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बिहार : पहले से तैयारी के बाद भी बाढ़ हर बार भयानक आपदा कैसे बन जाती है?

उतरते सितंबर में उत्तर बिहार में आई भीषण बाढ़ ने सरकारी तैयारियों की पोल खोल दी. पिछले साल अक्तूबर से ही चल रहे तटबंध सुरक्षा अभियान के बावजूद आठ जगह तटबंध टूट गए. ऐसे में सरकारी बचाव और राहत कार्यों की धीमी गति पर सवाल उठ रहे. साल भर की बाढ़ पूर्व तैयारियों के रूप में सरकार आखिर करती क्या रही?

सीतामढ़ी के तिलक ताजपुर गांव में तटबंध टूटने से आई तबाही का नजारा
सीतामढ़ी के तिलक ताजपुर गांव में तटबंध टूटने से आई तबाही का नजारा
अपडेटेड 22 अक्टूबर , 2024

सीतामढ़ी के तिलक ताजपुर गांव में बागमती के टूटे तटबंध के उस पार मिलीं पप्पी देवी हमें देखते ही उखड़ गईं: ''अच्छा लग रहा है ना देखके कि हमलोग कइसे रह रहे हैं. केतना अलीसान इंतजाम बा. सरकार कइसन चउचक बेवस्था कइले बा..." उनके कड़वे शब्दों में व्यंग्य की वजह जाहिर थी. उतरते सितंबर में आई भीषण बाढ़ में बागमती का तटबंध जहां टूटा था, उसके सामने ही उनका पक्का मकान था. एक झटके में उनका संयुक्त परिवार बेघर हो गया.

एक चम्मच तक साथ नहीं ला पाए. देह पर जो कपड़ा था, वही लेकर भागे. पप्पी बताती हैं, "सात रोज से दू-अढ़ाई हाथ का पन्नी टांगकर सात औरत और छोटा-छोटा बच्चा सब सोते हैं. कभी बांध पर गमछा बिछाकर सो जाते हैं. एक रोज जिला परिषद के मेंबर से थोड़ा चूड़ा मिला. परसों हेलिकॉप्टर से भी चूड़ा-चीनी गिराया. उसी से कुछ आहार लिए. दू-दिन तो उठकर चला नहीं जाता था. पोता पानी मांगा तो चुरुआ से बाढ़ का पानी पिलाए. एगो गिलास नहीं बचा था. अब इससे बड़ा अथी (तकलीफ) क्या होता है."

तिलक ताजपुर से 130 किमी दूर दरभंगा के भुभौल गांव में रतीचंद्र शर्मा मिले. 29-30 सितंबर की दरम्यानी रात जब पश्चिमी कोसी तटबंध टूटा तो उनके 18 कमरे के मकान का तीन-चौथाई हिस्सा भी कोसी के वेग में समा गया. बचे दो कमरों के टूटे हिस्से पर खड़े होकर उस रात का आंखों देखा हाल बताते हुए वे कहते हैं, "शाम छह बजे कोसी बांध पर पानी चढ़ गया था. तब परसासन के लोग आए, एक-दू घंटा रहे. कोई भी मिट्टी का साधन नहीं मंगाया, खाली बैठ के देखते रहे. हम लोग कहते-कहते मर गए कि एक टेलर (ट्रेलर) माटी कहीं से लाकर डाल दीजिए, लेकिन कुछ नहीं किए."

वे आगे बताते हैं, "हमारे पास अपना बोरा उपलब्ध था. अपनी तरफ से जन (मजदूर) रखकर के दू सौ बोरा हम खुद बांध पर डलवाए. उससे क्या होता है. बांध नहीं बचा. परसासन कोशिश करता तो बांध टूटने का कोई चांस ही नहीं था. पानी बेहिसाब होने लगा तो आठ बजे के बाद परसासन के लोग खुद यहां से जान बचाकर भग लिए. हम लोगों को छोड़ दिए, जीना हो जियो, मरना हो मरो."

सीतामढ़ी और दरभंगा के ये किस्से बिहार सरकार की बेबसी और लापरवाही की तरफ इशारा करते हैं. तिलक ताजपुर में जहां आपदा के एक हफ्ते बाद भी न रिलीफ कैंप लगा था, न कम्युनिटी किचन. लोग भूखे पेट अमानवीय स्थितियों में जीवन गुजार रहे थे. वहीं दरभंगा के भुभौल में जल संसाधन विभाग के अभियंता आपदा की स्थिति में लोगों को कोसी के सामने छोड़, जान बचाकर निकल लिए थे.

