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सुर्खियों के सरताज 2024: झारखंड चुनाव में कैसे पत्नी के साथ मिलकर हेमंत सोरेन ने पलट दी बाजी?

सीएम हेमंत सोरेन और उनकी पत्नी कल्पना सोरेन ने झारखंड विधानसभा चुनाव में राजनैतिक खेल में बाजी पलटते हुए अपनी लगभग हार की स्थिति को एक असाधारण जीत में बदल डाला.

Newsmakers 2024
हेमंत सोरेन, मुख्यमंत्री, झारखंड, कल्पना सोरेन, विधायक और हेमंत की पत्नी
अपडेटेड 23 जनवरी , 2025

झारखंड में 2024 में बड़ा राजनैतिक बदलाव देखने को मिला. इस बदलाव के केंद्र में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और उनकी पत्नी कल्पना सोरेन थे.

दोनों ने कई कठिन राजनैतिक चुनौतियों का सामना किया. इसके बाद उनकी वापसी इतनी मजबूत हुई कि वे अब राजनीति की एक शानदार कहानी बन गए हैं.

नाटक की शुरुआत 31 जनवरी को हुई. उस दिन अपने आधिकारिक आवास पर कई घंटों तक चली पूछताछ के बाद मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप में प्रवर्तन निदेशालय की ओर से अपनी गिरफ्तारी से पहले हेमंत सोरेन ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. बहुत-से लोगों के लिए, ऐसी घटना राजनैतिक करियर के अंत का संकेत होती. मगर हेमंत और उनकी पत्नी कल्पना के लिए यह एक नई शुरुआत थी.

नेतृत्व को लेकर उभरी शून्यता और भूले जाने की आशंका के बावजूद इस जोड़े ने धैर्य, योजना और बदलाव के साथ एक अभियान चलाया. और इस संघर्ष का परिणाम नवंबर में एक शानदार चुनावी जीत के रूप में सामने आया.

साल की शुरुआत मुश्किल थी. अपने पिता और झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के संस्थापक शिबू सोरेन की बिगड़ती तबीयत के कारण हेमंत को मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद अपनी कुर्सी चंपाई सोरेन को सौंपनी पड़ी जो भरोसेमंद तो थे मगर उतने तेजतर्रार नहीं. हेमंत के लिए वह इतनी निराशा का दौर था कि मार्च में उनकी भाभी सीता सोरेन तक ने पार्टी छोड़कर विरोधी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का दामन थाम लिया. यह जेएमएम के लिए एक बड़ा झटका था.

चंपाई सोरेन के कमजोर नेतृत्व में जेएमएम डगमगा गया. इस बीच हेमंत न्यायिक हिरासत में होने की वजह से लोकसभा चुनाव में प्रचार नहीं कर सके. इसका परिणाम यह हुआ कि भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने झारखंड की 14 लोकसभा सीटों में से 9 पर जीत हासिल की, और वह 81 विधानसभा सीटों में से 50 पर आगे रहा. हालांकि, जेएमएम संकट में था, फिर भी चुनाव परिणाम पूरी तरह निराशाजनक नहीं रहे.

जेएमएम और कांग्रेस का गठबंधन अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सभी 5 सीटों पर जीतने में कामयाब रहा. यह जीत मुख्य रूप से कल्पना सोरेन के चुनाव प्रचार के कारण मिली थी, जो जनता के बीच यह संदेश पहुंचाने में कामयाब रहीं कि हेमंत सोरेन के साथ अन्याय हुआ है.

इस तरह से पहले दौर में कल्पना अप्रत्याशित रूप से संकटमोचन के रूप में उभरीं. उन्होंने इससे पहले राजनीति से दूरी बनाकर रखी थी और एक शांत जीवनसाथी की भूमिका में ही थीं. वे एक सैन्य अधिकारी की बेटी हैं और राजनीति में नहीं आना चाहती थीं. लेकिन जब उनके पति हेमंत को जेल हुई, तो उन्हें राजनीति में कदम रखना पड़ा. जून तक उन्होंने गांडेय उप-चुनाव लड़ा तथा जीत हासिल की और इस तरह राजनीति में रुचि न रखने वाली कल्पना एक मजबूत राजनैतिक ताकत बनकर उभरीं.

