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बिहार : बड़े-बड़े दावों के बावजूद जहरीली शराब से यहां हर साल क्यों मरते हैं लोग?

बिहार के सारण जिले के मढौरा से गोपालगंज-पूर्वी चंपारण तक फैले लगभग सौ किमी के दायरे में जहरीली शराब पीने से मरने की घटनाएं लगातार हो रही हैं. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2016 से अब तक इस इलाके में जहरीली शराब से 205 लोग मर चुके हैं

शवों का अंतिम संस्कार करते सीवान जिले के कौड़िया गांव के लोग
शवों का अंतिम संस्कार करते सीवान जिले के कौड़िया गांव के लोग
अपडेटेड 8 नवंबर , 2024

सारण जिले के बहरौली गांव में बेबी देवी के पति एक हादसे के शिकार हुए थे. दिसंबर, 2022 में इसी जिले के मशरक में हुआ था जहरीली शराब का वह हादसा. तब 66 लोगों की जान गई थी (गैर सरकारी अनुमान मरने वालों की संख्या सौ से ज्यादा बताते हैं). मरने वालों में बहरौली गांव के 14 लोग थे. बेबी देवी के पति की जान तो बच गई मगर एक आंख की रोशनी चली गई थी. बेबी देवी दबे स्वर में कहती हैं, "काम छूट गया लेकिन पीना नहीं छूटा. होश नहीं है कि इसी शराब की वजह से जान जाते-जाते बची."

होश? कैसा होश? और किसको है होश? उस भीषण हादसे से न मशरक के लोगों ने सबक सीखा, न वहां से सटे सीवान के भगवानपुर हाट के लोगों ने. अभी इसी 15-16 अक्तूबर को एक बार फिर उस इलाके में जहरीली शराब का कहर टूटा और बहरौली से महज 7-8 किमी दूर सीवान के कौड़िया, माघर और सारण के इब्राहिमपुर गांव के 37 लोगों की जान चली गई. खबर लिखे जाने तक मरने वालों की संख्या रोज बढ़ रही है. इन गांवों में भी लोग होश में आए हों और उन्होंने शराब पीने से तौबा कर ली हो, ऐसा लगता नहीं.

प्रशासन का चौकस दावा है कि 2022 के हादसे के बाद इस इलाके में सख्ती खासी बढ़ाई गई, जागरूकता अभियान चलाया गया और लोगों को शराब न पीने और न पिलाने की कसम भी दिलाई गई. हादसे के शिकार लोगों के परिजनों से तो शपथपत्र तक भरवाए गए कि वे शराबबंदी में सरकार का सहयोग करेंगे.

18 अक्तूबर की दोपहर कौड़िया गांव के मुसहर टोले की बुजुर्ग औरत का रुदन पूरे टोले में गूंज रहा था. उसके सामने श्मशान से लौटने वाले लोग आग, पानी, लोहा और पत्थर को छूने की रस्म निभा रहे थे. वे 60 साल के सूखल रावत के शव को जलाकर लौटे थे. 17 अक्तूबर को इसी टोले के पांच लोगों के दाह संस्कार की तैयारियां चल रही थीं. अगले ही दिन इस टोले में मरने वालों की संख्या दस पार कर गई.

जहां वह बुजुर्ग औरत विलाप कर रही थी, उसके ठीक पहले वाले घर में अशोक मुसहर उतरी पहने बैठे थे. उनकी पत्नी सविता देवी की मौत भी जहरीली शराब पीने से हो चुकी थी. वे एक कमरा दिखाते हैं जो मिट्टी से लीपा हुआ था और वहां एक लोटे में पानी रखा था. बताने लगे, "यह हमारे यहां की रस्म है. अभी यहां मेरी घरवाली के पैरों के निशान उभरे थे." जब वे यह सब बता रहे थे, उनके मुंह से देसी दारू की गंध भभकी. पूछने पर कहने लगे, "हम दारू नहीं पीते, हम तो ताड़ी पीते हैं. नशे में नहीं हैं, छह दिन हो गया खाना खइला सर..." फिर वे नशे में देर तक बड़बड़ाते रहे.

