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तमिलनाडु : एमके स्टालिन के लिए अगला विधानसभा चुनाव क्यों 'इज्जत' की बात बन गया है?

डीएमके के लिए फायदेमंद यह है कि एआइएडीएमके और बीजेपी अपनी अंदरूनी मजबूरियों से घिरे हैं. सत्तारूढ़ पार्टी के खिलाफ अगर सिर्फ सत्ता-विरोधी भावना ही होती, तो एआइएडीएमके के लिए अच्छा प्रदर्शन करने का खासा मौका होता

चेन्नै में 15 सितंबर को डीएमके के स्थापना दिवस के मौके पर सीएम स्टालिन
चेन्नै में 15 सितंबर को डीएमके के स्थापना दिवस के मौके पर सीएम स्टालिन
अपडेटेड 20 नवंबर , 2024

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन अपनी पार्टी द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) की लगातार दो कार्यकाल न जीत पाने की 50 साल पुरानी मनहूसियत तोड़ना चाहते हैं. डीएमके प्रमुख के लिए महज 18 महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव जीतना बेहद अहम है. 71 साल की उम्र में यह उनका बतौर मुख्यमंत्री अभी पहला ही कार्यकाल है, और वे फिर युवा होने से तो रहे. यही नहीं, अगर वे यह चुनाव जीत लेते हैं तो यह ऐसी उपलब्धि होगी जिसे उनके दिवंगत पिता और पांच-बार मुख्यमंत्री रहे एम. करुणानिधि भी हासिल नहीं कर सके. फिर परिवार का मामला तो है ही—स्टालिन अपने बेटे और पहली बार के विधायक उदयनिधि की कुर्सी सुरक्षित करना चाहते हैं, जिन्हें अक्तूबर में उपमुख्यमंत्री पद पर पदोन्नत कर दिया गया.

डीएमके प्रमुख ने पार्टी के कार्यकर्ताओं के लिए महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है—234 सदस्यों की विधानसभा में 200 सीट जीतना (अभी उनके पास अपनी 133 सीटें, और गठबंधन की सहयोगी पार्टियों के साथ 159 सीटें हैं). काम शुरू भी हो गया है. अक्तूबर में ही डीएमके ने सभी 234 निर्वाचन क्षेत्रों के लिए बाहरी पर्यवेक्षक नियुक्त कर दिए. पार्टी के महासचिव दुरईमुरुगन का कहना है कि ये पर्यवेक्षक बूथ कमेटियों और और बूथ स्तर के एजेंटों पर ध्यान देने के अलावा निर्वाचन क्षेत्र के विकास के बारे में सीधे पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को रिपोर्ट करेंगे और जीत सकने वाले उम्मीदवारों की पहचान भी करेंगे.

स्टालिन सरकार, पार्टी की जनछवि को सुधारने के लिए सामाजिक क्षेत्र के नित नए कार्यक्रम लाती रही है. डीएमके की अगुआई वाले सेक्युलर प्रोग्रेसिव एलायंस को, जिसमें कांग्रेस और 12 अन्य पार्टियां भी शामिल हैं, 2026 में सत्ता-विरोधी भावना से जूझना होगा. साथ ही उसे प्रतिद्वंद्वी दलों की चुनौती का सामना भी करना होगा, जिसमें रूपहले परदे के बड़े सितारे विजय की तमिलागा वेत्री कड़गम (टीवीके) भी है, जो ज्यादा युवा विकल्प पेश करने की उम्मीद कर रही है. राजनैतिक विश्लेषक रामू मणिवन्नन कहते हैं, ''डीएमके सरकार का कामकाज औसत रहा है, पर उसके कुछ कार्यक्रम और पहल सफल हैं. पार्टी में कोई खास अंतर्कलह नहीं दिखती, पर उदयनिधि के उभरने के साथ कुछ नए समीकरण बनेंगे.'' 

बीते तीन दशकों से डीएमके के सतरंगे गठबंधन ने छोटी-छोटी जातियों और समुदायिक धड़ों को अपने साथ जोड़े रखा है, जो चुनावों के दौरान उसका अहम जनाधार होते हैं. एकजुटता की इस पहल की बदौलत ही हाल के चुनावों में उसकी वोट हिस्सेदारी खासकर प्रतिद्वंद्वी एआइएडीएमके की सुप्रीमो जयललिता के गुजरने के बाद काफी बेहतर रही है.

