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मुख्यमंत्री बनने के बाद शुरू हुई उमर अब्दुल्ला की असल मुश्किल

उमर अब्दुल्ला के लिए इस बार मुख्यमंत्री पद इसलिए भी कांटों भरा ताज होगा क्योंकि राज्य के जनादेश में कश्मीर घाटी और जम्मू के बीच ध्रुवीकरण स्पष्ट तौर पर नजर आ रहा है

नेशनल कॉन्फ्रेंस के उपाध्यक्ष उमर अब्दुल्ला 22 सितंबर को श्रीनगर की डल झील में शिकारा रैली के दौरान अपनी पार्टी के झंडे के साथ
नेशनल कॉन्फ्रेंस के उपाध्यक्ष उमर अब्दुल्ला 22 सितंबर को श्रीनगर की डल झील में शिकारा रैली के दौरान अपनी पार्टी के झंडे के साथ
अपडेटेड 21 अक्टूबर , 2024

उमर अब्दुल्ला यह स्वीकारने वाले पहले इंसान हैं कि जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव जीतना आसान काम था. जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस (जेकेएनसी) के उपाध्यक्ष उमर ने अपनी पार्टी और इंडिया गठबंधन की घटक कांग्रेस के साथ मिलकर लड़े गए इस चुनाव में बेहद आसानी से बहुमत हासिल करके एक नया इतिहास रच दिया.

इसके साथ ही उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की अपने दम पर सरकार बनाने और जम्मू-कश्मीर के इतिहास में पहली बार भाजपा के मुख्यमंत्री को कुर्सी पर बैठाने की योजना पर पानी भले फेर दिया हो, लेकिन उमर अच्छी तरह जानते हैं कि 2008 से 2014 के बीच बतौर मुख्यमंत्री उनके पिछले कार्यकाल- जिसमें उन्होंने जेकेएनसी-कांग्रेस गठबंधन सरकार का नेतृत्व किया था- के उलट यह दूसरा कार्यकाल पहाड़-सी चुनौतियों से भरा होगा.

वे खुद मानते हैं, "अपनी पहली पारी में मैं सबसे सशक्त राज्य का मुख्यमंत्री था. लेकिन अब जम्मू-कश्मीर देश का सबसे कमजोर केंद्र शासित प्रदेश है. यह जीत भले उत्साहजनक हो लेकिन लोगों ने जिस तरह से बड़ी-बड़ी उम्मीदें लगा रखी हैं, उस बारे में सोचकर थोड़ा डर लगता है."

एक बार फिर मुख्यमंत्री पद संभालने जा रहे उमर अच्छी तरह जानते हैं कि मोदी सरकार की तरफ से 5 अगस्त, 2019 को जम्मू-कश्मीर को असाधारण स्वायत्तता देने वाला अनुच्छेद 370 निरस्त करने, राज्य को लद्दाख से अलग करने और केंद्र शासित राज्य बना देने के बाद उनकी शक्तियां बहुत ज्यादा घट जाएंगी. यही नहीं, केंद्र सरकार ने हाल ही में केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर में सरकारी कामकाज संबंधी नियमों में संशोधन किया है ताकि यह पक्का किया जा सके कि उपराज्यपाल मनोज सिन्हा के पास कहीं ज्यादा प्रशासनिक और कानूनी शक्तियां रहें.

नए बदलावों के तहत उपराज्यपाल को आईएएस और आईपीएस अधिकारियों के तबादले का अधिकार हासिल होगा; वहीं जम्मू-कश्मीर पुलिस और कानून-व्यवस्था पर नियंत्रण और महाधिवक्ता समेत न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति का अधिकार भी उन्हीं के पास रहेगा. नए नियमों के तहत भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो, अभियोजन मामले और जेलों पर नियंत्रण भी उपराज्यपाल के हाथों में होगा.

वैसे तो उमर ने चुनाव के पहले यह घोषणा कर दी थी कि चुनाव नहीं लड़ेंगे क्योंकि चपरासी तक की नियुक्ति के लिए भी 'फाइल पर हस्ताक्षर के लिए उपराज्यपाल कार्यालय के बाहर इंतजार करने’ का उनका कोई इरादा नहीं है. दूसरी बात यह थी कि उमर जून, 2024 में अपनी संसदीय सीट जीतने में नाकाम रहे थे. उन्हें बारामूला निर्वाचन क्षेत्र में जेल में बंद एक निर्दलीय उम्मीदवार इंजीनियर रशीद ने हराया था. लेकिन जब पार्टी में उनके सहयोगियों ने समझाया कि पार्टी चुनाव में शामिल होने की योजना बना रही है, ऐसे में अगर वही चुनाव नहीं लड़ेंगे तो जीत की संभावनाएं धूमिल हो जाएंगी, तब जाकर उन्होंने अपना रुख बदला.

