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शिंदे या उद्धव...किसकी शिवसेना है महाराष्ट्र चुनाव के लिए ज्यादा तैयार?

महाराष्ट्र में किसका राज चलेगा, यह लोगों के वोट से तय होगा लेकिन साथ ही यह भी तय होगा कि कौन-सी शिवसेना असली है - उद्धव ठाकरे की या एकनाथ शिंदे की

उद्धव ठाकरे बनाम एकनाथ शिंदे
उद्धव ठाकरे बनाम एकनाथ शिंदे
अपडेटेड 19 नवंबर , 2024

लगभग छह दशक से मुंबई में लगने वाले नारे 'आवाज कुनाचा?' अर्थात राज किसका तो इसका जवाबी नारा होता था 'शिवसेनाचा' यानी शिवसेना का जो कि देश की व्यावसायिक राजधानी और महाराष्ट्र के एक बड़े हिस्से में इस पार्टी के दबदबे का प्रतीक रहा है. विधानसभा चुनाव में अब और अगले स्तर के सवाल का जवाब मिलेगा कि राज किस शिवसेना का है?

जून 2022 में एकनाथ शिंदे और उनके 39 विधायकों ने शिवसेना को तोड़ दिया और उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली महा विकास अघाड़ी (एमवीए) सरकार गिराकर भाजपा के साथ गठबंधन करके सरकार बना ली. उसके बाद कानूनी लड़ाई में शिवसेना का नाम और धनुष-बाण का चुनाव चिह्न एकनाथ शिंदे गुट को सौंप दिया गया. हालांकि, पार्टी की पहचान ठाकरे ब्रांड शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के पास ही है.

लोकसभा चुनाव में ही यह सवाल सुलझने वाला था कि 'असली शिवसेना' कौन है. लेकिन नतीजे आए तो शिवसेना (यूबीटी) को नौ सीटें और शिंदे के गुट को सात सीटें मिलीं तो मामला तकरीबन बराबरी का रहा था. ठाकरे की शिवसेना ने अपने मुख्य मराठी वोटों को बंटता पाया, जिसकी कमी सहयोगी कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) की बदौलत पूरी हुई, खासकर मुंबई में उसे मुस्लिम वोट लगभग एकतरफा मिले. वह नजारा दिवंगत पार्टी सुप्रीमो बाल ठाकरे के आक्रामक हिंदुत्व और अल्पसंख्यकों के साथ शिवसेना के तल्ख रिश्तों के दिनों से बिल्कुल अलग था.

ठाकरे समर्थकों का दावा है कि शिंदे की 'गद्दारी' और उससे मूल मराठी माणुस मतदाताओं में उपजी सहानुभूति लहर कारगर साबित होगी. उधर, शिंदे समर्थकों का मानना है कि पारंपरिक शिवसेना मतदाता पार्टी के पूर्व विरोधियों के साथ गठबंधन करने और हिंदुत्व के प्रति नरमी से नाखुश है. वे यह भी बताना पसंद करते हैं कि उनके पास भरोसेमंद भाजपा का आधार भी है. लेकिन दिक्कत यह है कि शिंदे शिवसेना ठोस राजनैतिक संगठन से बदले विधायकों और नेताओं का एक ढीला-ढाला समूह है, जिनके बारे में माना जाता है कि मुख्यमंत्री के पद की ताकत ही शिंदे के साथ होने की वजह है. कुर्सी नहीं रही तो शिंदे आकर्षण खो सकते हैं.

इस लड़ाई में दांव पर दिवंगत बाल ठाकरे की विरासत भी है, जो आज भी पार्टी के वफादारों के लिए आकर्षण है और मुंबई तथा बृहन्मुंबई महानगर क्षेत्र (एमएमआर) में उसका भारी असर है. उद्धव के सामने अस्तित्व बचाने की चुनौती है क्योंकि शिंदे के पक्ष में नतीजे आने का मतलब है कि ठाकरे ब्रांड के बिना भी शिवसेना हो सकती है. दरअसल, ब्रांड नाम ही परिवार के दबदबे वाली एकरूप पार्टियों की थाती होती है. राजनैतिक जानकार संदीप प्रधान कहते हैं कि यह चुनाव तय करेगा कि 'नाम और चुनाव चिह्न वाली असली है या शिवसेना का मतलब ठाकरे है.'