फिर भी, चुनौतियां बेशुमार हैं. डीएमके जब भी सत्ता में होती है, उसके खिलाफ सत्ता-विरोधी भावना का हौआ बना रहता है. डीएमके विरोधी सोशल मीडिया एआइएडीएमके और भाजपा के अलग होने के बाद राजनैतिक लिहाज से भले बंट गया हो, पर डीएमके को लगातार आड़े हाथों लेता रहा है. राजनैतिक टिप्पणीकार एन. सत्य मूर्ति बताते हैं, "डीएमके के लिए अच्छी बात यह है कि एआइएडीएमके और भाजपा का गठजोड़ बुरी तरह टूटकर आपसी झगड़ों में फंसा है और उनके कार्यकर्ता भी हतोत्साहित हैं."

तमिल युवाओं की "जल्लीकट्टू के बाद की पीढ़ी में अलगाव" की बढ़ती भावना को भी डीएमके दूर करने पर ध्यान दे रहा है और उन्हें भाजपा की अगुआई वाले एनडीए और उसके द्रविड़-विरोधी हिंदुत्व से दूर ले जा रहा है. ऐसा करते हुए वह नई शिक्षा नीति और एनईईटी या नीट सहित शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़ी चिंताओं का भी निराकरण कर रहा है. यहीं उदयनिधि आगे आते हैं. उनके खिलाफ बहुतेरी आलोचनाओं के बावजूद युवा उनके साथ सहज ही तादात्म्य स्थापित कर पाते हैं. चुनाव प्रचार का उनका अनौपचारिक और बातचीत वाला तरीका ताजा हवा के झोंके की तरह है, जो उनके पिता सहित डीएमके के पुराने दिग्गजों की तीखी आवाजों वाले पारंपरिक चुनाव अभियान से उलट है.

बेशक पार्टी में उनके तेज उभार को सियासी प्रतिद्वंद्वी 'वंशवाद' बताकर आलोचना कर रहे हैं, मगर इसका डीएमके की चुनावी संभावनाओं पर तब तक असर नहीं पड़ना चाहिए जब तक कोई बड़ा घोटाला उदयनिधि से न जुड़े और मतदाता उस पर विश्वास न करने लगें. विश्लेषकों को लगता है कि उपमुख्यमंत्री को अपना खेमा विकसित करने में वक्त लगेगा और इतने सतर्क तो वे रहेंगे ही कि किसी ताकतवर को नाराज न करें.

डीएमके के लिए एक और फायदेमंद बात यह है कि एआइएडीएमके और भाजपा अपनी अंदरूनी मजबूरियों से घिरे हैं. सत्तारूढ़ पार्टी के खिलाफ अगर सिर्फ सत्ता-विरोधी भावना ही होती, तो एआइएडीएमके के लिए अच्छा प्रदर्शन करने का खासा मौका होता. मणिवन्नन यह भी कहते हैं, "ईपीएस के मातहत एआइएडीएमके चुनावी झटकों से अभी उबर ही रहा है. उसमें 2021 के विधानसभा चुनाव वाला दमखम शायद न हो. फिर भी रणनीतिक गठबंधन बनाने के साथ चतुर और सूक्ष्म बदलाव पार्टी की धारा मोड़ भी सकते हैं."

अगर चुनाव अभियान भाजपा केंद्रित हो जाता है, तो इसका फायदा डीएमके को ही मिलेगा. मूर्ति कहते हैं, "अगर भाजपा-विरोधी तत्व 2026 के विमर्श में भी हावी बने रहते हैं तो यह डीएमके के लिए फायदेमंद होगा. दरअसल, इस साल के लोकसभा चुनाव में भगवा खेमे से अपनी राह जुदा कर लेने के बावजूद एआइएडीएमके द्रविड़ मतदाताओं की नजर में संदिग्ध बना हुआ है."

