
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की कार्रवाई के बीच पहले से ही मुश्किलों से घिरे मुख्यमंत्री सिद्धरामैया के समक्ष विवादास्पद जाति आधारित गणना और उपचुनाव समेत कई चुनौतियां हैं, जिन पर उनका बहुत कुछ दांव पर लगा है. कर्नाटक में कई तरह के पैंतरे आजमाए जा रहे हैं जिसमें मैसूरू शहरी विकास प्राधिकरण (मुडा) मामले में लोकायुक्त जांच के मद्देनजर विपक्ष की तरफ से इस्तीफे की मांग को लेकर सिद्धरमैया की घेराबंदी शामिल है. आरोप है कि मुडा की तरफ से भूखंड आवंटन में अनियमितता बरतकर सिद्धरामैया की पत्नी पार्वती बी.एम. को अप्रत्याशित लाभ पहुंचाने की कोशिश की गई.
दूसरी ओर, जाति आधारित गणना के रूप में ऐसा मुद्दा उभरकर सामने आया है, जो पूरे विमर्श का रुख बदल सकता है. एक दशक पुरानी रिपोर्ट ठंडे बस्ते से बाहर निकाली गई है और सिद्धरामैया ने इसी माह इसे चर्चा के लिए अपने मंत्रिमंडल के समक्ष रखने का संकल्प जताया है. यह सब ऐसे समय हो रहा है जब संदूर, शिगगांव और चन्नपटना सीटों पर विधानसभा उपचुनाव के लिए प्रचार जोर पकड़ने वाला है. निर्वाचन आयोग ने इन तीनों सीटों पर 13 नवंबर को उपचुनाव कराने की घोषणा की है.
सबसे पहले जाति आधारित गणना रिपोर्ट की बात करें तो सीएम सिद्धरामैया ने यह पहल 2014 में अपने पहले कार्यकाल के दौरान ही की थी. राज्य में पिछड़े वर्गों की सामाजिक-आर्थिक और शैक्षिक स्थिति के आकलन के लिए घर-घर जाकर किए गए सर्वे का वीरशैव-लिंगायत और वोक्कालिगा जैसे प्रभावशाली समुदायों के विरोध का सामना करना पड़ा क्योंकि 2016 में कथित तौर पर लीक रिपोर्ट के आधार पर इन समुदायों ने आरोप लगाया कि उनकी जनसंख्या अब तक के अनुमान से बहुत कम बताई गई है.
हालांकि 'लीक' रिपोर्ट को फर्जी बताकर खारिज कर दिया गया और इसे 2018 में सरकार को सौंपा गया, तब तक सिद्धरामैया की सरकार चुनाव हार चुकी थी. बाद की सरकारों ने इस तकनीकी आधार पर रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाले रखा कि कर्नाटक राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के सदस्य सचिव ने इस पर हस्ताक्षर नहीं किए थे. बाद में रिपोर्ट आयोग के नए अध्यक्ष के. जयप्रकाश हेगड़े को भेजी गई, जिन्होंने फरवरी में इसे सरकार के हवाले कर दिया.
बहुत संभव है कि मुख्यमंत्री रिपोर्ट के अध्ययन और इस पर अमल के लिए सिफारिशें देने के उद्देश्य से मंत्रिमंडल की एक उपसमिति बनाएं. कांग्रेस ने अपने चुनावी घोषणापत्र में यह वादा भी किया था. राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और अब केंद्रीय भारी उद्योग एवं इस्पात मंत्री एच.डी. कुमारस्वामी सवाल उठाते हैं, "सिद्धरामैया को जाति गणना संबंधी रिपोर्ट लोकसभा चुनाव से पहले सौंपी गई थी. फिर अब तक इस पर कोई चर्चा क्यों नहीं हुई?" जेडीएस नेता ने आरोप लगाया, "उन्होंने मुडा घोटाले से ध्यान भटकाने के लिए जाति आधारित गणना का मुद्दा उठाया है."