शिवसेना की मूलनिवासी राजनीति की असली पीठ मुंबई में शिंदे गुट ने पूर्व केंद्रीय मंत्री मिलिंद देवड़ा को वर्ली में उद्धव के बेटे तथा पूर्व मंत्री आदित्य ठाकरे के खिलाफ मैदान में उतारकर शिवसेना (यूबीटी) को चुनौती दी है. वहां आदित्य को अपने चाचा की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) के संदीप देशपांडे से भी मुकाबला करना है. वर्ली में आशंकाएं इसलिए भी बढ़ी हुई हैं क्योंकि लोकसभा चुनाव में इस विधानसभा क्षेत्र में शिवसेना (यूबीटी) के अरविंद सावंत को लगभग 6,300 वोट की मामूली बढ़त ही मिली थी.

उधर, शिवसेना (यूबीटी) ने ठाणे में कोपरी पचपाखड़ी सीट पर शिंदे को उनके गुरु दिवंगत 'धर्मवीर' आनंद दिघे के भतीजे केदार दिघे को मैदान में उतारकर घेरने की कोशिश की है. मुंबई की तरह ठाणे भी दोनों शिवसेना के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वहां दिघे के व्यक्तित्व का असर है.

बीते हुए दिन उद्धव और शिंदे नवंबर, 2019

ठाकरे गुट शिंदे को शिवसेना का नाम और धनुष-बाण चुनाव चिह्न देने के चुनाव आयोग के फैसले और नए 'मशाल' चिह्न के प्रचार की कमी से भी परेशान है. एक शिवसेना (यूबीटी) सांसद याद करते हैं कि वे कुछ समर्थक वोटरों से मिले तो उन्होंने बताया कि लोकसभा चुनाव में धनुष-बाण का बटन दबाकर उन्हें वोट दिया था!

पूर्व पार्षद तथा शिवसेना (यूबीटी) नेता अरविंद भोसले कहते हैं, "हमारे लिए मतदाता सुप्रीम कोर्ट की तरह हैं." उन्हें लगता है कि शहरी मतदाता, खासकर लोकसभा चुनाव में शिंदे शिवसेना-राकांपा (अजित पवार)-भाजपा के महायुति गठबंधन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को वोट देने वाला मध्यम वर्ग "हमारी ओर वापस आएगा." उन्होंने कहा कि शिंदे सरकार की लाडकी बहन योजना जैसी योजनाएं आखिरी समय में की गई हताशा भरी चाल थी, जिसके तहत गरीब महिलाओं को हर महीने 1,500 रुपए दिए जाते हैं.

परंपरा से शिवसेना की सांगठनिक ताकत बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) पर उसके दबदबे से बनी है, जो देश में सबसे अमीर नगरीय निकाय है. उसका सालाना बजट लगभग 60,000 करोड़ रुपए है. बीएमसी पर शिवसेना के दबदबे ने उसे कार्यकर्ताओं को प्रोत्साहन के लिए 'पुरस्कार अर्थव्यवस्था' बनाए रखने में मदद की थी.

भाजपा प्रवक्ता तथा शिवसेना के हिंदी मुखपत्र दोपहर का सामना के पूर्व संपादक प्रेम शुक्ला बताते हैं, "अगर शिंदे गुट को अधिक सीटें मिलती हैं, तो ठाकरे को बीएमसी चुनाव में भारी झटका लगेगा... अगर ठाकरे को बढ़त मिलती है, तो वे बीएमसी में दबदबा कायम रख सकते हैं. अगर शिवसेना (यूबीटी) बीएमसी पर कब्जा बरकरार रख पाती है, तो उसका अस्तित्व बच जाएगा क्योंकि स्थानीय निकाय में ही उसकी राजनीति की आत्मा बसती है."