सरकारी अमले की यही बेबसी और कर्तव्यहीनता बिहार की सालाना बाढ़ को और अधिक जानलेवा बना देती है. इस साल भी राज्य के 18 जिलों की 20 लाख से ज्यादा आबादी बाढ़ से प्रभावित है. सरकार इनमें से सिर्फ 1.43 लाख लोगों को सामुदायिक किचन से भोजन करा रही है और सिर्फ पांच राहत शिविर चल रहे हैं, जिनमें 980 बाढ़ पीड़ित शरण लिए हुए हैं. शेष लोग कहां और किस हालत में हैं, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है.

हालात इसलिए भी अजीब लगते हैं क्योंकि राज्य का जल संसाधन विभाग बारिश का मौसम बीतते ही अक्तूबर महीने से तटबंधों को मजबूत बनाने में जुट जाता है. इनकी निगरानी होती है, प्रोजेक्ट बनते हैं, ठेकेदारों को काम बांटा जाता है, अगले साल मई तक काम होता है. तीन चरणों में इसकी निगरानी होती है. जून से क्रलड फाइटिंग के नाम पर अलग से सैंड बैग और क्रेट तैयार किए जाते हैं. बाढ़ नियंत्रण के लिए मुख्यालय में वार रूम बनता है और बाढ़ वाले इलाके में अधिकारियों की नियुक्ति होती है. फिर भी हर साल तटबंध टूटते हैं और विभाग इसे आपदा कहकर हाथ खड़े कर देता है.

तिलक ताजपुर गांव का एक पीड़ित परिवार पॉलिथीन शेड के नीचे. इस शेड में सात महिलाएं और छोटे बच्चे रात गुजारते हैं

इसी तरह हर साल अप्रैल से आपदा प्रबंधन विभाग बाढ़ पूर्व तैयारी करता है. हर बाढ़ प्रभावित जिले में नाव किराए पर लेना, गोताखोरों की नियुक्ति, राहत केंद्र की पहचान, टेंट और राशन का इंतजाम, लोगों को जागरूक करना. कागज पर सब होता है. जून में सभी बाढ़ प्रभावित जिलों के डीएम की बैठक होती है और सभी हाथ उठाकर कहते हैं, तैयारी पूरी है. मगर बाढ़ आने पर कहीं राहत पहुंचाने में तीन दिन लगते हैं तो कहीं हफ्ते भर में भी नहीं पहुंचती.

भुभौल (दरभंगा) में तो 3 अक्तूबर को कम्युनिटी किचन खुला, बाढ़ आने के चौथे दिन. मवेशियों के लिए चारा पहली बार 6 अक्तूबर को बंटा. बांटने वाले एक मवेशीपालक को आठ किलो चारा देकर चलते बने. इसके अलावा भुभौल से कीरतपुर तक सात किमी की लंबाई में तटबंध के दोनों तरफ प्लास्टिक से बनी छत के नीचे रह रहे हजारों पीड़ितों को और खबर लिखे जाने तक कोई राहत नहीं मिली है.

कीरतपुर के पास तटबंध पर चढ़ते ही बाढ़ पीड़ितों की अस्थायी बस्ती शुरू हो जाती है. भीषण गर्मी में काली पॉलिथीन को टांगकर एक-एक झोपड़े में दस-दस लोग अंटे हैं. सिमरी गांव के पास मिले मोहम्मद आलम की बातों में सात दिन बाद भी गुस्सा कायम है.

वे कहते हैं, "जिस रात बांध टूटा, औरतें इसी तटबंध पर गोद में बच्चा लिए बारह घंटे खड़ी रह गईं. बांध पर पानी बह रहा था. तीन दिन तक कोई पूछने न आया: जिंदा हो या मर गए.’’ भुभौल के श्रवण कुमार यादव कहते हैं, ''तीन रोज पहले एक कम्युनिटी किचन खुला है, जो सिर्फ एक टाइम खाना खिलाता है, खाना इतना घटिया कि क्या कहें. एक भी रिलीफ कैंप नहीं खुला. (सीएम) नीतीश कुमार यहां से आठ किमी दूर पुनाच से लौट गए, यहां नहीं आए."