मुडा का मुद्दा तभी से गर्म है जब सितंबर में कर्नाटक उच्च न्यायालय ने इसमें कथित भ्रष्टाचार की जांच कराने के राज्यपाल थावरचंद गहलोत के आदेश को बरकरार रखा. सिद्धरामैया ने भी घोषणा कर दी कि वे जांच का सामना करने को तैयार हैं और दावा किया कि कोई भी अनियमितता नहीं बरती गई है क्योंकि उनकी पत्नी को आवासीय परियोजना तैयार किए जाने के दौरान अधिग्रहीत भूमि के बदले भूखंड आवंटित किया गया. हालांकि, मैसूरू की लोकायुक्त पुलिस की तरफ से मुख्यमंत्री के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने के महज दो दिन बाद ही 30 सितंबर को प्रवर्तन निदेशालय ने भी धनशोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत मामले की जांच शुरू कर दी.
इस पूरे घटनाक्रम पर तीखी प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए कांग्रेस ने आरोप लगाया कि भाजपा सिद्धरामैया सरकार को अपदस्थ करने की कोशिश कर रही है. वहीं, सिद्धरामैया ने अपने स्तर पर 5 अक्टूबर को रायचूर जिले के मानवी शहर में शक्ति प्रदर्शन किया और समर्थकों से कहा, "मैंने क्या गलती की है? क्या चरवाहे का बेटा दो बार राज्य का मुख्यमंत्री नहीं बन सकता?"
मुडा मामले पर इतना हो-हल्ला होने के बावजूद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मुख्यमंत्री की कुर्सी पर फिलहाल किसी तरह के खतरे को सिरे से खारिज करते हैं. उनका कहना है कि सीएम पूरी मजबूती से कानूनी लड़ाई लड़ेंगे और उन्हें पार्टी का पूरा समर्थन हासिल है. फिर भी, पार्टी आलाकमान को आगे आकर नेतृत्व परिवर्तन की अटकलों को खारिज करना पड़ा, जो जी. परमेश्वर, एच.सी. महादेवप्पा और सतीश जरकिहोली जैसे वरिष्ठ मंत्रियों के बीच हालिया मुलाकातों से उपजी थीं. खासकर, जरकिहोली के दिल्ली दौरों ने उन्हें सुर्खियों में ला दिया.
सिद्धरामैया के विश्वस्त जरकिहोली एसटी समुदाय के कद्दावर नेता हैं. ऐसे में दो प्रमुख एससी नेताओं परमेश्वर और महादेवप्पा के साथ उनकी बैठकों ने इन अटकलों को हवा दी कि नेतृत्व परिवर्तन की स्थिति में कर्नाटक को अपना पहला दलित या आदिवासी सीएम मिलने की मांग फिर उठ सकती है. यह एक ऐसा मुद्दा है जो राज्य के राजनीतिक विमर्श में बार-बार उठता रहा है. कहा तो यह भी जा रहा है कि सिद्धरामैया खेमे से दावेदारों की उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के साथ होड़ शुरू हो सकती है जो अभी सरकार में नंबर-2 की हैसियत रखते हैं. हालांकि, पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि सिद्धरामैया कर्नाटक में अब तक के सबसे लोकप्रिय कांग्रेस नेता बने हुए हैं. उनके मुताबिक, ये ऐसे मामले हैं जो लंबे समय तक खिंचने वाले हैं.
बहरहाल, सत्तारूढ़ पार्टी को अभी तो 13 नवंबर को होने वाले उपचुनावों के लिए कमर कसनी होगी, जो पूर्व मुख्यमंत्रियों कुमारस्वामी एवं बसवराज बोम्मई और विधायक ई. तुकाराम के लोकसभा के लिए चुने जाने से खाली हुई सीटों पर होने जा रहे हैं. तीन उपचुनावों में चन्नापटना ऐसी सीट है, जिसे कुमारस्वामी ने खाली किया है और क्षेत्र के वोक्कालिगा समुदाय पर दबदबा बनाए रखने के लिए उनके और उनके धुर विरोधी शिवकुमार के बीच तगड़ी होड़ लगी है.
लंबा और घुमावदार है ये रास्ता
3 नवंबर 2023: सिद्धरमैया सरकार ने मुडा भूखंड आवंटन में कथित धांधली के आरोपों की जांच के लिए एक तकनीकी समिति बनाई.

