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बिहार: सहरसा की इन 7 रेलवे गुमटियों ने कैसे कर दिए शहर के दो टुकड़े?

सहरसा की रेलवे गुमटियों की वजह से जाम में फंसकर रोगियों की जान जा रही, छात्रों की परीक्षाएं छूट रहीं, हर चुनाव में वादों के बावजूद रेलवे ओवरब्रिज 25 साल से महज एक सपना

सहरसा की बंगाली बाजार रेलवे गुमटी पर अराजक माहौल
सहरसा की बंगाली बाजार रेलवे गुमटी पर अराजक माहौल
अपडेटेड 30 जनवरी , 2025

बीते साल 19 दिसंबर की दोपहर, आधे घंटे से बंद सहरसा के गंगजला रेलवे गुमटी के पास अजीब-सा दृश्य उपस्थित हो गया. लोगों ने देखा कि कुछ युवक एक एंबुलेंस से एक युवती को गोद में उठाकर बंद गुमटी पार कराने की कोशिश कर रहे हैं. एक फोटोग्राफर ने उसकी तस्वीर उतार ली और वह तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो गई.

इस तस्वीर ने सहरसा की दशकों पुरानी रेलवे ओवरब्रिज की मांग को फिर से जिंदा कर दिया. लोगों का गुस्सा भड़क उठा जब यह पता चला कि देर से अस्पताल पहुंचने की वजह से उस युवती की मौत हो गई है. लोग बिहार सरकार, रेलवे, जनप्रतिनिधि और रेल ओवरब्रिज निर्माण में बाधक बनने वालों के खिलाफ गुस्सा जाहिर करने लगे.

दरअसल, बिहार के कोसी अंचल के सबसे पुराने शहर सहरसा का सबसे बड़ा मुद्दा ही रेलवे ओवरब्रिज की मांग है. यहां के लोग इसकी मांग तीन दशक से कर रहे हैं. मगर तीन बार शिलान्यास और कई दफा टेंडर निकलने के बावजूद पिछले 25 साल में यह बन नहीं सका है. इसके बावजूद कि भारतीय रेल ने 2 मार्च, 2023 को तैयार अपनी नीति में ऐसी सभी रेलवे क्रॉसिंग को प्राथमिकता के आधार पर खत्म करने का फैसला किया है, जहां ट्रेनों का अधिक परिचालन और लोगों की आवाजाही काफी अधिक हो.

लोकसभा का हो या विधानसभा का, हर चुनाव में यही सबसे बड़ा मुद्दा बनता है. हर प्रत्याशी जीतने के बाद ओवरब्रिज जरूर बनवा देने का वादा करता है. इस बीच जीते दर्जनों जनप्रतिनिधि दस लाख की आबादी वाले शहर के लोगों की इस छोटी-सी मांग को पूरा नहीं करवा पाए हैं. सहरसा के लोग ओवरब्रिज बनवाने को लेकर इतने परेशान क्यों हैं? एक अदद रेलवे ओवरब्रिज की मांग किसी शहर के लिए इतना बड़ा मुद्दा कैसे हो सकती है, जो दशकों से पूरी न हो पा रही हो? आइए, इसकी थोड़ी थाह लेते हैं.

इसी जनवरी की एक दोपहर का डेढ़ बज रहा है. शहर के बंगाली बाजार की रेलवे गुमटी बंद हो रही है. गेटमैन सायरन बजाकर लोगों से ठहरने की अपील करते हुए गेट नीचे लाने की कोशिश करता है. मगर सायरन की आवाज सुनते ही दोनों तरफ से ट्रैफिक का दबाव और भी तेज हो गया है.

हर वाहनचालक गुमटी पार करने को और तेजी से भाग रहा है. पूरी जद्दोजहद में गेट बंद करने में डेढ़ से दो मिनट लग जाते हैं. फिर भी लोग रुके नहीं हैं. मोटरसाइकिल, साइकल और पैदल वालों का गेट के नीचे से निकलना जारी है. पर चौपहिया वालों को मन मसोस कर खड़े रह जाना पड़ा. एक कार वाले ने सड़ी-सी गाली निकाली, "ई सहरसा का कोई होप नहीं है, अब सड़ो एक घंटा." पूछने पर बोला, "ई रेल पटरी नहीं, इंडिया-पाकिस्तान का बोर्डर है, हम लोगों के लिए. इधर से उधर जाना तबाही का काम है. सिर्फ यही नहीं, गंगजला गुमटी और शिवपुरी बाजार गुमटी तीनों पर ऐसे ही जाम लगता है. गुमटी बंद हो गया तो खुलने का हिसाब नहीं."

