
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ 26 अगस्त को आगरा में ताज महल के पश्चिमी द्वार स्थित पुरानी मंडी चौराहे पर दुर्गादास राठौर की प्रतिमा का अनावरण करने पहुंचे थे. इस मौके पर आयोजित सभा में उन्होंने कहा, "अगर हम एक रहेंगे तो नेक रहेंगे, सुरक्षित रहेंगे. बटेंगे तो कटेंगे. बांग्लादेश में देख रहे हो न, वो गलती यहां नहीं होनी चाहिए..."
यहीं से 'बटेंगे तो कटेंगे' का नारा योगी आदित्यनाथ की हिंदुत्व की राजनीति का पर्याय बन गया. दीपावली के पटाखों का शोर जैसे ही थमा, योगी के नारे को काउंटर करने के लिए समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने मोर्चा संभाला.
अखिलेश ने 2 नवंबर को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर एक पोस्ट में मुख्यमंत्री योगी या किसी अन्य नेता का नाम लिए बिना लिखा, "उनका 'नकारात्मक नारा' उनकी निराशा और विफलता का प्रतीक है. इस नारे ने साबित कर दिया है कि जो 10 फीसद मतदाता बचे हैं वे भी पार्टी छोड़ने के कगार पर हैं, इसीलिए वे उन्हें डराकर एकजुट करने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन ऐसा कुछ नहीं होने वाला है." 'बटेंगे तो कटेंगे' के नारे के संदर्भ में अखिलेश ने यह भी लिखा कि देश के इतिहास में यह नारा 'निकृष्टतम-नारे' के रूप में दर्ज होगा और उनके राजनैतिक पतन के अंतिम अध्याय के रूप में आखिरी 'शाब्दिक कील-सा' साबित होगा.
योगी के नारे के सामने अखिलेश ने पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वोट बैंक में एकता लाने के लिए 'जुड़ेंगे तो जीतेंगे' का नारा लगाया. इसके बाद सपा की होर्डिंग और बैनर पर 'न बटेंगे न कटेंगे, पीडीए के संग रहेंगे.', 'जुड़ेंगे तो जीतेंगे' जैसे नारे ध्यान खींचने लगे.

2024 के लोकसभा चुनावों के बाद, उत्तर प्रदेश में नौ विधानसभा सीटों के लिए होने वाले उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) और समाजवादी पार्टी-कांग्रेस के नेतृत्व वाले इंडिया गठबंधन के बीच एक और शक्ति प्रदर्शन का मैदान तैयार हो गया है. केंद्रीय चुनाव आयोग ने 15 अक्तूबर को उपचुनाव की घोषणा के दौरान यूपी के नौ विधानसभा क्षेत्रों में 13 नवंबर को मतदान की तारीख तय की थी, जिसे अब 20 नवंबर कर दिया गया है. वोटों की गिनती 23 नवंबर को होगी.
महाराष्ट्र और झारखंड विधानसभा चुनावों के साथ होने वाले यूपी उपचुनावों के नतीजे राज्य की राजनीति पर बड़ा असर डालेंगे, खासकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की राजनैतिक क्षमता पर जो उपचुनाव में बीजेपी गठबंधन के अभियान का नेतृत्व कर रहे हैं. वहीं समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव की पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक पर आधारित पीडीए रणनीति की भी परीक्षा होगी. सपा ने 2024 के लोकसभा चुनाव में राज्य की 80 में से 37 सीटें जीतकर बीजेपी के ओबीसी समर्थन आधार में सेंध लगाई तो यूपी में बीजेपी की लोकसभा सीटें 2019 में 62 से घटकर 33 रह गईं. अगर लोकसभा चुनाव में उपचुनाव वाली नौ विधानसभा सीटों पर पार्टियों के प्रदर्शन पर नजर डाली जाए तो सपा ने पांच, कांग्रेस ने एक सीट पर बढ़त बनाई थी जबकि बीजेपी, राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) और अपना दल (सोनेलाल) ने एक-एक सीट पर बढ़त बनाई थी.
समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने अपने सफल पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक यानी पीडीए फॉर्मूले के साथ एनडीए से मुकाबला करने की योजना बनाई है. उन्होंने स्थानीय पार्टी क्षत्रपों के प्रभाव पर भरोसा करते हुए, पांच विधानसभा सीटों पर स्थानीय नेताओं के परिवार के सदस्यों को मैदान में उतारा है. सपा ने नौ में से तीन टिकट पिछड़ी जातियों को और दो दलित को दिए हैं जबकि चार मुसलमानों पर दांव लगाया है. खास बात यह भी है कि नौ में पांच सीटों पर महिला उम्मीदवार उतारकर सपा ने आधी आबादी को भी साधने की कोशिश की है.
फैजाबाद लोकसभा सीट पर पासी-दलित जाति के उम्मीदवार अवधेश प्रसाद को सपा का उम्मीदवार बनाकर चुनाव जीतने की रणनीति को अखिलेश यादव ने गाजियाबाद विधानसभा सीट पर भी आजमाया है. इस सामान्य सीट पर सपा ने जाटव जाति के राज सिंह जाटव को अपना उम्मीदवार बनाया है. जाटव-दलित मतदाताओं को बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का समर्थक माना जाता है. इसी मतदाता को साइकिल की ओर खींचने के लिए अखिलेश यादव ने गाजियाबाद के साथ खैर (सुरक्षित) सीट पर जाटव-दलित जाति की चारू केन को उम्मीदवार बनाया है.
अखिलेश की पीडीए रणनीति की काट के लिए बीजेपी ने भी अपने उम्मीदवारों के चयन में पिछड़ी जाति को प्राथमिकता दी है. बीजेपी ने चार ओबीसी उम्मीदवार उतारे हैं जो यादव, निषाद, वर्मा और बिंद पिछड़ी जाति से ताल्लुक रखते हैं. सपा ने एक भी उम्मीदवार अगड़ी जाति का नहीं उतारा है जबकि बीजेपी ने दो ब्राह्मण और एक ठाकुर उम्मीदवार को टिकट दिया है. वहीं बीजेपी की सहयोगी रालोद ने मीरापुर विधानसभा सीट से ओबीसी उम्मीदवार पर दांव लगाया है. इस तरह बीजेपी अपने सहयोगी के साथ मिलकर कुल पांच ओबीसी उम्मीदवारों के साथ मैदान में है.
मुख्यमंत्री योगी के लिए यह चुनाव कितना अहम है, उसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उपचुनाव की घोषणा से पहले ही वह इन सभी सीटों का कम से कम एक बार दौरा कर चुके हैं. बीजेपी प्रदेश प्रवक्ता समीर सिंह कहते हैं, "मुख्यमंत्री योगी ने न केवल युवाओं को नौकरियों के नियुक्ति पत्र बांटे हैं बल्कि उपचुनाव वाले निर्वाचन क्षेत्रों में कई हजार करोड़ रुपए की परियोजनाओं का शुभारंभ भी किया है." उपचुनाव के लिए अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को लामबंद करते हुए मुख्यमंत्री योगी ने तीन मंत्रियों के समूह गठित किए हैं, जिनमें प्रत्येक समूह को एक निर्वाचन क्षेत्र आवंटित कर मंत्रियों को चुनाव अभियान की जमीनी तैयारी पूरी करने का काम सौंपा गया है.
इस तरह यूपी विधानसभा उपचुनाव में योगी आदित्यनाथ बीजेपी के बेहतर प्रदर्शन से लोकसभा चुनाव में मिली हार पर पलटवार करना चाहते है तो अखिलेश यादव यह साबित करना चाहते हैं कि देश के आम चुनाव में सपा का बेहतर प्रदर्शन कोई तुक्का नहीं था.
इस तरह सजा है उपचुनाव का मैदान
> करहल (मैनपुरी) अखिलेश यादव ने कन्नौज से सांसद निर्वाचित होने के बाद करहल विधानसभा सीट से इस्तीफा दे दिया था. उपचुनाव में मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई अभय राम यादव के दामाद अनुजेश यादव बीजेपी, अखिलेश के भतीजे और लालू यादव के दामाद तेज प्रताप सपा और अवनीश कुमार शाक्य बसपा के उम्मीदवार हैं. करहल विधानसभा सीट पर 30 फीसद यादव मतदाता निर्णायक हैं.