ध्रुवीकृत जनादेश

उमर के लिए इस बार मुख्यमंत्री पद इसलिए भी कांटों भरा ताज होगा क्योंकि राज्य के जनादेश में कश्मीर घाटी और जम्मू के बीच ध्रुवीकरण स्पष्ट तौर पर नजर आ रहा है. नेशनल कॉन्फ्रेंस की जीती कुल 42 सीटों में से सात जम्मू क्षेत्र की लेकिन सभी मुस्लिम बहुल क्षेत्र की हैं. सहयोगी कांग्रेस ने गठबंधन को काफी निराश किया. इसने जम्मू की 43 सीटों में से 29 पर चुनाव लड़ा था, लेकिन केवल एक सीट हासिल कर सकी और वह भी मुस्लिम बहुल निर्वाचन क्षेत्र में.

अपने ही गढ़ में (बाएं से क्रमश:) भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव तरुण चुघ, केंद्रीय राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह, केंद्रीय गृह मंत्री अ

कांग्रेस ने पांच अन्य सीटें मुस्लिम बहुल घाटी में जीतीं. 29 सीटों पर जीतने वाली भाजपा ने जम्मू की सभी हिंदू बहुल सीटों पर कब्जा जमाया. लेकिन घाटी में अपना खाता भी नहीं खोल सकी. इसका सीधा-सा मतलब है कि मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने के बाद उमर को हिंदू बहुल जम्मू के लोगों का भरोसा जीतने के लिए कड़ी मशक्कत करनी होगी.

जम्मू-कश्मीर के पूर्व वित्त मंत्री हसीब ए. द्राबू का मानना है कि चुनाव नतीजों ने जम्मू-कश्मीर के बीच की खाई और चौड़ी कर दी है. उनकी राय है, "दोनों क्षेत्र अब एक अशांत अतीत के अलावा कुछ भी साझा नहीं करते. दोनों में भौगोलिक, भाषाई, सांस्कृतिक, जातीय, आर्थिक और धार्मिक समानता जैसा कुछ भी नहीं." उमर जानते हैं कि यह ध्रुवीकरण कितना गंभीर मसला है. वे कहते हैं कि उनकी सरकार केवल एनसी-कांग्रेस सरकार नहीं होगी बल्कि समाज के सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व करेगी. उन्हीं के शब्दों में, "कश्मीर और जम्मू के पहाड़ों में वोट नहीं बंटे. लोगों ने जिम्मेदारी के साथ मतदान किया. अब हमारे गठबंधन की जिम्मेदारी है कि वह एक साफ-सुथरी सरकार दे जो लोगों की उम्मीदों पर खरी उतरे."

केंद्र सरकार के साथ तालमेल बैठाना और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वादे के मुताबिक जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा बहाल कराने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ना उमर अब्दुल्ला की सबसे बड़ी चुनौती है क्योंकि तभी उनके पास जम्मू-कश्मीर की कई बड़ी समस्याओं से निबटने की शक्ति होगी. चुनावी जीत के बाद केंद्र के साथ संबंधों की बात करते समय उमर ने अपने शब्द बड़ी सावधानी से चुने और कहा कि वे किसी तकरार के बजाय सौहार्दपूर्ण संबंध चाहते हैं. साथ ही जोड़ा, "इसके लिए दोनों हाथों से ताली बजानी होगी."

इसका सीधा आशय यही है कि उन्हें उम्मीद है कि केंद्र मददगार और सहयोगी की भूमिका निभाएगा. राज्य का दर्जा बहाल होने में देरी को लेकर चिंताओं के सवाल पर उमर ने इंडिया टुडे टीवी से बातचीत में कहा, "मैं माननीय प्रधानमंत्री के इस वादे पर भरोसा करना चाहूंगा कि वे राज्य का दर्जा बहाल करने के लिए प्रतिबद्ध हैं. मुझे ऐसा कोई भाषण याद नहीं जिसमें उन्होंने कहा हो कि राज्य का दर्जा तभी बहाल होगा जब भाजपा सत्ता में होगी या फिर अगर जम्मू-कश्मीर के लोगों ने भाजपा को वोट नहीं दिया तो उन्हें इस तरह का कोई दंड मिलेगा."