जुलाई 2024: मुडा की तरफ से 2021 में भाजपा शासन के दौरान आवंटित 14 भूखंडों को लेकर विवाद. 55.80 करोड़ रुपये की अनुमानित कीमत वाले ये भूखंड मुडा ने अधिग्रहीत भूमि के मुआवजे के तौर पर आवंटित किए थे.
14 जुलाई: सिद्धरमैया ने मुडा पर लगे सभी आरोपों की जांच के लिए एक न्यायिक आयोग गठित किया.
26 जुलाई: सामाजिक कार्यकर्ता टी.जे. अब्राहम ने राज्यपाल थावर चंद गहलोत के समक्ष याचिका दायर करके मुडा के भूखंड प्राप्त करने के लिए मुख्यमंत्री के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मुकदमा चलाने की मंजूरी मांगी; फिर दो और लोगों ने शिकायत दर्ज कराई.
16 अगस्त: राज्यपाल ने आरोपों की जांच के लिए मंजूरी दी.
24 सितंबर: कर्नाटक उच्च न्यायालय ने राज्यपाल के आदेश को बरकरार रखा.
26 सितंबर: कर्नाटक ने राज्य में केंद्रीय जांच ब्यूरो के जांच करने संबंधी सामान्य सहमति वापस ली.
28 सितंबर: लोकायुक्त पुलिस ने सिद्धरमैया, उनकी पत्नी पार्वती और पत्नी के भाई बी.एम. मल्लिकार्जुनस्वामी के खिलाफ एफआईआर दर्ज की.
29 सितंबर: मैसूरू में एक कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री ने जाति जनगणना लागू करने का वादा किया.
30 सितंबर: ईडी ने मुडा मामले की जांच शुरू की; पार्वती ने मुडा को अपने 14 भूखंड लौटाए.
7 अक्तूबर: मुख्यमंत्री ने आगामी कैबिनेट मीटिंग में जाति आधारित गणना पर चर्चा करने की घोषणा की.
जो हैं इंतजार में
सिद्धरामैया की मुसीबतें जैसे जैसे बढ़ रही हैं, इन नेताओं के माथे पर पड़ रहे हैं बल
डी.के. शिवकुमार, 62 वर्ष
2023 में उनके नेतृत्व में ही पार्टी ने तीन दशकों में सबसे बड़ी जीत दर्ज की, जिसके बाद सीएम पद के लिए उनके और सिद्धरामैया के बीच खासी रस्साकशी भी दिखी. दोनों नेताओं के बीच समझौते के तहत उपमुख्यमंत्री का पद मिला और संभवत: मध्यावधि में नेतृत्व बदलने पर भी सहमति बनी. मुख्यमंत्री की लोकप्रियता को देखते हुए वह पूरी दृढ़ता के साथ उनके डिप्टी की भूमिका निभा रहे.
जी. परमेश्वर, 73 वर्ष
2013 में मुख्यमंत्री बनने का मौका उनके हाथ से निकल गया, क्योंकि उनके नेतृत्व में पार्टी ने तो शानदार जीत हासिल की लेकिन खुद अपनी सीट पर उन्हें हार का सामना करना पड़ा. शिष्ट और सौम्य स्वभाव वाले गृह मंत्री राज्य के पहले दलित मुख्यमंत्री बनने की दौड़ में हैं.
सतीश जरकिहोली, 62 वर्ष
वैसे, वे इस शीर्ष पद के लिए अगले कार्यकाल तक प्रतीक्षा करने को तैयार हैं, लेकिन बेलगावी के कद्दावर नेता और पीडब्ल्यूडी मंत्री इन दिनों सुर्खियों में बने हुए हैं. कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राज्य के मंत्रियों के साथ उनकी हालिया बैठकों ने सियासी अटकलें तेज कर दी हैं.
एच.सी. महादेवप्पा, 71 वर्ष
महादेवप्पा का नाम हाल में शीर्ष मंत्रियों की एक बैठक में शामिल होने के कारण चर्चा में आया. सिद्धरामैया के विश्वस्त सहयोगी और मौजूद समय में राज्य के समाज कल्याण मंत्री महादेवप्पा एक दलित नेता हैं.
- अजय सुकुमारन