इधर, किनारे से निकलकर पटरी पार कर रहे रजनीश कहने लगे, "क्या करें? मजबूरी है, बच्चा स्कूल में वेट कर रहा है. यहां रुक गए तो वह अकेले वहां परेशान होगा. गैरकानूनी है, हम लोग भी समझते हैं." उनके पीछे खड़े श्रीजेश कुमार झा जोड़ते हैं, "खतरनाक भी है. इसी चक्कर में कुछ साल पहले एक आदमी की जान चली गई. हम लोग जान दांव पर लगाकर बंद गुमटी पार करते हैं. कोई ऑप्सने नहीं है."

गंगजला गुमटी पर एंबुलेंस की एक मरीज को गोद में लेकर गेट पार कराते हुए. उसे बचाया न जा सका

दरअसल, सहरसा जंक्शन से होकर गुजरने वाली रेल पटरी इस शहर को दो हिस्सों में बांटती है. सहरसा पूर्वी और सहरसा पश्चिमी. एक से दूसरे हिस्से तक आने के लिए सात जगह रेलवे की गुमटियां हैं. मगर कोसी प्रमंडल का मुख्यालय शहर होने के बावजूद इस शहर में अब तक एक भी रेलवे ओवरब्रिज नहीं बना है.

बंगाली बाजार में रेलवे ओवरब्रिज निर्माण के लिए 2017 से आंदोलन कर रहे सोहन झा बताते हैं, "ऐसा नहीं कि सरकारों ने ओवरब्रिज बनाने की जरूरत नहीं समझी. यहां नब्बे के दशक में ही ओवरब्रिज बनाए जाने की चर्चा शुरू हो गई थी. 2000 ईस्वी में तो बंगाली बाजार गुमटी के पास ओवरब्रिज का शिलान्यास तक हो गया था. मगर वह नहीं बन पाया. 2005 में तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने फिर यहां रेलवे ओवरब्रिज का शिलान्यास किया. वह भी नहीं बना. तीसरी बार 2014 में रेल मंत्री अधीर रंजन चौधरी ने शिलान्यास किया."

तो भी ओवरब्रिज बन नहीं पाया. 2017 से झा और कुछ अन्य लोगों ने कोसी युवा संगठन बनाकर आंदोलन शुरू कर धरना-प्रदर्शन, रेल पटरियों पर बैठकर चक्का जाम, अनशन तक किया. दो बार गिरफ्तारियां हुईं. इससे हुआ यह कि 2019 में रेलवे और बिहार सरकार के पुल निर्माण निगम के बीच इस जगह रेलवे ओवरब्रिज बनाने का समझौता हुआ. उस बात को भी छह साल बीतने वाले हैं. मामला अटका है. आबादी बढ़ने के साथ परेशानी भी बढ़ रही है.

प्रशांत ठाकुर पूर्वी सहरसा में मोटर पार्ट्स का व्यापार करते हैं. वे कहते हैं, "स्थिति इतनी खराब है कि हम लोग पटरी के उस पार जाने की हिम्मत नहीं करते. बच्चों का एडमिशन इसी तरफ के स्कूल में कराया है. गैस कनेक्शन इधर ही लिया. उधर बड़ी सब्जी मंडी है, जहां ताजा और सस्ती सब्जियां मिलती हैं. मेरे घर से मुश्किल से दो किमी दूर है मगर कभी वहां से सब्जियां लाने की हिम्मत नहीं होती."

संस्कृतिकर्मी किसलय कृष्ण का घर पश्चिमी सहरसा में है और वे पूर्वी सहरसा स्थित एक कॉलेज में पढ़ाने जाते हैं. उनके शब्दों में, "शाम को लौटते वक्त पत्नी फोन पर इतना ही पूछती हैं, ईस्ट में हैं या वेस्ट में? यानी अगर वेस्ट में आ गया तो समय से घर पहुंच जाऊंगा. अगर ईस्ट की तरफ हूं तो कब लौटूंगा, पता नहीं."