कौड़िया गांव में सूखल रावत का अंतिम संस्कार करके लौटे उनके परिजन आग, पानी, लोहा और पत्थर छूने की रस्म निभाते हुए

पड़ोस के माघर गांव के आठ लोगों की जान इसी हादसे में गई थी. वहां सुनरदेव राय के दरवाजे पर अलग ही बहस चल रही थी. गांव के युवा एक बुजुर्ग चनरदेव राय को समझाने में जुटे थे कि इस हादसे के बाद अब वे शराब पीना बंद कर दें. मगर बुजुर्ग मानने को तैयार न थे. सारा दोष वे स्थानीय प्रशासन पर डाल रहे थे. उनके शब्द थे, "परशासन चाह दे तो एगो तिरिंग न डोले, परशासन त खुदे दारू बेचवाता." जवाब में एक युवक ने कहा, "पीये बाला कम हो जाइ तो बेचे बाला अपने कम हो जाई." मगर बुजुर्ग इस बात से सहमत नहीं हुए.

वहीं खड़ी उनकी पत्नी कबूतरा देवी कहने लगीं, "बेचाता तब न सब पीयता. ओही से न मरता मरद सब". हैरत की बात है कि इस बहस के बीच सुनरदेव राय भी बैठे थे, जिन्होंने उस जहरीली शराब को चखा था, जिससे इतनी मौतें हुईं. गांव के इन्हीं युवाओं ने उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया था, जहां उन्हें रात भर रखा गया और अगली सुबह वे वापस लौटे. उन्होंने गांव के रूदल मांझी से शराब खरीदी थी, पुलिस रूदल मांझी को पकड़कर ले गई है.

गांव के ही मछली व्यवसायी मोहन साह ने भी जहरीली शराब पीकर जान गंवाई. उनके पुत्र पप्पू साह घर में बैठे थे. उनकी मां कहने लगीं, "रोज पीकर आते थे. गांव में ही पोखरा पर दारू मिल जाता था. हम मना भी करते थे लेकिन मना करने पर रोज मारपीट करते थे." वे सब ब्यौरे बता रही थीं मगर उनकी बातचीत में बहुत दुख नहीं था. ऐसा लग रहा था कि चलो जान छूटी, एक जिल्लत भरी जिंदगी से छुटकारा मिला.

हैरत की बात है कि जिस गांव में आठ लोगों की मौत जहरीली शराब पीने से हो गई थी, वहां रुदन के स्वर सिर्फ पोखरा के पास रहने वाले प्रभुनाथ राम के घर से फूट रहे थे. गांव वालों के मुताबिक, प्रभुनाथ खुद ही देसी शराब का लोकल वेंडर था. वह दो बार इस चक्कर में जेल भी जा चुका था. मगर हर बार छूटकर बाहर आ जाता. इस बात को आठवीं में पढ़ने वाले उनके बेटे अमरेश ने भी दबे स्वर में स्वीकार किया.

मगर इस पूरे इलाके में कहीं दारूबंदी नहीं दिखी. सारण के मशरक से सीवान के भगवानपुर तक फैले यही कोई 13-14 किलोमीटर के इस इलाके में एक भी गांव ऐसा न मिला, जहां के लोगों को देसी दारू पाने के लिए एक-डेढ़ किमी से ज्यादा दूर जाना पड़ता हो. हर गांव में नियमित शराब उपलब्ध होने की खबर मिली और कई गांवों में तो दो-दो विक्रेता एक साथ थे. एक स्थानीय तजुर्बेकार ने बताया कि अमूमन ये लोग देसी दारू ठीक-ठाक ही बनाते हैं, मगर कई बार सस्ता करने के चक्कर में या पुलिस की दबिश बढ़ने पर कच्ची स्पिरिट मिलाने लगते हैं. इसी वजह से दारू जहरीली हो जाती है और लोग मरने लगते हैं.

ऐसी घटनाएं इस इलाके में लगातार हो रही हैं. सारण जिले के मढौरा से गोपालगंज-पूर्वी चंपारण तक फैले लगभग सौ किमी के दायरे में जहरीली शराब पीने से मरने की घटनाएं लगातार हो रही हैं. 2016 से अब तक इस इलाके में जहरीली शराब से 205 लोग मर चुके हैं (यह सरकारी आंकड़ा है) जबकि इस अवधि में पूरे बिहार में मरने वालों की कुल संख्या 303 है. यानी जहरीली शराब से मरने वाले हर तीन में से दो लोग इसी इलाके के हैं.

बिहार में शराबबंदी के बाद जहरीली शराब से मौत की पहली बड़ी घटना अगस्त, 2016 में गोपालगंज के खजूरबनी में हुई, जिसमें 19 लोगों की मौत हो गई थी. उसके बाद नवंबर, 2021 में गोपालगंज-पूर्वी चंपारण के सीमावर्ती इलाके में 33 लोगों की मौत हुई, जिसके बाद बड़ा हंगामा हुआ. प्रशासनिक तौर पर फेरबदल हुआ और कई बड़े फैसले किए गए.

