- कलीम गीलानी
कश्मीर क्रिसमस के मौके पर उत्तर में सिर्फ सफेद बर्फ की चादर से ढके नजारे की वजह से ही आकर्षक नहीं है. यह सदियों से इसी मौसम में व्यापारिक गहमागहमी के लिए भी जाना जाता रहा है. इसी दौरान कश्मीर के हस्तशिल्प से भरे कंटेनर पश्चिमी देशों के क्रिसमस बाजारों में पहुंचते हैं.
पर इस साल सबसे बुरा दौर आया है. अमेरिका-यूरोप में त्योहारों के लिए सामान की मांग बढ़ रही, पर कश्मीर की हस्तकला के नमूनों, कागज की बनी सजावटी चीजों से लेकर शानदार कालीन और पश्मीना वगैरह की खेप ठंडी पड़ गई है.
कौन है इसका गुनहगार? यह डोनाल्ड ट्रंप के भारतीय माल पर 50 फीसद भारी टैरिफ की मार है, जिससे रूस-यूक्रेन और इज्राएल-गाजा युद्धों की वजह से जारी नुक्सान कई गुना बढ़ गया है. कश्मीर के कारीगरों के लिए यह ऐसे दोहरे झटके की तरह है, जिसे एक कारीगर 'कयामत का मंजर' बताते हैं.
श्रीनगर के 67 वर्षीय निर्यातक अली मोहम्मद शिराजी का परिवार 1945 से कश्मीरी हस्तशिल्प का व्यापार कर रहा है. वे कहते हैं, ''बिक्री में 80 फीसद कमी हुई है. जो ऑर्डर क्रिसमस से महीनों पहले आते थे, वे अब बंद हो गए हैं. पिछली शिपमेंट भी अटकी हुई हैं, और पेमेंट में देरी हो रही.''
कश्मीर के पेपर मेशी के सालाना निर्यात का करीब 70 फीसद पश्चिमी देशों में क्रिसमस खरीदारी के उम्दा मौसम में होता रहा है. इस साल वह चढ़ता ग्राफ बुरी तरह गोता लगा गया है. शिराजी की फर्म रियान इंपैक्स की बिक्री इस साल 1 करोड़ रुपए से भी कम हो गई, जो 2023 में 3.5 करोड़ रुपए थी. श्रीनगर के लाल बाजार के एक कारीगर तारिक जाज कहते हैं, ''हम हमेशा कीमत के मामले में सबसे नीचे रहते हैं और गरीबी में जीते हैं. इस साल तो न के बराबर ऑर्डर हैं. यह हमारे वजूद पर खतरा बन रहा है.''
वजूद पर ही वार
वजूद पर खतरे की बात हल्की नहीं, आंकड़े इसकी गवाही देते हैं. कश्मीर का हस्तशिल्प निर्यात 2014-15 में 2,175 करोड़ रुपए से गिरकर 2023-24 में 1,162 करोड़ रुपए पर आ गया. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, इस साल तो यह 733 करोड़ रुपए पर आ पहुंचा है. यह दशक भर पहले के मुकाबले दो-तिहाई गिरावट है. यह इस क्षेत्र में कहर जैसी है, जिसमें 4.22 लाख कारीगरों को रोजगार मिलता है और उनमें 2.8 लाख पंजीकृत हैं.
श्रीनगर स्थित फर्म 'मी ऐंड के' के मुज्तबा कादरी कहते हैं, ''करीब 80 फीसद अव्वल किस्म की कालीन और पश्मीना के सामान अमेरिका जाते हैं, जिसमें डिजिटल माध्यम से वैश्विक खरीदारों को पेशकश की जाती है. यूरोपीय बाजार पहले ही युद्ध से पैदा अनिश्चितता से बुझा हुआ है, इसलिए लग्जरी सेगमेंट पर भारी झटका लगा है.''
कीमती सामान की वजह से निर्यात मूल्य में बढ़ोतरी में इसी क्षेत्र की हिस्सेदारी ज्यादा होती है और ये सामान पूरे साल बिकते हैं. ऑर्डर पर बनने वाले पेपर-मेशी बॉबल्स के लिए क्रिसमस ही जश्न का मौका होता है. यह कुल निर्यात मूल्य का छोटा-सा हिस्सा भले हो मगर सभी कारीगरों की रोजी-रोटी इसी से चलती है और इन सामान की बिक्री अमूमन साल की तीसरी तिमाही में 30 गुना बढ़ जाती है.
पंद्रह कश्मीरी हस्तकला को जीआइ टैग हासिल है, और मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला इसे रोजगार देने वाला मुख्य स्रोत बताते हैं. मगर सरकारी कोशिशें भी इस घटती लहर को रोक नहीं पाई हैं. शिराजी जैसे पुराने लोग इसके लिए कमजोर आरऐंडडी को जिम्मेदार मानते हैं. वे कहते हैं, ''हमारा माल दुनिया में डिजाइन के नए चलन से तालमेल नहीं बैठा पा रहा है.''
अब उम्मीदें भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता पर टिकी हैं, ताकि 25 फीसद टैरिफ कटौती तो हो. साथ ही, यूरोपीय संघ के साथ मुक्त व्यापार संधि में भारत अगर जनवरी से प्रदूषण के लिए 'कार्बन बॉर्डर' क्लॉज में रियायात हासिल कर ले, तो कुछ गुंजाइश बनेगी. मगर तब तक क्रिसमस बीत चुका होगा.
खास बातें
> कश्मीर का हस्तशिल्प निर्यात 2014-15 में 2,175 करोड़ रुपए से गिरकर अब 733 करोड़ रुपए रह गया है.
> टैरिफ और भूराजनीतिक उथल-पुथल की वजह से विदेशी मांग खत्म हो गई है.
> कारोबारियों की उम्मीदें अब आगामी व्यापार वार्ता पर टिकीं.

