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सुर्खियों के सरताज 2024: फडणवीस, शिंदे और पवार की तिकड़ी ने कैसे महा विकास अघाड़ी को हराया?

महाराष्ट्र की राजनीति में फडणवीस, शिंदे और अजीत पवार को एक ऐसी तिकड़ी माना जाता था, जो मौका मिलते ही एक-दूसरे को मात देने की फिराक में रहती थी. लेकिन विधानसभा चुनावों में बंपर सफलता ने इस धारणा के बदलकर रख दिया

Newsmakers 2024
महा तिकड़ी (बाएं से दाएं) शिंदे फडणवीस और अजित पवार
अपडेटेड 22 जनवरी , 2025

नवंबर की बड़ी जंग से पहले महा विकास अघाड़ी (एमवीए) के भीतर चिंता का कोई नामो-निशान था तो वे इसे अच्छी तरह छिपाने में सफल रहे थे. ज्यादा संभावना यही है कि वे लोकसभा चुनाव के अच्छे नतीजों की खुमारी में थे.

महाराष्ट्र में लोकसभा की 48 सीटों में 31 पर जीत, 153 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त. उन्होंने बड़े आराम से विधानसभा चुनाव में अपनी जीत तय मान ली थी. विपक्षी तिकड़ी गठबंधन में अपना-अपना वर्चस्व हासिल करने के लिए आखिरी समय तक लड़ती रही.

तो दूसरी तरफ एक और तिकड़ी थी जो एक अलग ही इबारत लिखने की कोशिश में जुटी थी, और उनका लक्ष्य था एकजुट होकर एमवीए को पटखनी देना. देवेंद्र फडणवीस, अजित पवार और एकनाथ शिंदे: इनमें एक की छवि कथित तौर पर जननेता वाली नहीं थी.

दूसरे का जनाधार सिमटता जा रहा था और एक का सियासी कद तो बढ़ा था लेकिन बाकी दोनों का बेड़ा पार लगाने के लिए यह पर्याप्त नहीं लग रहा था. हालांकि, उन्होंने अपनी इस असमानता को अपने काम के ऊपर हावी नहीं होने दिया. यही मंत्र बेहद कारगर भी साबित हुआ और महायुति के एकतरफा शानदार प्रदर्शन की वजह बना.

महायुति के तौर पर एक नए सियासी प्रयोग के समय से ही शिंदे एक पहेली बने रहे थे. उन्हें राजनीति का ककहरा ठाणे के कद्दावर नेता आनंद दिघे से सीखने को मिला था, जिन्हें किसी भी तरह बाल ठाकरे से कम नहीं आंका जाता था. मराठा आंदोलन के दौरान पहली बार इसका पुख्ता संकेत मिला कि शिंदे को बहुत आसानी से दरकिनार नहीं किया जा सकता.

भले ही ऐसी अटकलों में कोई दम न हो कि इस पूरी पटकथा के लेखक वही थे, लेकिन एक मराठा के तौर पर उन्होंने इस मामले में पूरी मजबूती और सूझबूझ के साथ कदम आगे बढ़ाया, जबकि बाकी नेता इससे किनारा करने में लगे थे. जमीनी स्तर पर दिखी उनकी महारत ने यह बात गलत साबित कर दी कि वह ऐसे राजनेता हैं, जिसका कोई व्यापक जनाधार नहीं है. उनकी पार्टी ने सात सीटें हासिल की, जो प्रतिद्वंद्वी सेना गुट की तुलना में महज दो कम थीं.

आखिरकार यह साबित हो चुका था कि उन्होंने सिर्फ कानूनी जोड़तोड़ से 'असली सेना’ का तमगा हासिल नहीं किया. उसके बाद जब उन्होंने लाडकी बहिन समेत अपनी तमाम कल्याणकारी योजनाओं को विस्तार दिया तो करीब 5.5 करोड़ लाभार्थियों के बीच उनकी धाक पूरी तरह जम चुकी थी. आखिरकार, शानदार ढंग से 57 सीटों पर जीत के साथ उन्हें अपनी मेहनत का फल भी मिला.