शहर के चर्चित फोटोग्राफर बिपिन कुमार सिंह कहते हैं, "जाम में फंसना, घंटों इंतजार करना हम लोगों की आदत हो गई है. एंबुलेंस में मरीज को उठाकर इस पार से उस पार कराया जाता है. जैसे अभी एक लड़की की मौत हुई, ऐसे ही कई मरीजों की मौत हुई है. गुमटी बंद होने की वजह से रोगी समय से अस्पताल नहीं पहुंच पाते. यहां तक कि वारदात हो जाने पर समय से पुलिस भी नहीं पहुंच पाती. छात्रों की परीक्षा छूट जाती है. क्या कीजिएगा, शहर के लोगों को सब झेलना पड़ता है."

गंगजला गुमटी के पास बन रहा लाइट ओवरब्रिज

यह संकट कितना गंभीर है, इसे बंगाली बाजार रेलवे गुमटी के गेटमैन के पास से मिले आंकड़ों से समझा जा सकता है. उसके रजिस्टर पर दर्ज आंकड़ों के मुताबिक, 4 जनवरी, शाम चार बजे से 5 जनवरी शाम चार बजे के बीच के 24 घंटों में यह रेलवे गुमटी 12 घंटे 45 मिनट बंद रही. इसे कुल 38 बार बंद किया गया. यह न्यूनतम सात मिनट और अधिकतम 43 मिनट तक बंद रही. जाहिर है, गुमटी खुलने से ज्यादा बंद ही रही. यह अधिकतम 45 मिनट के लिए खुली और एक बार तो सिर्फ दो मिनट के लिए. ज्यादातर 10 से 20 मिनट के लिए ही खुली.

दरअसल, सहरसा की यह रेल गुमटी (गुमटी संख्या 31) भारतीय रेल की शायद सबसे अजीबोगरीब रेल गुमटी है. यहां गुमटी सिर्फ रेलगाड़ियों के आने-जाने के लिए ही बंद नहीं होती. अनौपचारिक बातचीत में वरिष्ठ स्टेशन अधीक्षक सुभाष चंद्र झा बताते हैं, "हमारे ज्यादातर प्लेटफॉर्म जहां खत्म होते हैं, वहीं से गुमटी का इलाका शुरू होता है. इसलिए अगर कोई ट्रेन प्लेटफॉर्म पर आ जाए, तब भी गुमटी को बंद करना पड़ता है. इसके अलावा कई ट्रेनें ऐसी हैं, जो यहीं से शुरू होती हैं. ऐसे में उनके इंजन बदलने के लिए भी हमें गुमटी बंद करने की जरूरत होती है. इस स्टेशन से होकर रोजाना 38 सवारी गाड़ियां और 12-15 मालगाड़ियां गुजरती हैं. सबका दबाव रहता है."

झा यह भी कहते हैं, "ओवरब्रिज न बनने से सहरसा शहर के लोगों को तो परेशानी है ही, रेलवे स्टाफ भी कम परेशान नहीं होता. बार-बार गेट बंद करना और खोलना कम मुश्किल का काम नहीं. लोगों का गुस्सा भी झेलना होता है. इन गुमटियों पर वीआइपी भी फंसते हैं. वे हमें फोन करते हैं. पर हम भी क्या करें. एक बार गेट बंद हो गया तो हम ट्रेन को पास कराए बिना अपने जीएम के लिए भी गुमटी नहीं खोल सकते. 19 दिसंबर को युवती के साथ जो घटना हुई, उसके बाद मैंने अपने स्तर से गुमटी के पास एक स्ट्रेचर रखवा दिया, ताकि इस तरह मरीज को गोद में उठाकर गुमटी पार न कराना पड़े."

रेलवे ने लोगों के बढ़ते गुस्से को देखते हुए गंगजला गुमटी के पास एक लाइट ओवरब्रिज बनवाना शुरू कराया है. पर उससे सिर्फ बाइक वाले ही पार कर पाएंगे. उसका डिजाइन ऐसा है, जो लोगों के लिए बहुत सुविधाजनक नहीं है.

ऐसे में बड़ा सवाल उठ रहा है कि सभी के राजी होने पर ही शहर में रेलवे ओवरब्रिज बन क्यों नहीं पा रहा? सोहन झा इसे एक संदर्भ देते हैं, ''रेलवे ने 2019 में यहां ओवरब्रिज बनाने की सहमति दे दी थी और राशि का आवंटन भी बिहार सरकार को कर दिया था. मगर बिहार सरकार की गति सुस्त थी. मैंने अनशन किया, दो बार मुख्यमंत्री से मुलाकात की. तब 2021 में बिहार की कैबिनेट ने मंजूरी दी. टेंडर भी निकल गया. सब कुछ ठीक चल रहा था. तभी शहर के कुछ व्यापारियों ने यह कहकर इसका विरोध करना शुरू कर दिया कि ओवरब्रिज बना तो बाजार उजड़ जाएगा. उन्होंने राज्यसभा सांसद मनोज झा, विधायक चेतन आनंद और जद (यू) नेता ललन सर्राफ को अपनी बात समझा दी और इन लोगों ने सदन में मामला उठाना शुरू कर दिया कि ओवरब्रिज बनने से बाजार उजड़ जाएगा. मामला अटक गया. व्यवसायी अदालत चले गए."