यह साफ है कि राज्य भाजपा अध्यक्ष अन्नामलै और भाजपा जोश और रफ्तार गंवा बैठे. आगे बढ़ने के लिए उन्हें स्थानीय मुहावरे से नए सिरे से जुड़ने की जरूरत है. मूर्ति कहते हैं, ''सनातन धर्म के देशव्यापी अभियान और पिछले सितंबर से ही उदयनिधि को निशाना बनाने का लोकसभा चुनाव में कम ही प्रतिफल मिला. इसमें ऐसे सबक हैं जो राज्य भाजपा को जरूर सीखने चाहिए.'' डीएमके तो यही उम्मीद करेगा कि ऐसा कुछ न हो.

नया चुनावी खिलाड़ी

'इलैया थलापति' विजय सियासी अखाड़े में कूद पड़े हैं. क्या वे द्रविड़ आधिपत्य को तोड़ पाएंगे जो रजनी, कमल तक नहीं कर सके

नया दावेदार टीवीके का झंडा जारी करते विजय

तमिल सुपरस्टार विजय ने 8 सितंबर को एलान किया कि चुनाव आयोग ने उनकी पार्टी तमिलागा वेत्री कड़गम (टीवीके) को मान्यता देने के साथ "पहला दरवाजा खोल दिया है." दक्षिण में लोकप्रिय 50 वर्षीय इस अभिनेता ने कहा है कि वे पूरा ध्यान राजनीति पर केंद्रित करने के लिए फिल्मों को छोड़ रहे हैं. मगर क्या वे 2026 का चुनाव लड़ेंगे और कोई असर डाल पाएंगे?

तमिलनाडु की जड़ जमाई द्रविड़ राजनीति ऐसे अभिनेताओं से अटी पड़ी है, जो "बदलाव लाना" चाहते थे, मगर किनारे पड़ गए. "थलियावर" रजनीकांत ने 2018 में अपने प्रशंसक क्लबों को जुटाकर "रजनी मक्कल मंदरम" की शुरुआत की, पर वह कोई कमाल नहीं दिखा सकी. 'उलगनायगन' कमल हासन एक कदम आगे बढ़ गए और उनकी मक्कल निधि मय्यम ने 2019 (लोकसभा) और 2021 (विधानसभा) में चुनाव लड़ा, मगर उसके हाथ कुछ नहीं लगा. हासन आखिरकार डीएमके के नेतृत्व वाले गठबंधन के साथ हो लिए और बदले में उनसे राज्यसभा भेजने का वादा किया गया.

महिलाओं में 'इलैया थलापति (यंग जनरल)' की काफी लोकप्रियता है. मगर उन्हें टीवीके का वोटर बनाना आसान नहीं होगा क्योंकि वे काफी हद तक द्रमुक के लिए प्रतिबद्ध हैं और स्टालिन की महिला-केंद्रित योजनाओं ने इसमें मदद की है. विश्लेषक रामू मणिवन्नन कहते हैं, "अनुभव और सियासी भरोसे की कमी टीवीके के लिए बड़े नुक्सान हैं."

पूर्ण शराबबंदी का वादा उनका बढ़िया कदम हो सकता है, जैसा कि एन.टी. रामाराव ने 1980 के दशक में किया था और वे वोटरों को आश्वस्त करें कि इसको लेकर गंभीर हैं. मगर उन्हें अपनी फिल्मी छवि बदलनी होगी ताकि वोटर उन्हें गंभीर राजनेता के रूप में स्वीकार कर सकें. 2006 के विधानसभा चुनाव में दिवंगत विजयकांत की देसिया मुरपोक्कू द्रविड़ कड़गम के साथ यह रणनीति काम कर गई थी और उनकी ऑफस्क्रीन छवि तथा पार्टी के नाम में द्रविड़ टैग ने कुछ क्षेत्रों में कमाल किया था. पर वे भी जल्द किनारे हो गए.

विजय के मामले में, ऐसे सामाजिक-राजनैतिक मायने उनकी बड़े बजट की फिल्मों के कारोबार के सामने फीके पड़ जाते हैं. वे देश में सबसे ज्यादा भुगतान पाने वाले अभिनेताओं में हैं, पर उनके पास परोपकार के काम दिखाने को बहुत कम हैं. उनकी हालिया हिट फिल्म जी.ओ.ए.टी. सितंबर में आई (इसके लिए उन्हें 200 करोड़ रुपए मिले). उनकी आखिरी फिल्म बताई जा रही थलापति 69 अभी बन रही है.

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