
नवंबर शुरू होने से ठीक पहले गुजरात के किसानों को बेमौसम बारिश की बड़ी मार झेलनी पड़ी. हालांकि, स्थिति आजकल की कोड-रेड जलवायु आपदा जैसी नहीं थी पर कम बुरी भी नहीं थी. इसने राज्यभर में 42 लाख हेक्टेयर में खड़ी खरीफ की फसल को बर्बाद कर दिया यानी करीब 90 फीसद से ज्यादा तालुकों में 16,000 गांव बर्बाद हो गए.
दो हफ्ते बाद 42 वर्षीय शैलेश देवजीभाई सावलिया ने खेत का चक्कर लगाया तो खराब हो चुकी मूंगफली की फसल को छूते ही उनके हाथ कांपने लगे. इसके बाद जो हुआ वह गुजरात में आमतौर पर नहीं होता. उन्होंने कीटनाशक पीकर अपनी जान दे दी. शैलेश अपने पीछे दो बच्चे, जूनागढ़ में 6.7 हेक्टेयर खेत और कर्ज का पहाड़ छोड़ गए.
किसानों की आत्महत्या में गुजरात का नंबर बहुत नीचे आता है. वह महाराष्ट्र के विदर्भ या कृषि संकट वाले दूसरे प्रमुख क्षेत्रों की तुलना में आसपास भी नहीं फटकता. द्वारका के किसान और गुजरात किसान कांग्रेस के अध्यक्ष पाल अंबालिया कहते हैं, ''यह लगातार सातवां मौसम है जब किसानों को खड़ी फसलों का नुकसान उठाना पड़ा है. या तो अत्यधिक या बेमौसम बारिश होती है या फिर चक्रवात आ जाता है. हम लागत तक निकाल नहीं पा रहे.''
परस्पर जुड़े तरीकों के कारण पुराना संतुलन बिगड़ रहा है. अपेक्षाकृत कम नुकसान के कारण राज्य की स्थिति पर कभी गौर नहीं किया गया. मगर पिछले कुछ समय में मौसम का अनियमित और नुकसानदेह मिजाज दिखा है. 2023 में चक्रवात बिपरजॉय से तबाही मची; तो 2024 में यह चक्रवात असना की चपेट में आया. सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवायरनमेंट के आंकड़ों के विश्लेषण के मुताबिक, गुजरात 2025 के मॉनसून में बुरी तरह प्रभावित राज्यों में से एक था. इसने 94 दिनों तक चरम मौसम की घटनाओं का सामना किया जो 2022 की तुलना में 70 फीसद ज्यादा है.
वैज्ञानिकों का मानना है कि गुजरात में मौसम में इस बदलाव का संबंध ग्लोबल वॉर्मिंग से जुड़ी अस्थिरता बढ़ने से है. मसलन, यह निरंतर गर्म होते अरब सागर के किनारे स्थित है. नवंबर में पब्लिक लाइब्रेरी ऑफ साइंस (पीएलओएस) जर्नल में प्रकाशित पीयर-रिव्यूड शोधपत्र में भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान के शोधकर्ताओं ने गंभीर चेतावनी दी—''मॉडल बताते हैं कि सदी के मध्य तक गुजरात को अधिक तीव्र वर्षा, समुद्र स्तर में वृद्धि के खतरे और मॉनसून के व्यवहार में बढ़ती अस्थिरता का सामना करना पड़ेगा.''

'वास्तविक आक्रोश'
जलवायु परिवर्तन वैसे तो राजनीति का मुद्दा नहीं है मगर फिलहाल विपक्ष इसे भुनाने में लगा है. कांग्रेस ने 60 दिन की 'जन आक्रोश यात्रा' शुरू की है. प्रदेश अध्यक्ष अमित चावड़ा बारिश प्रभावित गांवों का दौरा कर रहे हैं. वे कहते हैं, ''कई लोग हमारी रैलियों में खुलकर शामिल होने से संकोच कर रहे हैं. लेकिन हम उनकी तकलीफ महसूस कर सकते हैं—वे वास्तव में गुस्से में हैं.'' आम आदमी पार्टी ने किसान महापंचायतों का आयोजन बढ़ा दिया है. दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल दो महीनों में कई बार गुजरात का दौरा कर चुके हैं.
फिलहाल इसका समाधान न राजनीति के पास है, न ही किसी नीति में. गुजरात में करीब 55 लाख किसान हैं; करीब 29 लाख ने राहत के लिए अर्जी दी है. 2016 की जनगणना के मुताबिक, औसत जमीन लगभग 1.88 हेक्टेयर है तो इस हिसाब से हर किसान के लिए राहत को दो हेक्टेयर तक सीमित रखना उचित लग सकता है. अंबालिया बताते हैं कि कई किसानों के पास एक से ज्यादा जमीन के टुकड़े हैं. इसका मतलब है कि वे या तो ज्यादा खुशहाल होंगे—या ज्यादा कर्जदार. भारतीय किसान संघ के महासचिव आर.के. पटेल का कहना है कि 20 फीसद किसानों को 100 फीसद नुकसान हुआ है और राहत इसकी भरपाई नहीं कर पाएगी. वे बढ़ते कृषि ऋण के लिए 'विवेकाधीन खर्च' को भी जिम्मेदार मानते हैं.
खास बातें
> नवंबर में बेमौसम बारिश के कारण 42 लाख हेक्टेयर पर खरीफ की फसल बर्बाद हो गई और इसके बाद पांच किसानों ने आत्महत्या कर ली.
> गुजरात 2025 के मॉनसून में बुरी तरह प्रभावित राज्यों में से एक था. उसने 94 दिनों तक चरम मौसम की घटनाओं का सामना किया जो 2022 की तुलना में 70 फीसद ज्यादा है.