लगभग ऐसे ही इल्जाम सीतामढ़ी के बागमती तटबंध पर शरण लिए मानपुर रत्नावली और मानपुर नयावास के सैकड़ों बाढ़ पीड़ित लगाते हैं. कृष्णा देवी कहती हैं, "कोई सुविधा नहीं. अगल-बगल के गृहस्थ खाना बनाकर देते हैं, तो खा लेते हैं." इन अस्थायी शरणस्थलियों में पॉलीथीन के लिए छीना-झपटी होती है. लोग पंचायत प्रतिनिधियों से इसके लिए पैरवी लगाते हैं. एक परिवार इंतजार करते-करते थक जाता है तो एक रोज 500 रुपए में काली पॉलिथीन खरीद लाता है, ताकि सिर ढक सके.

तिलक ताजपुर में जहां तटबंध टूटा है, वहां की हालत तो और बुरी है. एक बार एयर ड्रॉपिंग से सूखा राशन गिरा है. एक बार जिला परिषद के सदस्य ने राशन बंटवाया है. विनोद कुमार सिंह कहते हैं, "न नेता आए, न प्रशासन. एक हफ्ते बाद भी हम राहत का इंतजार कर रहे हैं."

हालांकि आपदा प्रबंधन के लिए जिम्मेदार रुन्नी सैदपुर (सीतामढ़ी) और कीरतपुर (दरभंगा) प्रखंडों के सर्किल ऑफिसर इन आरोपों का खंडन करते हैं. रुन्नी सैदपुर के सीओ आदर्श गौतम कहते हैं, "आरोप बिल्कुल गलत है. हमने तिलक ताजपुर को प्राथमिकता के आधार पर सहायता दी. मानपुर में हमने सामुदायिक रसोई चलवाई और तुरंत पॉलीथीन शीट उपलब्ध कराई. अभी वहां पर चापाकल और टैंकर की भी व्यवस्था हो गई है. तिलक ताजपुर में हम  लोगों ने सूखा राशन बंटवाया क्योंकि वहां के लोग सामुदायिक किचन तक नहीं आ सकते थे."

बाढ़ पूर्व तैयारियों के बारे में पूछने पर वे कहते हैं, "हमें अंदाजा नहीं था कि ऐसी आपदा आएगी कि एक बार में 33 में से 22 पंचायतें प्रभावित हो जाएंगी."

कीरतपुर के सीओ आशुतोष स्वीकारते हैं कि लोगों की मांग के बाद ही भुभौल उत्तरी में 3 अक्तूबर को पहली बार सामुदायिक किचन खुला. लेकिन वहां तीन दिन तक कोई सरकारी सहायता नहीं पहुंची, इससे वे इनकार करते हैं: "हमने अगले दिन ही पॉलीथीन शीट बांटनी शुरू कर दी थी. कम्युनिटी किचन खुलने में वक्त लगा मगर उससे पहले हमने सूखा राशन बंटवाया था." बच्चों के लिए दूध और महिलाओं के लिए सैनिटरी नैपकीन? इस सवाल पर वे कुछ नहीं कहते.

जिस तरह समय से राहत पहुंचाने में आपदा प्रबंधन विभाग फेल होता है, उसी तरह बाढ़ की आफत को रोकने में जल संसाधन विभाग असफल साबित होता है. इसकी जिंदा कहानी दरभंगा और सीतामढ़ी दोनों जगह मिलती है.

कोसी तटबंध को बचाने की जद्दोजहद

सीतामढ़ी में बागमती तटबंध पर बना रास्ता बिल्कुल पथरीला है. तटबंध के दोनों तरफ झाड़ियां उगी हैं. इसी तटबंध के किनारे रहने वाले मानपुर रत्नावली के ग्रामीण रामप्रवेश कहते हैं, "हमारे यहां रिसाव शुरू हुआ तो हम लोगों ने अपने बोरे में मिट्टी भरकर यहां डाली. तब रिसाव बंद हुआ. प्रशासन के लोग देखने भी नहीं आए. अधिकारियों को फोन किए पर ऊ लोग फोनै नहीं उठाए."