दरअसल, व्यवसाइयों का कहना था कि ओवरब्रिज या तो दूसरी जगह बने या इसकी चौड़ाई कम कर दी जाए. अभी जिस डिजाइन में यह बनने वाला है उससे शहर की कई बड़ी दुकानें इसकी चपेट में आ जाएंगी. ओवरब्रिज की जगह और डिजाइन में बदलाव कर रहे व्यापारियों के संगठन के अध्यक्ष शंभु प्रसाद गुप्ता कहते हैं, "यह कहना गलत है कि हम ओवरब्रिज के विरोध में हैं. हमारे तो संगठन का नाम और नारा ही है, 'बाजार बचाओ, ब्रिज बनाओ.’ हमने कभी इसके निर्माण में अवरोध के लिए धरना-प्रदर्शन नहीं किया. हम बस इतना कहते हैं कि शंकर चौक, डीबी रोड और थाना चौक ही सहरसा शहर की हृदयस्थली है. शहर का सबसे अच्छा बाजार भी इसी इलाके में है. इस छोटे-से इलाके में हर चीज अच्छी गुणवत्ता में मिल जाती है. इसलिए सांसद मनोज झा ने कहा कि यहां ओवरब्रिज बना तो सहरसा का बाजार उजड़ जाएगा."

अभी जो ओवरब्रिज की गुमटी का डिजाइन बना है, उसमें अप्रोच रोड इन्हीं इलाकों से होकर गुजरने वाली है. ओवरब्रिज की चौड़ाई 80 फुट प्रस्तावित है, जिससे कई दुकानों को तोड़ना पड़ेगा. शंभु कहते हैं, ''विकल्प के तौर पर बिस्कोमान गुमटी या सर्वा गुमटी के पास ओवरब्रिज बनाया जा सकता है और यहां गंगजला गुमटी की तरह एक लाइट ओवरब्रिज बन सकता है. हम चाहते हैं कि इस शहर के तमाम जनप्रतिनिधि जिनमें राज्यसभा और लोकसभा दोनों के सांसद, विधायक, विधान परिषद सदस्य शामिल हैं, सभी बैठें और समस्या का समाधान निकालें. मगर यह हो नहीं रहा."

दरअसल, इन व्यवसाइयों ने इस मामले को लेकर पटना हाइकोर्ट में मुकदमा दायर किया था. शंभु वकील भी हैं. वे बताते हैं, "उस मामले में हाइकोर्ट ने कहा था कि अगले आदेश तक कोई तोड़-फोड़ न हो. अदालत ने सरकार से वैकल्पिक रास्ता अपनाने का सुझाव दिया था. जिस पर बिहार सरकार और पुल निगम तो राजी हो गया लेकिन रेलवे राजी न हुआ." वैकल्पिक तरीके में पुल की चौड़ाई घटाकर 60 फुट करने की बात कही जा रही है. व्यवसायी उससे भी सहमत नहीं हैं, वे चौड़ाई 50 फुट करने पर जोर दे रहे हैं.

इधर, इस मसले को लेकर बिहार विधान परिषद में कई बार मांग उठा चुके विधायक डॉ. अजय कुमार सिंह कहते हैं, "यह कहना गलत होगा कि इस पुल के बनने से बाजार उजड़ जाएगा. पुल की वजह से प्रभावित होने वाले जो 120 दुकानदार चिन्हित हैं, जिनमें से 90 ने तो सरकारी जमीन पर ही अपनी दुकान बनाई हुई है. बमुश्किल 29-30 लोगों को मुआवजे की जरूरत होगी, जिसके लिए सरकार ने सौ करोड़ रुपए का प्रावधान भी किया है. ऐसे में पीढ़ियों से परेशानी झेल रहे लोगों की तकलीफों पर पहले विचार किया जाना चाहिए. मैं खुद इस शहर का वासी हूं और इसकी पीड़ा को भोगते हुए बड़ा हुआ हूं. यह काम प्राथमिकता के साथ होना चाहिए."

