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क्या अरविंद केजरीवाल के सामने स्मृति ईरानी होंगी बीजेपी का सीएम फेस?

दिल्ली विधानसभा चुनाव में केजरीवाल के सामने किसे नेतृत्व सौंपा जाए इस पर बीजेपी और कांग्रेस की अपनी-अपनी दुविधा है

बीजेपी के सदस्यता अभियान की एक बैठक में पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी और सांसद बांसुरी स्वराज
बीजेपी के सदस्यता अभियान की एक बैठक में पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी और सांसद बांसुरी स्वराज
अपडेटेड 25 अक्टूबर , 2024

पिछले दो विधानसभा चुनाव से दिल्ली में आम आदमी पार्टी (आप) और इसके नेता अरविंद केजरीवाल प्रदेश की मुख्य विपक्षी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और लंबे समय तक यहां की सत्ता में रहने वाली कांग्रेस के किसी भी नेता के मुकाबले काफी आगे दिखते रहे हैं. यही वजह है कि इस समय बीजेपी और कांग्रेस दोनों में इस बात को लेकर माथापच्ची चल रही है कि तीन महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में पार्टी का नेतृत्व कौन करेगा.

बीजेपी 2015 में पूर्व पुलिस अधिकारी किरण बेदी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाकर चुनाव लड़ी थी, लेकिन तब पार्टी तो चुनाव हारी ही, बेदी भी अपनी सीट नहीं बचा पाई थीं. तब पार्टी को 70 विधानसभा सीटों में से महज तीन पर जीत मिली थी. कांग्रेस की हालत तो इससे भी बुरी थी. अजय माकन के नेतृत्व में पार्टी एक भी सीट नहीं जीत पाई थी.

2020 के विधानसभा चुनाव में जहां आप को 53.57 फीसद वोट मिले थे, वहीं बीजेपी के खाते में 38.51 फीसद वोट आए थे. 2015 के विधानसभा चुनाव के मुकाबले बीजेपी के वोटों में 6.21 फीसद की बढ़ोतरी हुई थी. ऐसे में बीजेपी की योजना यह है कि वह इस बार केजरीवाल और आप नेताओं पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों का मुद्दा अगर आक्रामक ढंग से उठाती है और अपनी वोट हिस्सेदारी को पांच से छह फीसद और बढ़ाने में कामयाब होती है तो दिल्ली की सत्ताधारी पार्टी को कड़ी टक्कर दे सकती है.

इस पृष्ठभूमि में बीजेपी के अंदर एक बात यह भी चल रही है कि दिल्ली में मुख्यमंत्री आतिशी के सामने बीजेपी के चुनाव अभियान का नेतृत्व किसी महिला के हाथों में ही होना चाहिए. जो नेता इस बात को आगे बढ़ा रहे हैं, उनका तर्क है कि भले ही आप इस चुनाव को केजरीवाल बनाम बीजेपी या मोदी करने की कोशिश करे लेकिन पार्टी को यह चुनाव आतिशी बनाम अपनी किसी महिला नेता की लाइन पर ले जाने की कोशिश करनी चाहिए.

यह चर्चा इसलिए भी अधिक प्रमुखता से हो रही है क्योंकि पूर्व केंद्रीय मंत्री हर्षवर्धन, विजय गोयल और जगदीश मुखी अब सक्रिय राजनीति से दूर जा चुके हैं. इसके बाद बीजेपी ने दिल्ली में नया नेतृत्व विकसित करने के लिए लगातार कोशिश की लेकिन बहुत कामयाब नहीं रही.

इन हालात में पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी को दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए आगे बढ़ाने पर काफी गंभीरता से चर्चा चल रही है. यह चर्चा उस समय खुलकर सामने आई जब कुछ दिन पहले बीजेपी के एक राष्ट्रीय पदाधिकारी ने प्रदेश इकाई की एक बैठक ली. इसमें दिल्ली के नेताओं से राय ली गई थी कि स्मृति ईरानी की अगुआई में चुनाव लड़ा जाए तो पार्टी को कितना फायदा हो सकता है.

इसके बाद पार्टी में कई स्तर पर ऐसी चर्चाएं हुईं. दिल्ली बीजेपी के एक नेता बताते हैं, "फिलहाल इस बात पर सहमति बनती दिख रही है कि स्मृति ईरानी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित न करके उन्हें विधानसभा चुनाव लड़वाया जाए और वे प्रचार अभियान का नेतृत्व करें. यानी बात पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की हो लेकिन जमीनी स्तर पर कमान ईरानी के हाथ में रहे."