जहां तक, अजित दादा की बात है तो हर किसी की राय यही थी कि वे महायुति की सबसे कमजोर कड़ी हैं. अजित की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भाजपा के आधारभूत ढांचे और कार्यकर्ताओं के साथ कोई साम्य नहीं था. उनके चाचा शरद पवार पुराने माहिर खिलाड़ी हैं, जो किसी भी तरह से हार मानने को तैयार नहीं थे.

यह धारणा तब और गहरा गई जब अजित के नेतृत्व वाली एनसीपी को लोकसभा की चार सीटों पर उम्मीदवार उतारने के बाद सिर्फ एक पर सफलता मिली. यहां तक, उनकी पत्नी सुनेत्रा को भी बारामती सीट पर सीनियर पवार की बेटी सुप्रिया सुले के हाथों हार का सामना करना पड़ा. लेकिन उन्होंने छवि सुधारने के लिए डिजाइन बॉक्स के राजनैतिक सलाहकार नरेश अरोड़ा को नियुक्त किया.

उन्होंने हमेशा से बनी अहंकारी, आक्रामक छवि के उलट मुस्कुराता चेहरा सामने रखा. राज्यव्यापी यात्रा की, सीटों का अच्छी तरह विश्लेषण करने के बाद घोषणापत्र जारी किया और घर-घर जाकर मतदाताओं से संपर्क साधा. उन्होंने पवार सीनियर पर निजी हमले बंद कर दिए. नतीजा, उन्होंने 57 सीटों पर चुनाव लड़ा और 41 पर जीत दर्ज की.

लेकिन असली इनाम तो फडणवीस के खाते में आया, जिन्हें उनकी पार्टी के शीर्ष नेताओं ने एक कनिष्ठ के तौर पर उपमुख्यमंत्री की भूमिका के लिए राजी कर लिया था और फिर एक और उपमुख्यमंत्री को शामिल किए जाने से उनके अधिकारों में और कटौती हो गई. उनकी बेचैनी उस समय चरम पर पहुंच गई जब मराठा कार्यकर्ता मनोज जरांगे पाटील ने उन पर हमले शुरू कर दिए. जब भाजपा को लोकसभा में झटका लगा तो ऐसा नहीं लगा कि इतनी जल्दी इससे उबर पाएगी.

लेकिन इस बेहद मुश्किल घड़ी में भी उन्होंने उम्मीद नहीं छोड़ी. उनकी पार्टी ने अपना अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन किया और महाराष्ट्र की 288 सदस्यीय विधानसभा में महायुति को मिली 230 सीटों में से 132 अकेले भाजपा के खाते में आईं. फडणवीस के लिए वही पंक्तियां दोहराने का समय था, जो उन्होंने 2019 में तब पढ़ी थीं जब सत्ता में वापसी की उनकी तैयारी को उद्धव ठाकरे ने नाकाम कर दिया था. उन्होंने कहा था, ''मेरा पानी उतरता देख मेरे किनारे घर मत बसा लेना/मैं समंदर हूं, लौटकर वापस आऊंगा.’’

—धवल एस. कुलकर्णी

यह आभास कि वे इस कार्य के योग्य नहीं थे, उनकी भारी जीत को  घातक हमले जैसा चौंकाने वाला और हैरान करने वाला हासिल बना गया.

ये सबक हुए हासिल
● शिंदे की असली ताकत का अंदाजा पहली बार तब हुआ, जब उनके नेतृत्व में शिवसेना ने सात लोकसभा सीटों पर जीत हासिल की. उन्होंने कल्याणकारी योजनाओं का पिटारा खोला और नवंबर के विधानसभा चुनाव में 57 सीटों पर जीत हासिल की.

● अजित को महायुति में एक कमजोर कड़ी के तौर पर देखा जा रहा था. लेकिन उन्होंने अपनी राजनीति को नए सिरे से चमकाया और 41 सीटों पर जीत के साथ मजबूत होकर उभरे.

● लेकिन फडणवीस इन दोनों से आगे रहे. जमीनी स्तर पर ओबीसी और प्रमुख गैर-मराठा जातियों को लामबंद करके और आरएसएस की नाराजगी को दूर कर लिए जाने की बदौलत उन्होंने भाजपा के खाते में 132 सीटें जोड़ी, और एक बार फिर सीएम की कुर्सी के हकदार बने.

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