वे एक आरटीआइ का हवाला देते हुए कहते हैं कि अदालत ने पुल निर्माण पर कोई रोक नहीं लगाई है. इसलिए पुल निर्माण रोकना ठीक नहीं. 23 जुलाई, 2024 को विधान परिषद में उनके उठाए गए इस मुद्दे पर जवाब देते हुए उप-मुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा ने कहा था, "जब रेलवे ने संशोधित डिजाइन पर सहमति नहीं दी तो पुल निर्माण निगम ने 27 जुलाई, 2023 को पुराने डिजाइन पर ही निविदा निकाली है. अदालत में अवमानना वाद दायर किया गया है, फिर भी हम लोग अपनी प्रक्रिया जारी किए हुए हैं." इसके बावजूद पुल निर्माण की दिशा में कोई सकारात्मक पहल नजर नहीं आ रही.

इस पुल से संबंधित टेंडर आज भी बिहार राज्य पुल निर्माण निगम के पोर्टल पर पड़ा है. वहां उपलब्ध सूचना के मुताबिक, 22 जनवरी, 2022 को इस ओवरब्रिज को प्रशासनिक स्वीकृति मिल गई थी. इसके तहत 115 मीटर का पुल और 1.17 किमी का एप्रोच पथ बनना है. इसकी निर्माण लागत 70.91 करोड़ रुपए रखी गई है. 27 जुलाई, 2023 को इसका दोबारा टेंडर निकाला गया है और बिड करने की तारीख को बढ़ाकर 27 फरवरी, 2025 तक किया गया है. अजय कुमार सिंह आशान्वित हैं कि इस बार ओवरब्रिज बन जाएगा. उन्होंने एक स्थानीय अखबार में इस आशय के बयान भी दिए हैं.

मगर सहरसा के लोगों को भरोसा नहीं हो रहा. फोटोग्राफर बिपिन कहते हैं, "हम लोग घोषणाओं से त्रस्त हैं. अब किसी घोषणा पर भरोसा ही नहीं होता. इतनी बार टेंडर निकला, शिलान्यास हुआ मगर पुल नहीं बना. हर चुनाव में भरोसा दिलाया जाता है कि पुल बन जाएगा, लेकिन बनता नहीं. इसलिए यहां के लोग ऐसी बातों को एक कान से सुनते हैं, दूसरे से निकाल देते हैं. जब तक पुल बन नहीं जाता, तब तक सहरसा के लोगों को किसी बात पर भरोसा नहीं होने वाला."

कब-कब हुआ शिलान्यास

22 अप्रैल, 2000
लागत: 9.35 करोड़ रु.
तत्कालीन रेल मंत्री दिग्विजय सिंह के हाथों

12 जून, 2005
लागत: 15 करोड़ रु.
तत्कालीन रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव के हाथों

22 फरवरी, 2014
लागत: 57.54 करोड़ रु.
तत्कालीन रेल मंत्री अधीर रंजन चौधरी के हाथों

शहर में रेलवे गुमटी की
कुल संख्या
7

जिन गुमटियों पर भारी 
जाम लगता है
3
(शिवपुरी, बंगाली बाजार, गंगजला)

बंगाली बाजार गुमटी का हाल

24 में से 12.45 घंटे बंद

38 बार रोजाना बंद होती है गुमटी

45 मिनट तक बंद रहती है कई बार

8 घंटे बंद रहती है सुबह छह से रात दस बजे के बीच

38 ट्रेन और 12 मालगाड़ियों के स्टेशन पर खड़े रहने से भी बंद हो जाती है गुमटी

कई बार तो बस दो मिनट के लिए खुलती है

ओवरब्रिज का निर्माण जल्द

बिहार राज्य पुल निर्माण विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि अब तक रेलवे से अनापत्ति न मिलने और अदालत में मामला लंबित होने की वजह से सहरसा के रेल ओवरब्रिज का काम अटका हुआ था. फिलहाल, अदालत ने यह कहा है कि वह इस मसले पर जल्द फैसला सुनाएगी. हमें उम्मीद है कि वह सकारात्मक फैसला सुनाएगी और फरवरी तक टेंडर डालने की तारीख है. उम्मीद है कि टेंडर निष्पादन के बाद काम शुरू हो जाएगा.

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