इसके बाद हादसों की लोकेशन सारण जिले की तरफ शिफ्ट हुई. अगस्त, 2022 में मढ़ौरा में नौ लोग मरे; दिसंबर, 2022 में मशरक में 66 लोग मरे. फिर शोर-शराबा हुआ. सरकार की फजीहत हुई. उसके बाद हादसे की लोकेशन पड़ोस के सीवान जिले में शिफ्ट हो गई, जहां जुलाई, 2023 में 51 लोग मरे. और फिर अब यह हादसा हुआ.

जहरीली शराब की घटना होने के बाद सारण पुलिस देसी शराब के अड्डे पर छापे मारी करती हुई

सरकारी अधिकारी बताते हैं कि इस इलाके में यूपी के रास्ते बड़े पैमाने पर स्पिरिट का आवागमन होता है जिसे रोकना असंभव है. इंडिया टुडे से बातचीत में बिहार सरकार के मद्यनिषेध विभाग के सचिव विनोद सिंह गुंजियाल कहते हैं, "दरअसल, भारत सरकार भी अब मिथाइल अल्कोहल को बढ़ावा दे रही है. इसका इस्तेमाल पेट्रोलियम में ब्लेंडिंग के लिए किया जाता है. ऐसे में इसके आवागमन को हम कुछ हद तक ही रेगुलेट कर पाते हैं. पहले इस इलाके से गुजरने वाली स्पिरिट की गाड़ियों से लोग जगह-जगह स्पिरिट उतार लेते थे. बाद में सरकार ने उन गाड़ियों पर डिजिटल लॉक लगवाने की व्यवस्था की, ताकि बिहार में ये गाड़ियां जहां-जहां से गुजरें, हम निगरानी कर सकें. इसके बावजूद स्पिरिट आ रही है और अवैध तरीके से भी आ रही है."

इस साल मद्यनिषेध विभाग ने 51,870 लीटर स्पिरिट की बरामदगी की है, जिसमें लगभग 22,000 लीटर स्पिरिट सारण और सीवान जिले में बरामद हुई. सीवान स्पिरिट तस्करी का बड़ा हब बनता जा रहा है. इस साल यहां से अब तक 17,185 लीटर स्पिरिट बरामद की गई है. सारण जिले में तो इसी महीने की पहली तारीख को गिट्टी लदे एक बड़े ट्रक के नीचे से एक साथ 2,940 लीटर स्पिरिट बरामद हुई. इस बार के कांड में भी पुलिस को सूचना मिली कि स्पिरिट यूपी के किसी व्यक्ति ने पश्चिम बंगाल से मंगवाई थी, जिसे सीवान जिले में लीक कर दिया गया और जगह-जगह बंटवाई गई.

गुंजियाल कहते हैं, "इतनी बड़ी मात्रा में स्पिरिट बरामद होना कितना खतरनाक है, इसे आप सिर्फ इस बात से समझ सकते हैं कि इस बार का कांड सिर्फ दस लीटर स्पिरिट की वजह से हुआ. हम इसे तभी कंट्रोल कर सकते हैं, जब पड़ोसी राज्य हमारी मदद करें."

सरकार ऐसा मानती है कि पड़ोसी राज्य खासकर बंगाल, झारखंड और उत्तर प्रदेश उनकी मदद नहीं करते क्योंकि बिहार में शराबबंदी की वजह से उनके यहां शराब की बिक्री बढ़ती है और उनका रेवेन्यू भी.

जहां-जहां शराब की अवैध बिक्री के मामले सामने आते हैं, वहां स्थानीय पुलिस की बड़ी भूमिका भी सामने आती है. इस बार भी सारण और सीवान में चौकीदारों और दो पुलिसकर्मियों को निलंबित किया गया. सीवान में जिस माघर गांव में जहरीली शराब पीने से आठ लोग मरे, वहां के मुखिया मनमोहन मिश्र कहते हैं, "अगर प्रशासन सजग रहता तो ऐसी घटना नहीं होती. 2022 में मशरक में हुई घटना के बाद भी ऐसे हादसे का होना तो सरकार की लापरवाही का ही उदाहरण है. हमारे यहां जिस व्यक्ति प्रभुनाथ राम पर जहरीली शराब बेचने का आरोप है, वह दो बार जेल जा चुका है. तीन-तीन मुकदमे हैं उस पर. इसके बावजूद वह शराब बेच रहा था. खुलेआम."