भाजपा के एक वरिष्ठ विधायक ने माना कि लोकसभा चुनाव में दलितों के कुछ वोट महायुति से दूर चले गए थे, लेकिन इस बार हिंदू वोटों के 'उल्टी लामबंदी' हो सकती है. उन्होंने दावा किया कि यह आम धारणा ठाकरे के खिलाफ काम कर रही है कि शिवसेना (यूबीटी) एमवीए में कांग्रेस के लिए दूसरे दर्जे की भूमिका निभा रही है.

भाजपा मुंबई इकाई के अध्यक्ष आशीष शेलार का दावा है, "शिंदे हिंदुत्व वोटों के कारण अपनी लोकसभा सीटें जीतने में कामयाब रहे, लेकिन ठाकरे अपने सहयोगियों और मुस्लिम और दलित मतदाताओं के कारण जीते. अपने पारंपरिक विरोधियों के वोटों से जीतना एक अस्थायी जीत होगी. शिंदे की जीत अधिक स्थायी होगी."

पूर्व लोकसभा सांसद तथा शिंदे शिवसेना के नेता संजय निरुपम इससे सहमत हैं. उनका कहना है कि 'वोट जिहाद' ने शिवसेना (यूबीटी) के हिंदुत्व को त्यागने का संदेश गहरा कर दिया है. वे बताते हैं, "हिंदुत्व की सोच रखने वाले मराठी मतदाता पहले ही पार्टी छोड़ चुके हैं...सिर्फ वे मतदाता ही बचे हैं जो मराठी गौरव को अधिक महत्व देते हैं. उद्धव ठाकरे के लिए यह करो या मरो की लड़ाई है. अगर वे पीछे रह जाते हैं, तो उन्हें विपक्ष में बैठने के लिए मजबूर होना पड़ेगा, और उनके समर्थक अपनी पसंद से पाला तय करेंगे."

हालांकि, शिवसेना (यूबीटी) को लगता है कि यह चुनाव 'गद्दारों' को सबक सिखाने और शिवसेना को उसकी मूल स्थिति में वापस लाने के बारे में होगा. पार्टी सांसद सावंत का यह भी दावा है कि दिल्ली में भाजपा नेतृत्व के प्रति शिंदे की 'गुलामी' से जनता बहुत खुश नहीं है.

एक बात तो तय है कि खंडित चुनावी माहौल में प्रत्याशियों की जीत का अंतर मामूली रहने वाला है. राजनैतिक विश्लेषक दीपक पवार लोकसभा चुनाव की ओर इशारा करते हैं, जिसमें शिंदे शिवसेना के रवींद्र वायकर ने मुंबई उत्तर पश्चिम में शिवसेना (यूबीटी) के अमोल कीर्तिकर को सिर्फ 48 वोटों से हराया था. उन्हें लगता है कि इस बार भी यही होने वाला है.

केवल बाल ठाकरे की विरासत दांव पर नहीं है, मुंबई के साथ बृहन्मुंबई महानगरपालिका पर काबिज होने का भी मसला दोनों शिवसेना के बीच खींचतान का सबब है

ठाकरे की ताकत

> शिवसेना (यूबीटी) अपने नए चुनाव चिह्न मशाल को लोकप्रिय बनाने के लिए संघर्ष कर रही है

> सहयोगी कांग्रेस के कोर वोटर मुस्लिम और दलित वोटों पर इसे निर्भर होना पड़ेगा

> ठाकरे के पास जमीन पर पार्टी कार्यकर्ताओं का समर्थन है. साथ ही शिंदे की गद्दारी को लेकर सहानुभूति भी

शिंदे का दम

> शिंदे की शिवसेना को इस मामले में बढ़त है कि उसे चुनाव आयोग से पार्टी का नाम और धनुष-तीर चिह्न मिल गया है

> भाजपा का भरोसेमंद वोट आधार मददगार होगा

> ठाणे के बाहर इनके पास संगठन की शक्ति नहीं है. पार्टी के पास ढीले-ढाले नेता हैं जिन्हें भाजपा के पिट्ठू माना जाता है

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