उमर अब्दुल्ला का कहना है कि जम्मू-कश्मीर विधानसभा में पहला प्रस्ताव राज्य का दर्जा बहाल करने पर ही लाया जाएगा. नेशनल कॉन्फ्रेंस के एक अन्य नेता कहते हैं, "केंद्र सरकार जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा देने के लिए बाध्य है लेकिन इसकी कोई समयसीमा नहीं. पर हमारे पास विकल्प हैं, जैसे कि यह मुद्दा सुलझाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया जा सकता है. सरकार में हमारी मौजूदगी नई दिल्ली पर दबाव बनाएगी और हम पक्का करेंगे कि लोगों को पता चले कि क्या हो रहा है. अब तक उनके फरमान रोकने वाला कोई नहीं था."

निभाने होंगे वादे

नेशनल कॉन्फ्रेंस ने अपने घोषणापत्र में 12 गारंटी दी थीं, जिसमें अनुच्छेद 370 की बहाली, कश्मीर पर भारत-पाकिस्तान वार्ता के लिए दबाव बनाना, राजनैतिक बंदियों की रिहाई और जमीन तथा नौकरियों पर स्थानीय लोगों का अधिकार सुरक्षित करने के लिए कानून बनाना शामिल है. उमर का कहना है कि नौकरियां, महंगाई और नागरिक सुविधाओं जैसे रोजमर्रा के मसलों का हल निकालना उनकी शीर्ष प्राथमिकता है.

इसमें बिजली, गैस और खाद्यान्न जैसी मुफ्त सुविधाएं देने के वादे भी शामिल हैं. हालांकि, इन सुविधाओं पर होने वाले खर्च का अधिकांश वितरण और नियंत्रण केंद्र के हाथों में है, इसलिए यह वादा पूरा करने के लिए भी उन्हें केंद्र सरकार के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध बनाकर रखने होंगे. कश्मीर में अधिकांश लोगों का मानना है कि ये नेशनल कॉन्फ्रेंस के लिए पूरे जम्मू-कश्मीर की पार्टी बनने और मुख्य क्षेत्र जम्मू में भी पैठ मजबूत करने का एक अवसर है.

यह आंशिक रूप से भाजपा की नीतियों—जिसमें राज्यों की शक्तियों में कटौती, जम्मू-कश्मीर में सरकारी जमीन 'लोगों’ से वापस लेने के लिए चलाया गया अतिक्रमण विरोधी अभियान, बढ़ती बेरोजगारी और बिजली बिलों में बढ़ोतरी आदि—के उनके मुखर विरोध का ही नतीजा था कि नेशनल कॉन्फ्रेंस सत्ता हासिल करने में सफल रही. उमर की पार्टी को 2019 में अनुच्छेद 370 निरस्त करने के बाद से मोदी सरकार के नीतिगत हमलों का मुकाबला करने में सक्षम पार्टी के तौर पर देखा जा रहा है. भाजपा को देशभर में अपनी कथित मुस्लिम विरोधी नीतियों के कारण भी घाटी में संदेह की नजर से देखा जा रहा था. हाल में पेश वक्फ संशोधन विधेयक ने लोगों की नाराजगी को और बढ़ा दिया.

भाजपा को झटका

इस बीच भाजपा को नेशनल कॉन्फ्रेंस के 23.4 फीसद और कांग्रेस के 12 फीसद वोटशेयर के मुकाबले 25.6 फीसद के साथ सबसे ज्यादा वोट बटोरने का श्रेय दिया जा सकता है. जम्मू में 29 सीटें जीतने से भी उसके हौसले बुलंद हैं, खासकर जब इस क्षेत्र में नागरिक सुविधाओं और विकास संबंधी मुद्दों को लेकर खासा असंतोष कायम था. मोदी सरकार शांतिपूर्ण चुनाव करवाने के लिए भी प्रशंसा की पात्र है, जिसमें अधिकांश निर्वाचन क्षेत्रों में 65 फीसद से ज्यादा वोट पड़े. जम्मू में भाजपा ने अपनी खास रणनीति के तहत नए चेहरों को जगह देने के लिए कई दिग्गजों को किनारे कर दिया.