राज बहरौली के मुखिया और मशरक मुखिया संघ के अध्यक्ष अजित कुमार सिंह कहते हैं, "इन इलाकों में चौकीदार तक का काम करने वाला भी पटना में दुतल्ला मकान बनवा रहा है. उसकी आमदनी कैसे बढ़ रही है, कहीं न कहीं वह शराब बिकवा रहा है."

नवंबर, 2021 में हुई घटना के बाद तय किया गया कि एक सेंट्रल टीम बनेगी जो राज्यभर में छापेमारी करेगी और जहां शराब मिलेगी, वहां के थानेदार को तत्काल सस्पेंड कर दिया जाएगा.

लापरवाही बरतने वाले थानेदारों को अगले दस साल तक थाने में ड्यूटी नहीं दी जाएगी. अगर वे शराब से जुड़े किसी मामले में शामिल पाए गए तो उन्हें बर्खास्त कर दिया जाएगा. हर 15 दिन पर डीएम और एसपी शराबबंदी की समीक्षा करेंगे. डीजीपी, गृह विभाग के अपर मुख्य सचिव, उत्पाद आयुक्त और आइजी मद्यनिषेध हर दूसरे दिन इसकी समीक्षा करेंगे. मगर ऐसा कुछ किया जाता तो शायद ही इतनी बड़ी घटनाएं बार-बार होतीं.

बिहार सरकार हर साल 26 नवंबर को मद्य निषेध दिवस मनाती है. इस दिन सभी मंत्रियों, जनप्रतिनिधियों, सरकारी पदाधिकारियों और कर्मियों को शराब न पीने और किसी को न पीने देने की शपथ भी दिलाई जाती है. शपथ लेने के बाद ही सरकारी कर्मियों का वेतन जारी होता है.

मशरक में दिसंबर, 2022 की घटना के बाद तय हुआ कि शराब से मरने वालों के परिजनों को मुआवजा भी दिया जाएगा. मगर उसके लिए शर्त रखी गई कि मृतकों के परिजनों को एक शपथपत्र देना होगा कि उनके परिवार का फलां-फलां सदस्य शराब पीकर मरा है. वे शराबबंदी के समर्थन में हैं. अब हम में से कोई शराब नहीं पिएगा, न किसी को पीने की सलाह देगा. ऐसी घटना दिखी तो सरकार को सूचित भी करेगा.

इस शपथ के बावजूद लोगों को अभी तक मुआवजा नहीं मिला है. अजित सिंह कहते हैं, "मेरी पंचायत में 14 लोगों की मौत जहरीली शराब से हुई थी, इनमें से अभी तक सात लोगों को ही मुआवजा दिला पाया हूं." दूसरी ओर गुंजियाल बताते हैं, ''हम लोगों ने अभी तक 155 लोगों को मुआवजा दिया है."

बिहार में छह नशामुक्ति केंद्रों का संचालन करने वाली संस्था दिशा नशामुक्ति केंद्र की सीईओ राखी शर्मा मानती हैं, "शराब की लत ऐसे नहीं छूटेगी. उन्हें नशामुक्ति केंद्र में भेजना चाहिए. लोग शराब की लत के शिकार होते हैं. इसके लिए वे कानून तोड़ने में भी नहीं हिचकते. दुनिया के कई मुल्कों में यह नियम है कि वे नशा करने वालों को जेल के बदले डि-एडिक्शन सेंटर में भेजते हैं."

बिहार में भी शराबबंदी के बाद हर जिले में सदर अस्पताल में नशामुक्ति केंद्र खुले मगर वहां न कोई जाता है, न सरकार किसी को भेजती है. टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, पटना के पूर्व निदेशक पुष्पेंद्र कहते हैं, "जहरीली शराब का पूरा मामला गरीबी से जुड़ा है. गरीबी के कारण लोग अभी तक देसी शराब के कारोबार में जुटे हैं, सरकार उनके लिए वैकल्पिक रोजगार के इंतजाम नहीं कर पाई. पीने वाले भी गरीब, पिलाने वाले भी गरीब, मरने वाले भी गरीब. गरीबी जब तक रहेगी, ऐसी घटनाएं होती रहेंगी."

ऐसा बार-बार क्यों हो रहा है? गुंजियाल मानते हैं, ''निश्चित तौर पर यह प्रशासनिक चूक है और उसे हम लोग ठीक करने की कोशिश कर रहे हैं. हम इंटेलिजेंस को बेहतर बनाएंगे. पड़ोसी राज्य से समन्वय ठीक करेंगे. कोशिश करेंगे कि ऐसी घटनाएं कम से कम हों." काश! ऐसा हो पाए.

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