तिलक ताजपुर में जहां तटबंध टूटा है वहां के करीब 100 मीटर के दायरे में 30-35 पक्के मकान बाढ़ की चपेट में आ गए हैं. वहां के ग्रामीण काफी गुस्से में दिखे. मौके पर मौजूद 78 साल के बुजुर्ग सीताराम सिंह बताते हैं, "29 तारीख को दोपहर तीन बजे से ही रिसाव शुरू हो गया था. ठेकेदार के लोग बोरे में मिट्टी भरके यहां डाल रहे थे, मगर रिसाव बंद नहीं हो रहा था. हम लोगों ने कहा, बाहर से मिट्टी डालने से नहीं होगा, अंदर की तरफ से डालिए, तो उन लोगों ने मना कर दिया."

सुरेंद्र सिंह, जिनका मकान बागमती में समा गया, कहते हैं, "जब हम कुदाली लेकर अंदर की तरफ से मिट्टी डालने की कोशिश किए तो अधिकारी लोग भड़क गए, बोले तुम पर मुकदमा हो जाएगा. खैर, उनका क्या गया, बांध टूट ही गया, जिंदगी तो हम लोगों की तबाह हो गई. जीवन भर की कमाई लगाकर घर बनाए थे."

एक अन्य ग्रामीण मनोज कुमार सिंह कहते हैं, "बांध को बचाने की इनकी मंशा ही नहीं. सबसे जरूरी काम था तटबंध के दोनों तरफ झाड़ियों को साफ करना. तभी तो समझ आएगा कि तटबंध पर किस तरफ कहां छेद या गड्ढा हो रहा है. फिर वहां सैंड बैग रखकर उसे बंद किया जाएगा. मगर पूरे साल निरीक्षण नहीं होता. आखिरी में बोरा भर-भर कर जहां-तहां डाल दिया जाता है."

सीताराम सिंह और दीपक कुमार कहते हैं, "दरअसल, बागमती तटबंध अधिकारियों और ठेकेदारों की कमाई का जरिया बन गया है. तटबंध टूटने पर सब आते हैं क्योंकि तब कमाने का अच्छा मौका मिलता है. नुनौरा से जंवार तक हर दूसरे साल तटबंध टूटता है."

इस तटबंध पर भेजा से भुभौल तक कोसी की धारा तटबंध से बिल्कुल सटकर बह रही है. तटबंध टूटने के हफ्ते भर बाद भी यह धारा तटबंध से तीन-चार फुट ही नीचे थी. लोगों का कहना था कि तटबंध की ऊंचाई कम होने और नदी में गाद भर जाने से अब स्थिति ऐसी हो गई है कि नदी हर साल इसी तरह तटबंध को पार कर जाएगी. इसका स्थायी समाधान होना चाहिए.

सिरसिया गांव के नंद कुमार पांडेय कहते हैं, "जब तटबंध पर पक्की सड़क बनाई जा रही थी, तभी इसकी ऊंचाई बढ़ाई जानी थी. मगर ठेकेदार ने इस पर मिट्टी नहीं डाली. इसी वजह से ऐसी स्थिति बन रही है."

जल संसाधन विभाग के रिकॉर्ड के मुताबिक, इस साल कीरतपुर के पास छह किमी के दायरे में चार जगहों पर तटबंध और स्पर या तटबंध की तरफ पानी की तेज धार को कम करने के लिए ठोकर बनाने का काम होना था. मगर ग्रामीण कहते हैं, एकाध जगह मिट्टी का बोरा डालने के सिवा कोई काम नहीं हुआ. इस मसले पर पश्चिमी कोसी तटबंध के प्रभारी कार्यपालक अभियंता राकेश कुमार से बात करने के लिए उन्हें कई बार फोन किया गया मगर उनका फोन स्विच्ड ऑफ मिला.

