अन्य पिछड़े वर्गों (ओबीसी) की पहचान के लिए पश्चिम बंगाल सरकार ने नया सर्वे कराने का फैसला क्या किया, आरक्षण नीतियों, सामाजिक न्याय और सियासी रणनीति पर नई बहस छिड़ गई.
यह कदम कलकत्ता हाइकोर्ट के उस फैसले के बाद उठाया गया, जिसमें राज्य के 113 और मुख्य रूप से मुस्लिम समुदायों को ओबीसी दर्जा देने के फैसले को धार्मिक आधार पर लिया फैसला बताकर खारिज किया गया था.
पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग आयोग ने अब ओबीसी दर्जे की मांग करने वाले समुदायों से मिले आवेदनों के आधार पर नए सर्वे का काम दो स्वतंत्र निकायों कल्चर रिसर्च इंस्टीट्यूट और ब्यूरो ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक्स ऐंड स्टैटिस्टिक्स को सौंपा है.
आयोग को करीब 118 समुदायों से 1,000 आवेदन मिले. उसकी ओर से मध्य जुलाई तक राज्य सरकार को सिफारिशें सौंपे जाने की उम्मीद है. कोर्ट के फैसले से बंगाल में 2010 से जारी ओबीसी प्रमाणपत्र अमान्य हो गए, जिससे करीब 5,00,000 लोग आरक्षण को लेकर सांसत में आ गए.
2026 के चुनाव से साल भर पहले सर्वे कराने को लेकर सियासी मौकापरस्ती के आरोप लग रहे हैं. भाजपा ने तृणमूल कांग्रेस सरकार पर 'वोट बैंक की राजनीति' करने का आरोप लगाया.
कोर्ट के फैसले के बाद गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि ''ममता बनर्जी ने सर्वे बगैर ही 118 मुस्लिम जातियों को ओबीसी आरक्षण दे दिया. वे वोट बैंक के लिए पिछड़ों का आरक्षण छीनना चाहती हैं.'' ममता ने इन दावों को यह कहकर खारिज कर दिया था कि कोर्ट का फैसला राजनीति से प्रेरित था. अब आरक्षण इस पर टिकेगा कि सर्वे कितना सटीक है.
अर्कमय दत्ता मजूमदार