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पिछले पांच साल में हुई 500 हाथियों की मौत का जिम्मेदार कौन?

भारत में हाथियों की संख्या 2017 में हुई जनगणना के मुताबिक 29,964 थी, जो दुनिया में हाथियों की कुल आबादी का लगभग 60 प्रतिशत है. हालांकि पिछले पांच वर्षों में 528 हाथियों की अप्राकृतिक मृत्यु हो चुकी है

वन अधिकारी और पशु चिकित्सक 29 अक्टूबर को बांधवगढ़ में जहरीले चारे का शिकार हुए हाथियों को बचाने का प्रयास करते हुए
वन अधिकारी और पशु चिकित्सक 29 अक्टूबर को बांधवगढ़ में जहरीले चारे का शिकार हुए हाथियों को बचाने का प्रयास करते हुए
अपडेटेड 20 नवंबर , 2024

अक्टूबर की 29 तारीख को धनतेरस का शुभ अवसर था. बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान में रेंजर, ड्राइवर, वन रक्षक, टुअर ऑपरेटर और पार्क के प्रबंधन से जुड़ा हर व्यक्ति उत्सव के माहौल में था. लेकिन दोपहर होते-होते स्थितियां एकदम बदल गईं.

ताला स्थित पार्क मुख्यालय के वायरलेस पर घनघनाते हुए खबर पहुंची कि बफर जोन के गांव सलखानिया के पास चार हाथी मृत पाए गए हैं और कुछ दूसरे हाथियों की हालत गंभीर है. कान्हा और पेंच राष्ट्रीय उद्यानों और जबलपुर के स्कूल ऑफ वाइल्डलाइफ फोरेंसिक ऐेंड हेल्थ से तुरंत पशु चिकित्सा सहायता भेजी गई.

मेडिकल टीम जब वहां पहुंची, तो मंजर खासा डरावना था. चार हाथी मृत पड़े थे, और झुंड के दूसरे छह हाथी दर्द से तड़प रहे थे. बाकी तीन स्वस्थ हाथी पैदा हुए हालात को लेकर इतने सतर्क थे कि वे किसी को भी पास फटकने नहीं दे रहे थे. अंत में पटाखों की आवाज से उन्हें थोड़ी दूर किया गया और फिर बीमार हाथियों को जहरीले पदार्थ का असर कम करने के लिए आइवी फ्लूइड्स और दूसरी जरूरी दवाइयां दी गईं. अंधेरे में गाड़ियों की हेडलाइट्स के नीचे यह बचाव कार्य चलता रहा. यह एक बहुत लंबी और दुखद रात साबित हुई.

बांधवगढ़ में पिछले छह वर्ष में आकर बसे लगभग 40 हाथियों में से 10 यानी एक-चौथाई की जान जा चुकी थी. घटनास्थल पर पहुंचे बांधवगढ़ के पशु चिकित्सक डॉ. नितिन गुप्ता बताते हैं, "हाथी मदद की उम्मीद में सिर उठाने की कोशिश करते लेकिन तुरंत ही गिर जाते. इस दौरान इलाज करने वाले एक रेंजर को चोट आई और उनको फ्रैक्चर हो गया. हम बीमार हाथियों को फ्लुइड दे रहे थे और आगे के इलाज के बारे में परामर्श के लिए दूसरे कॉलेजों के पशुचिकित्सकों के साथ संपर्क बनाए हुए थे." डॉ. गुप्ता के मुताबिक, मरने वाले हाथियों में से कुछ पूरी तरह वयस्क भी नहीं हुए थे.

घटना के तुरंत बाद दो जांचें शुरू की गईं—एक राज्य के वन्यजीव विभाग की ओर से और दूसरी केंद्र के वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो (डब्ल्यूसीसीबी) की ओर से. शुरुआती जांच में पता चला कि एक रात पहले हाथियों ने सलखानिया गांव में फसलों पर धावा बोला था. कहीं उन्हें जहर तो नहीं दिया गया है? इस नजरिए से जांच की गई लेकिन कोई ठोस साक्ष्य नहीं मिला. हालांकि, पोस्टमॉर्टम और स्थानीय लोगों से हुई पूछताछ ने एक दिलचस्प सुराग दिया. सरकारी प्रोत्साहन और बेहतर कीमतों के चलते ग्रामीणों ने यहां धान की जगह कोदो की खेती शुरू की थी. कटाई के बाद कोदो के दाने खुले में पड़े हुए थे और बारिश से भीगकर उन पर फफूंद लग गई थी, जिससे 'कोदो के जहरीले' होने का खतरा पैदा हो गया. इसे स्थानीय गोंड समुदाय में 'मलोना' के नाम से जाना जाता है.