इसने व्यापक तौर पर यह प्रचार भी किया कि कैसे अनुच्छेद 370 निरस्त होने से क्षेत्र में शांति आई है और सिर्फ भाजपा ही इसकी बहाली की मुखर मांग को विफल कर सकती है. शायद यही वजह है कि नागरिक सुविधाओं के मुद्दे पर नाराजगी को भूलकर लोगों ने जम्मू में भाजपा को बड़ी जीत दिलाई.

जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा जम्मू के रियासी में एक कार्यक्रम के दौरान

जम्मू-कश्मीर के एक विशेषज्ञ कहते हैं, "निश्चित तौर पर भाजपा क्षेत्र में शांति कायम करने में सफल रही है और यह सराहनीय है. पर उन्होंने अपने वादे के मुताबिक पर्याप्त विकास नहीं किया. साथ ही प्रशासनिक उदासीनता भी कम नहीं थी. भाजपा इस मामले में भाग्यशाली रही कि कांग्रेस ने प्रशासन के खिलाफ लोगों के गुस्से के बावजूद खराब प्रदर्शन किया. सो भाजपा शांति कायम होने का लाभ भुनाने में सफल रही."

बहरहाल, नतीजे भाजपा और मोदी सरकार दोनों के लिए एक झटका हैं. सरकार और पार्टी दोनों का पिछले पांच वर्षों के दौरान जम्मू-कश्मीर की सत्ता पर हर तरह का नियंत्रण रहा है. परिसीमन प्रक्रिया के माध्यम से उन्होंने जम्मू क्षेत्र की सीटों की संख्या छह और बढ़ा दी, जो 37 से 43 हो गईं और कश्मीर को केवल एक अतिरिक्त सीट मिली, और यहां कुल सीटें 46 से  47 हुईं. इस प्रक्रिया के तहत जम्मू क्षेत्र में अनुसूचित जनजातियों के लिए नौ सुरक्षित सीटें भी निर्धारित की गईं.

भाजपा आरक्षित श्रेणी में शामिल करके बड़े पैमाने पर हिंदू पहाड़ी समुदाय का दिल जीतने की उम्मीद कर रही थी. पर मुस्लिम आदिवासी मतदाताओं को लुभाने के पार्टी के प्रयासों के बावजूद इसका कोई प्रभाव नजर नहीं आया. नेशनल कॉन्फ्रेंस-कांग्रेस गठबंधन ने यहां नौ सीटें जीत लीं. नेशनल कॉन्फ्रेंस के वोट काटने को भाजपा ने जम्मू-कश्मीर अपनी पार्टी और डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव आजाद पार्टी (डीपीएपी) के अलावा कई निर्दलीयों को उतारने की रणनीति बनाई थी पर वह भी सफल न हुई.

इस चुनाव में एक और झटका पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती की अध्यक्षता वाली पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) को लगा, जिसका लगभग सूपड़ा साफ हो गया. 90 सीटों वाली विधानसभा में पीडीपी महज तीन सीटों पर सिमट गई. पार्टी ने कुपवाड़ा, पुलवामा और त्राल में ही जीत हासिल की. पीडीपी का गढ़ माने जाने वाले दक्षिण कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस की जीत ने पार्टी का सफाया कर दिया. अनंतनाग जिले की सभी चार सीटें नेशनल कॉन्फ्रेंस के खाते में आईं.

इसमें मुफ्ती परिवार का गढ़ भी शामिल है, जहां महबूबा मुफ्ती की बेटी इल्तिजा चुनाव मैदान में थीं. सियासी पारी की शुरुआत में ही उन्हें हार का सामना करना पड़ा. श्रीगुफवारा-बिजबेहाड़ा निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ने वाली युवा और मुखर नेता 37 वर्षीय इल्तिजा को नेशनल कॉन्फ्रेंस नेता बशीर अहमद वीरी ने हराया. इसके साथ ही 1996 से यहां कायम रहा मुफ्ती परिवार का तीन दशक पुराना सियासी दबदबा खत्म हो गया. हालांकि, इल्तिजा ने अपनी सियासी लड़ाई जारी रखने की प्रतिबद्धता जताई है. जाहिर है, न केवल इल्तिजा बल्कि सभी राजनैतिक खिलाड़ियों को जम्मू-कश्मीर जैसे संवेदनशील क्षेत्र में आगे बढ़ना होगा और राजनैतिक दांवपेचों से ऊपर उठकर यह पक्का करना होगा कि यह सीमावर्ती इलाका शांति और विकास दोनों की राह पर आगे बढ़ता रहे.

——साथ में कलीम गिलानी, श्रीनगर में

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