, लेकिन सिर्फ पहचान के भरोसे वोटों का ध्रुवीकरण नहीं हो सकता. इसके लिए ठोस राजनैतिक संदेश और संगठनात्मक काम जरूरी है.''
चौधरी का राजनैतिक अनुभव लंबा और प्रभावशाली रहा है. वे 1991 से सात बार महाराजगंज से सांसद चुने गए हैं. संसद में जाने से पहले वे गोरखपुर नगर निगम में पार्षद और उप-महापौर भी रहे हैं. लेकिन प्रदेश स्तर पर संगठनात्मक पद का अनुभव उनके पास सीमित रहा है. महाराजगंज के एक भाजपा नेता खुलकर कहते हैं, ''वे संसदीय राजनीति में मजबूत हैं लेकिन संगठन चलाना अलग कौशल मांगता है. प्रदेश भर के कार्यकर्ताओं से संवाद बनाना उनके लिए नया अनुभव होगा.'' हालांकि, उनके समर्थक यह भी जोड़ते हैं कि वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के कार्यक्रमों में सक्रिय रहे हैं और विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता उनकी ताकत है.
यूपी भाजपा ने संगठन के स्तर पर कई बड़ी उपलब्धियां गिनाई हैं. प्रदेश में 2.6 करोड़ सदस्य बनाकर पार्टी ने रिकॉर्ड बनाया. कई अभियान सफलतापूर्वक चलाए गए, जिनका मकसद 2027 तक पार्टी को सक्रिय रखना है. अब इन अभियानों को राजनैतिक नतीजों में बदलने की जिम्मेदारी चौधरी पर है. इन तमाम चुनौतियों के बीच असली कसौटी 2027 का विधानसभा चुनाव होगा.
भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी का लक्ष्य लेकर चल रही है, लेकिन सत्ता विरोधी माहौल, स्थानीय असंतोष और बदले हुए सामाजिक समीकरण इसे कठिन बना सकते हैं. डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य का वह बयान कि 'संगठन हमेशा सरकार से बड़ा होता है,' अभी भी पार्टी के भीतर चर्चा का विषय है. ऐसे में प्रदेश अध्यक्ष के रूप में चौधरी की बड़ी चुनौती संगठन और सरकार के बीच संतुलनकारी और मध्यस्थ की भूमिका को लेकर ही होगी.
कुर्मी वोटों पर नजर
> सामाजिक न्याय समिति-2001 की रिपोर्ट के अनुसार, यूपी की कुल पिछड़ी जातियों में यादव का प्रतिशत 19.40 है तो कुर्मी 7.46 प्रतिशत हैं
> कृषि पर आधारित एक जैसी सामाजिक संरचना वाली कुर्मी-सैंथवार पिछड़ी जाति को पटेल, गंगवार, निरंजन, सचान, कटियार, चौधरी और वर्मा जैसे उपनाम से जाना जाता है
> सूबे के 25 जिलों में कुर्मी समाज के मतदाता प्रभावी हैं. इस समाज के लोग पूर्वांचल में मुख्य रूप से वर्मा, चौधरी और पटेल सरनेम से पहचाने जाते हैं
> कानपुर-बुंदेलखंड में पटेल, कटियार, निरंजन, सचान, रुहेलखंड में गंगवार और वर्मा, अवध और पश्चिमी यूपी में वर्मा, चौधरी, पटेल के सरनेम से पहचाने जाते हैं
> वर्ष 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में कुर्मी समाज से कुल 41 विधायक चुनाव जीत कर आए जबकि वर्ष 2017 में 37 कुर्मी विधायक जीते थे
> वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के 26 और अपना दल (सोनेलाल) के पांच कुर्मी विधायक चुने गए थे, जबकि सपा के टिकट पर केवल दो विधायक ही जीते थे
> वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के कुर्मी विधायकों की संख्या घटकर 22 रह गई. वहीं सपा के कुर्मी विधायकों की संख्या बढ़कर 14 हो गई.
> वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में कुल 11 कुर्मी सांसद विजयी रहे. इनमें सबसे ज्यादा सपा के सात और भाजपा के तीन ही सांसद चुने गए