हालांकि, इस 'जहरीले कोदो' वाली बात कुछ लोगों के गले नहीं उतर रही थी. विपक्ष के नेता उमंग सिंघार ने भगवान गणेश के कुपित होने का हवाला देते हुए इस पर सवाल उठाए. इसके कारण राज्य सरकार रक्षात्मक मुद्रा में आ गई और मुख्यमंत्री मोहन यादव ने फील्ड डायरेक्टर और एक उप-विभागीय वन अधिकारी को लापरवाही के आरोप में निलंबित करने का फैसला किया. (राज्य के वन मंत्री राम निवास रावत विधायक बनने के लिए उपचुनाव में खड़े हो रहे हैं और अधिकारियों के खिलाफ यह कार्रवाई आलोचना की घेराबंदी से बचने के लिए की गई प्रतीत हो रही थी.)

आखिरकार 5 नवंबर को बरेली स्थित भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान ने यह पुष्टि की कि हाथियों की मौत कोदो के जहरीले होने के कारण ही हुई थी. हाथियों पर भारत के अग्रणी विशेषज्ञों में से एक डॉ. रमन सुकुमार बताते हैं, ''पहले भी कोदो के दाने खाने से हाथियों के जहर का शिकार होने की घटना हुई है (पहली घटना 1922 में यूपी के शाहजहांपुर में दर्ज की गई थी). लेकिन बांधवगढ़ के 40 हाथियों में से 10 की मौत एक बड़ा झटका है.'' फफूंद नम मौसम में सक्रिय होती हैं और कोदो के बीज के भीतर प्रवेश कर जाती हैं, जिससे माइकोटॉक्सिन जहर बनता है.

इस घटना ने एक बार फिर इस तथ्य को उजागर किया कि न केवल बांधवगढ़, बल्कि पूरे देश में मानव-हाथी संघर्ष बढ़ रहा है. इस घटना के तीन दिन बाद, 2 नवंबर को बांधवगढ़ में हाथियों ने दो लोगों को कुचलकर मार डाला और एक को घायल कर दिया. इसे इस रूप में देखा जा रहा है कि हाथी अपने साथियों की मौत का बदला ले रहे थे.

भारत में हाथियों की संख्या 2017 में हुई जनगणना के मुताबिक 29,964 थी, जो दुनिया में हाथियों की कुल आबादी का लगभग 60 प्रतिशत है. हालांकि पिछले पांच वर्षों में 528 हाथियों की अप्राकृतिक मृत्यु हो चुकी है, जबकि हाथियों ने 2,853 लोगों को अपनी चपेट में लेकर मारा है.

इस गंभीर समस्या के समाधान के लिए कई उपाय सुझाए गए हैं. फिलहाल भारत में 33 हाथी अभयारण्य हैं, जो राष्ट्रीय उद्यानों और अभ्यारण्यों से जुड़े हुए हैं. इसके साथ ही 15 राज्यों में 150 हाथी गलियारों की पहचान की जा चुकी है. केंद्र और राज्य सरकारें कई उपायों पर काम कर रही हैं, लेकिन समस्या का समाधान दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहा. वन विभाग के अधिकारियों का मानना है कि जब तक हाथियों के प्राकृतिक आवासों के साथ छेड़छाड़ नहीं रोकी जाती, तब तक यह समस्या बनी रहेगी.

हाथी अपने भोजन की तलाश में जंगलों से बाहर निकलेंगे ही, जिससे टकराव की स्थितियां उत्पन्न होती रहेंगी. तीन साल पहले पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने संघर्ष वाले क्षेत्रों की पहचान की और त्वरित प्रतिक्रिया दलों का गठन किया. राज्य सरकारों को इस संघर्ष को कम करने के लिए कई सुझाव दिए गए, जिनमें एक सुझाव यह था कि किसानों को ऐसी नकदी फसलें उगाने को कहा जाए, जिन्हें हाथी नहीं खाते.

पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में, जहां पिछले चार वर्षों (2019-23) में 431 लोग हाथियों के हमलों में मारे गए हैं, त्वरित प्रतिक्रिया दल (आरआरटी), ब्लॉक एसएमएस सिस्टम, और 'ऐरावत' नामक विशेष वाहनों की तैनाती जैसे उपाय किए जा रहे हैं. इसके अलावा कई राज्यों में संवेदनशील गांवों की सीमाओं पर सौर बाड़ (सोलर फेंसिंग) भी लगाई गई है, लेकिन कुछ क्षेत्रों के हाथियों ने इसे पार करने का तरीका भी सीख लिया है.

मध्य प्रदेश की स्थिति कुछ अलग है. सन् 2000 में छत्तीसगढ़ के अलग होने के बाद मध्य प्रदेश के जंगलों में हाथियों की आबादी नहीं थी क्योंकि उनका प्राकृतिक आवास नए राज्य में चला गया था. 2018 में पहली बार कुछ हाथी छत्तीसगढ़ से बांधवगढ़ आए क्योंकि खनन और जंगलों की कटाई के कारण उन्हें अपना ठिकाना छोड़ना पड़ा. राज्य वैसे तो भविष्य में कोदो विषाक्तता जैसी घटनाओं को रोकने के उपाय ढूंढ सकता है, लेकिन हाथियों के खिलाफ बदले की भावना से होने वाली हिंसा को रोकना सबसे महत्वपूर्ण कदम है. विशेषज्ञों का सुझाव है कि फसल के नुक्सान के लिए मवेशी मुआवजा योजना की तरह एक त्वरित मुआवजा योजना लागू की जानी चाहिए.

करीब तीन दशक पहले तक मवेशी मालिकों के बाघों को मार डालने की बात आम थी. वे अपने मवेशियों को मारने वाले बाघों को जहर दे दिया करते थे. मवेशियों के नुक्सान पर 40,000 रु. प्रति जानवर तक के मुआवजे ने बाघों की मौतों को काफी हद तक कम किया. वहीं, फसल नुक्सान पर मुआवजे की प्रक्रिया उतनी प्रभावी नहीं रही है, और न ही उसमें पर्याप्त राशि दी जाती है.

मध्य प्रदेश के एक वरिष्ठ वन अधिकारी बताते हैं, "किसान बंदरों या जंगली सूअरों से होने वाले फसलों के नुक्सान के बाद मुआवजे के लिए कई दफ्तरों के चक्कर काटते हैं. राजस्व अधिकारी अक्सर नुक्सान का सही मूल्यांकन नहीं करते, जिससे किसानों को मुआवजा नहीं मिलता. यही स्थिति किसानों में गुस्सा और प्रतिशोध की भावना को जन्म देती है." उनका मानना है कि ज्यादा मानव-पशु संघर्ष वाले क्षेत्रों में फसल मुआवजे की जिम्मेदारी वन विभाग को देनी चाहिए.

3 नवंबर को मुख्यमंत्री यादव ने एक राज्य-स्तरीय हाथी टास्क फोर्स के गठन की घोषणा की. इसके अलावा, राज्य सरकार ने वनकर्मियों को केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु भेजने का निर्णय लिया है, ताकि वे हाथियों के व्यवहार और उन्हें नियंत्रित करने के उपायों का अध्ययन कर सकें. उम्मीद है कि इससे कुछ नए और व्यवहारिक समाधान सामने आएंगे, जो इस गंभीर समस्या का स्थायी समाधान हो सकते हैं.

इंसान बनाम हाथी

> बांधवगढ़ अभयारण्य में जहरीली कोदो खाने से 40 में से 10 हाथी काल के गाल में समा गए

> यह जान-बूझकर किया गया हो या नहीं, इस हादसे ने इंसानों और हाथियों के बीच टकराव के मुद्दे को फिर से रेखांकित किया

> इस हादसे के तीन दिन बाद अभयारण्य में हाथियों ने दो लोगों को रौंद डाला और एक को जख्मी कर दिया

> हाथी कई सालों बाद मध्य प्रदेश के इलाकों में अभी हाल के वर्षों में ही हैं

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