अपने पिता की झलक वाली बढ़ी दाढ़ी के साथ 28 जून को जब हेमंत जेल से बाहर आए, तो स्थिति उथल-पुथल भरी थी. मगर राजनीति में कल्पना की सक्रियता उनके लिए एक बड़ी राहत थी. हेमंत की गैर-मौजूदगी में कल्पना ने जेएमएम को संभालकर रखा और उनकी बढ़ती लोकप्रियता भी साफ नजर आ रही थी. हालांकि, चुनौतियां कम न थीं. हेमंत ने जब मुख्यमंत्री की कुर्सी पर फिर दावेदारी जताई तो 4 जुलाई को चंपाई सोरेन को मुख्यमंत्री पद छोडऩा पड़ा और अगस्त में वे भाजपा में शामिल हो गए. यह हेमंत के लिए एक बड़ा झटका था. मगर हेमंत और कल्पना डटे रहे और इस संकट में तपकर बाहर निकले.

इसके बाद जो हुआ, वह राजनैतिक चतुराई की एक बेहतरीन मिसाल है. हेमंत की वापसी ने सत्ता विरोधी लहर का मुकाबला किया और जेएमएम की लोकप्रियता को फिर से मजबूत किया. अगस्त में शुरू की गई मइयां सम्मान योजना में लोकलुभावन आकर्षण को जोड़ते हुए पचास लाख से ज्यादा महिलाओं के लिए वित्तीय सहायता देने की व्यवस्था की गई. यह एक कारगर रणनीतिक कदम साबित हुआ. इस बीच, नवंबर में होने वाले विधानसभा चुनाव करीब आ रहे थे. हेमंत और कल्पना की संयुक्त ताकत ने जेएमएम की किस्मत को नए सिरे से लिखना शुरू किया.

कल्पना, जो अब जेएमएम की प्रचार मशीनरी की मुख्य ताकत बन चुकी थीं, ने गिरिडीह में खुद को स्थापित किया और पूरे राज्य में अथक मेहनत के साथ प्रचार किया. उनकी आकर्षक शैली और महिला वोटरों से जुड़ने की क्षमता ने अदभु रत नतीजे दिए. सौ से ज्यादा रैलियों के बाद वे एक मजबूत नेता के रूप में उभरीं. हेमंत ने रांची और आसपास के क्षेत्रों में रैलियों को संबोधित करते हुए उनके प्रयासों की सराहना की. दोनों के बीच के सामंजस्य और साझेदारी ने भाजपा के मजबूत केंद्रीय नेतृत्व को परास्त कर दिया.

उनके परिश्रम का फल 23 नवंबर को सामने आया जब जेएमएम के नेतृत्व वाले गठबंधन ने एनडीए की 24 सीटों के मुकाबले 56 सीटें जीतकर चुनाव में ऐतिहासिक जीत हासिल की. झारखंड के इतिहास में यह पहली बार था, जब कोई मुख्यमंत्री सत्ता में वापस आया, और हेमंत सोरेन ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली.

28 नवंबर को उनका चौथा कार्यकाल शुरू हुआ. यह जीत केवल ऐतिहासिक नहीं थी, बल्कि यह हेमंत और कल्पना के लचीलेपन और रणनीतिक कौशल का प्रतीक भी थी.

हेमंत-कल्पना की मेहनत का फल २३ नवंबर को सामने आया जब जेएमएम के नेतृत्व में इंडिया ब्लॉक ने 56 सीटें जीत लीं और एनडीए 24 सीटों पर सिमट गया.

सफलता  का साथ
● जनवरी में हेमंत की गिरफ्तारी और इस्तीफे के साथ उनके और उनकी पत्नी कल्पना सोरेन के साहसिक सियासी सफर की शुरुआत हुई.
● शुरू में कल्पना सियासत में आने की इच्छुक नहीं थीं मगर हेमंत की गैर-मौजूदगी में उन्होंने सियासत में कदम रखा और जून में गांडेय उप-चुनाव में जीत दर्ज की. इस तरह वे मजबूत सियासी ताकत बनकर उभरीं.
● जुलाई में हेमंत की वापसी के साथ मइयां सम्मान योजना सरीखी बड़ी पहलों और कल्पना के चुनावी अभियान की बदौलत जेएमएम अपनी लोकप्रियता बरकरार रखने में कामयाब रही.
● नवंबर में हुए विधानसभा चुनाव में जेएमएम की अगुआई में इंडिया ब्लॉक ने 56 सीटों पर जीत हासिल की और हेमंत रिकॉर्ड चौथी बार मुख्यमंत्री बनने में कामयाब रहे.
●कल्पना जब 23 नवंबर को गिरिडीह से रांची पहुंचीं, चुनाव नतीजे साफ हो चुके थे. हेमंत ने एयरपोर्ट पर एक गुलदस्ते के साथ उनका स्वागत किया और उन्हें ''स्टार प्रचारक’’ करार दिया.

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