ऐसा लगता है कि पूर्व केंद्रीय मंत्री को भी इस बात का एहसास है कि लोकसभा चुनाव हारने के बाद उनकी वापसी का मौका दिल्ली में ही है. इसलिए बीजेपी के सदस्यता अभियान में उन्होंने दिल्ली में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. इसके लिए पार्टी ने पूरी दिल्ली को 14 भागों में बांटा था. इनमें से सात के सुपरविजन की जिम्मेदारी स्मृति ईरानी को दी गई थी. पार्टी के कुछ नेताओं का यह भी दावा है कि बीते दिनों ईरानी ने दक्षिणी दिल्ली में एक मकान खरीदा है. इसके अलावा वे नवरात्रि के दौरान राजधानी में कई जगह आयोजित हुईं रामलीला में भी बतौर अतिथि शामिल हुई हैं. इन दोनों कवायदों को भी उनके राजधानी की राजनीति में सक्रिय होने से जोड़ा जा रहा है.

पार्टी के भीतर स्मृति ईरानी के पक्ष में कई तर्क दिए जा रहे हैं. पहला तो यही कि आतिशी के मुकाबले महिला उम्मीदवार ज्यादा कारगर साबित हो सकती है. दूसरी दलील है कि वे केजरीवाल को उनके ही अंदाज में जवाब देने की क्षमता में बाकियों से बहुत आगे हैं. फिर यह भी कहा जा रहा है कि ईरानी पहले भी दिल्ली के चांदनी चौक से लोकसभा चुनाव लड़ी हैं और वे मूल रूप से दिल्ली की ही हैं. इस नाते यहां के लोग उनसे एक जुड़ाव महसूस कर पाएंगे.

लेकिन इस राह में ईरानी की सबसे बड़ी चुनौती पार्टी का प्रदेश संगठन है. प्रदेश बीजेपी के एक पदाधिकारी कहते हैं, "दिल्ली के अधिकतर वरिष्ठ नेता ईरानी के पक्ष में नहीं हैं. किसी को उनके व्यवहार से समस्या है तो किसी को दिल्ली बीजेपी में नेताओं की अक्सर होने वाली पैराशूट लैंडिंग से, जैसी कि यहां मनोज तिवारी की हुई और पहले किरण बेदी आई थीं." फिर भी अगर केंद्रीय नेतृत्व ने ईरानी के नाम पर ही मोहर लगाई तो क्या प्रदेश बीजेपी संगठन उनसे पर्याप्त सहयोग करेगा? इस सवाल के जवाब में ये नेता कहते हैं, "बिल्कुल सहयोग करेंगे लेकिन बेमन से काम करने से कार्यकर्ताओं के उत्साह में कमी तो आती है."

इधर, बीजेपी के मुकाबले कांग्रेस ज्यादा दुविधा में दिख रही है. लोकसभा चुनाव से पहले पार्टी की अगुआई में बने इंडिया गठबंधन में आप शामिल है. लोकसभा चुनाव में दोनों पार्टियों ने दिल्ली और हरियाणा में गठबंधन के तहत प्रत्याशी उतारे थे. लेकिन हरियाणा का चुनाव दोनों पार्टियां अलग-अलग लड़ीं. दिल्ली में भी इनके साथ आने की संभावना न के बराबर ही है.

अब चूंकि दोनों पार्टियां इंडिया गठबंधन का हिस्सा हैं, सो केंद्र की मोदी सरकार को घेरने के लिए अमूमन एक जैसा रुख अपनाती हैं. इस वजह से दिल्ली प्रदेश के कांग्रेस नेताओं और उनसे भी ज्यादा पार्टी कार्यकर्ताओं में इस बात को लेकर भ्रम की स्थिति दिख रही है कि उन्हें आप, अरविंद केजरीवाल और दिल्ली सरकार की नीतियों को लेकर कितना आक्रामक दिखना है. प्रदेश कांग्रेस के नेता कुछ मुद्दों पर दिल्ली सरकार पर हमला करते दिखते हैं तो पार्टी के केंद्रीय नेता आप के नेताओं के साथ मंच साझा करते नजर आते हैं.

इन वजहों से पार्टी के अंदर एक तरह से आम सहमति है कि मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करके चुनाव में नहीं उतरना है. अभी दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष देवेंद्र यादव हैं. पार्टी के एक पदाधिकारी का कहना है कि उनके अलावा किसी प्रमुख नेता को चुनाव प्रचार अभियान समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया जा सकता है और फिर इन दोनों के नेतृत्व में चुनाव लड़ा जाएगा. वे यह भी कहते हैं कि कांग्रेस और आप का जो 'जटिल रिश्ता' है, उसमें प्रदेश कांग्रेस का कोई भी प्रमुख नेता इस बात के लिए कोशिश नहीं कर रहा है कि पार्टी उसे मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करे क्योंकि कोई भी इस प्रक्रिया में 'बलि का बकरा' बनकर अपनी राजनैतिक संभावनाओं पर ग्रहण नहीं लगाना चाहता.

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