> सीसामऊ (कानपुर) 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा के टिकट पर जीते इरफान सोलंकी के अयोग्य घोषित होने पर यह सीट रिक्त हुई. सपा ने इरफान की पत्नी नसीम सोलंकी, बीजेपी ने सुरेश अवस्थी और बसपा ने वीरेंद्र शुक्ल को उम्मीदवार बनाया है. इस सीट पर 40 फीसद मुस्लिम मतदाता निर्णायक हैं.
> कटेहरी (आंबेडकर नगर) सपा विधायक रहे लालजी वर्मा के आंबेडकर नगर से सांसद निर्वाचित होने के बाद कटेहरी विधानसभा सीट से सपा ने उनकी पत्नी शोभावती वर्मा को टिकट दिया है. धर्मराज निषाद बीजेपी और अमित वर्मा बसपा के उम्मीदवार हैं. यहां पर 25 फीसद दलित मतदाता निर्णायक है.
> फूलपुर (प्रयागराज): प्रवीन पटेल के फूलपुर से बीजेपी सांसद निर्वाचित होने के बाद फूलपुर विधानसभा सीट रिक्त हुई. यहां से बीजेपी ने दीपक पटेल, सपा ने मुस्तफा सिद्दीकी और बसपा ने जितेंद्र कुमार सिंह पर दांव लगाया है. यहां पर दलित और कुर्मी मतदाता निर्णायक हैं.
> कुंदरकी (मुरादाबाद): जियाउर रहमान बर्क के संभल से सपा सांसद निर्वाचित होने पर कुंदरकी विधानसभा सीट रिक्त हुई. यहां से सपा ने मोहम्मद रिजवान, बीजेपी ने रामवीर सिंह और बसपा ने रफतउल्लाह को उम्मीदवार बनाया है. यहां तुर्क मुस्लिम मतदाता निर्णायक हैं.
> मांझवां (मिर्जापुर) बीजेपी की सहयोगी निषाद पार्टी के विधायक रहे डॉ. विनोद कुमार बिंद के बीजेपी उम्मीदवार के रूप में भदोही से लोकसभा चुनाव जीतने के बाद मांझवां सीट रिक्त हुई. उपचुनाव में बीजेपी ने सुचिस्मिता मौर्य, सपा ने ज्योति बिंद और बसपा ने दीपक तिवारी को उम्मीदवार बनाया है. यहां बिंद और दलित मतदाता निर्णायक हैं.
> खैर (अलीगढ़): खैर सुरक्षित सीट बीजेपी विधायक रहे अनूप प्रधान वाल्मीकि के हाथरस से सांसद बनने के बाद रिक्त हो गई. उपचुनाव में बीजेपी ने सुरेंद्र दिलेर, सपा ने डॉ. चारू केन और बसपा ने नितिन कुमार चोटेल को उम्मीदवार बनाया है. यहां जाट और दलित मतदाता निर्णायक हैं.
> मीरापुर (मुजफ्फरनगर) मीरापुर से रालोद विधायक रहे चंदन चौहान के बिजनौर से सांसद निर्वाचित होने पर यह सीट रिक्त हुई. बीजेपी के सहयोगी रालोद ने मिथलेश पाल, सपा ने सुम्बुल राणा और बसपा ने शाहनजर पर दांव लगाया है. यहां 30 फीसद मुस्लिम मतदाता निर्णायक हैं.
> गाजियाबाद गाजियाबाद विधानसभा सीट से बीजेपी विधायक रहे अतुल गर्ग के सांसद निर्वाचित होने के बाद सीट खाली हुई. उपचुनाव में बीजेपी ने संजीव शर्मा, सपा ने राज सिंह जाटव और बसपा ने परमानंद गर्ग को उम्मीवार बनाया है. यहां वैश्य और दलित मतदाता निर्णायक हैं.

