उपन्यास 'द फाउंटेनहेड' में एक काल्पनिक पात्र एल्सवर्थ टूही है, जो 'कलम में तलवार से ज्यादा ताकत है' विषय पर दोनों पक्ष से बहस जीतने में सक्षम था.
कुछ इसी तरह भारतीय राजनीति के चक्र को अपने किसी भी हाथ की उंगली पर घुमाने में माहिर नीतीश कुमार ऐन रैंड के समाजवादी से बेहतर हैं.
वे सत्ता का सच सामने रख सकते हैं तो सत्ता के सामने भी सच बोल सकते हैं. उनकी कलम अदृश्य स्याही से चलती है, और उन्हें तलवार की भी कोई जरूरत नहीं. बस सही मौके पर पैनी नजर रखना ही काफी है.
सौरमंडल में चक्कर काटते ग्रह की तरह उन्हें भी 'सूर्य' के सबसे करीब रहना पसंद है. यही वजह है कि भारतीय राजनीति की आकाशगंगा में 2024 के मध्य में आम चुनाव के दौरान जो कुछ भी सियासी दांव पर लगा था, उनकी स्थिति के गुरुत्वाकर्षण ने उसे एक अलग ही दिशा दे दी. नतीजा, वे मोदी 3.0 में विपक्षी गठबंधन इंडिया ब्लॉक की तुलना में ज्यादा मजबूत होकर उभरे.
जनवरी मध्य की बात है, सामान्य रूप से सौहार्दपूर्ण माहौल में बिहार के मुख्यमंत्री को पारंपरिक मकर संक्रांति भोज के लिए अपने आधिकारिक आवास से लालू प्रसाद यादव के घर तक पैदल जाते देखा गया. इसके बाद का नजारा भी हमेशा की तरह ही था; नीतीश ने थोड़ा दही-चूड़ा खाया और 20 मिनट के बाद वहां से चुपचाप चले गए. हालांकि, इसे लेकर कई अटकलें भी लगाई गईं. लेकिन इसके बाद जो हुआ, वह शायद किसी ने नहीं सोचा होगा.
ठीक 13 दिन बाद 28 जनवरी को राजद और कांग्रेस के साथ उनका गठबंधन टूट गया. उन्होंने मुख्यमंत्री के तौर पर औपचारिक तौर पर इस्तीफा दिया, फिर नए सिरे से शपथ ग्रहण और कैबिनेट गठन. अब बिहार में एनडीए की सरकार थी. हालांकि, यह कदम काफी जोखिम भरा था. सियासी पंडितों ने उन्हें गलत ठहराने में कोई कसर नहीं छोड़ी.
कहा गया कि भाजपा लोकसभा चुनाव में उन्हें इस्तेमाल करने के बाद अधर में छोड़ देगी. लेकिन नतीजा तो कुछ और ही निकला, जद (यू) एक दर्जन महत्वपूर्ण सीटें हासिल करके मजबूत स्थिति में था. और भाजपा के केंद्र की सत्ता पर काबिज रहने के लिए अपरिहार्य बन चुका था.
उन्होंने अब तक जो भी राजनैतिक फैसले लिए या जो भी कदम उठाए, उनमें से यह सबसे महत्वपूर्ण रहा. खासकर इस वजह से भी कि 2020 के चुनाव में उनका कद जिस तरह घटा था, इसने उसकी भरपाई कर दी. उस समय जद (यू) 243 सदस्यीय सदन में सिर्फ 43 सीटें जीतकर तीसरे स्थान पर रहा था.
2024 की गर्मियों में हमने नीतीश की पार्टी को 74 विधानसभा क्षेत्रों में आगे पाया, जो भाजपा की 68 सीटों की तुलना में ज्यादा थी और राजद की 35 सीटों से काफी आगे थी. साल का अंत आते-आते उन्होंने अपनी राजनैतिक हैसियत को फिर नए मुकाम पर पहुंचा दिया.
नीतीश का साथ मिलने के कारण नवंबर में सभी चार उपचुनावों में एनडीए के जीतने के बाद भाजपा ने राज्य में अपने दम पर आगे बढ़ने की रणनीति को फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया और बिहार में 2025 के विधानसभा चुनाव के लिए उन्हें ही एनडीए का चेहरा घोषित कर दिया. यह नीतीश के हर हाल में नए सिरे से खुद को साबित कर देने का प्रमाण है.
कभी इधर कभी उधर
› सभी विपक्षी पार्टियों को भाजपा के खिलाफ एकजुट कर 2023 में इंडिया गठबंधन बनाने के पीछे नीतीश कुमार ही थे लेकिन 2024 में चौंकाते हुए उन्होंने पाला बदल लिया; राजद की अगुआई वाले महागठबंधन से नाता तोड़कर जनवरी में भाजपा की अगुआई वाले एनडीए में शामिल हो गए.
› इस साल लोकसभा चुनाव में नीतीश के जद (यू) ने बिहार में न सिर्फ भाजपा की सीटों की बराबरी की, बल्कि अपने 12 सांसदों के साथ वे केंद्र में भाजपा के लिए अपरिहार्य भी बन गए.
› किंग मेकर की अपनी हैसियत के बूते उन्होंने केंद्रीय बजट से बिहार के लिए विशेष योजनाओं को मंजूरी दिलाई.
› नवंबर में चार विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हुआ और नीतीश के नेतृत्व में एनडीए ने सभी पर जीत हासिल की.
साल खत्म होते-होते नीतीश के राजनैतिक पुनर्जन्म की प्रक्रिया भी पूरा हो गई. भाजपा ने 2025 के चुनाव के लिए उन्हें एनडीए का चेहरा बना दिया है.