बागमती प्रमंडल के कार्यकारी अभियंता बिपिन कुमार सीतामढ़ी में हुई अनियमितता के आरोपों से इनकार करते हैं. वे कहते हैं, "तैयारी तो हम लोग पूरे साल करते हैं. मगर असली वजह तटबंध के बीच कटौंझा में बना पुल है, जहां से पानी को गुजरने के लिए सिर्फ 200 मीटर का रास्ता मिलता है. वहां पानी का दबाव बढ़ जाता है, इसलिए उधर अक्सर तटबंध टूट जाता है. 2004 से यह अब तक चार बार टूट चुका है. जहां तक जंगलों की सफाई का सवाल है, जून से ही उसकी सफाई शुरू हो जाती है, मगर फिर झाड़ियां उग जाती हैं. इस साल जब रिसाव शुरू हुआ तब हम लोगों ने तटबंध पर जगह-जगह वेल बनाकर और जिओ बैग लगाकर उसे बचाने का प्रयास किया. मगर पानी अधिक था और कटौंझा ब्रिज के कारण प्रेशर भी ज्यादा था. इसलिए तिलक ताजपुर के पास यह टूट गया."

बिहार में लगभग हर साल कहीं न कहीं तटबंध टूटता है. हालांकि बिहार में किस साल कितने तटबंध टूटे, इसका कोई व्यवस्थित आंकड़ा सरकार सार्वजनिक नहीं करती. यह सूचना है कि 1987 से लेकर 2014 के बीच बिहार की नदियों पर बने तटबंध 378 बार टूट चुके हैं. इस साल आठ जगह तटबंध टूटे. इसके बावजूद सरकार मानती है कि बिहार में बाढ़ को बराज और तटबंधों से ही नियंत्रित किया जा सकता है. राज्य में अब तक बारह प्रमुख नदियों पर 3,731 किमी लंबे तटबंध का निर्माण हो चुका है.

मगर बाढ़ का कहर बढ़ता ही जा रहा है. इसे इस आंकड़े से समझा जा सकता है कि 1954 में जब राज्य में तटबंधों की कुल लंबाई सिर्फ 160 किमी थी, राज्य की 25 लाख हेक्टेयर जमीन ही बाढ़ प्रभावित थी. अब राज्य में बाढ़ प्रभावित जमीन 72.95 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गई है. यानी तटबंध बढ़ते गए और बाढ़ का दायरा भी बढ़ता गया.

यह बात अब नदियों के किनारे बसे लोग भी समझ गए हैं. तिलक ताजपुर के विनोद कुमार सिंह कहते हैं, "सरकार से हम यही निवेदन करेंगे कि या तो तटबंध को फोरलेन सड़क में बदल दें या इसे हटा ही दें. जब तटबंध नहीं बना था, तब बाढ़ आती थी तो पानी फैल जाता था. उपज भी अच्छी होती थी और लोग भी सुरक्षित रहते थे. अब जिधर बांध टूटता है, उधर तबाही मच जाती है."

इस आपदा के बीच 28-29 सितंबर को राजधानी पटना में आयोजित बिहार नदी संवाद की घोषणाओं में भी इन सवालों की गूंज सुनाई दी. मेधा पाटकर, प्रफुल्ल सामंत्रा, अनिल प्रकाश, महेंद्र यादव और राहुल यादुका जैसे नदियों पर काम करने वाले लोगों ने कहा, "नदियों पर बनी तटबंध जैसी जलसंरचनाओं का मूल्यांकन हो, नए तटबंध न बनें और पुराने तटबंधों को वापस लेने पर विचार हो. फरक्का बराज को निरस्त करने पर विचार हो. बिहार सरकार जिन नए सात बराजों को बनाने की तैयारी में है, उसे तत्काल वापस ले."

मगर बिहार सरकार बाढ़ की समस्या से निजात पाने के लिए तटबंध, बराज और नदी जोड़ो परियोजनाओं के ही भरोसे है. 2024-25 के केंद्रीय बजट में भी बिहार को बाढ़ से निबटने के लिए जो 11,500 करोड़ रुपए की राशि मिली है, उसका ज्यादातर हिस्सा कोसी-मेची रिवर लिंकिंग प्रोजेक्ट और सात नए बराजों के निर्माण पर खर्च होना है. इसका राज्य के सामाजिक कार्यकर्ता लगातार विरोध कर रहे हैं.

हर साल टूटते तटबंध फिर भी तैयारियां एक रस्म की तरह जारी

हर साल आपदा प्रबंधन विभाग अप्रैल में बाढ़ पूर्व तैयारियों को लेकर एक पत्र सभी जिलाधिकारियों के नाम जारी करता है. इस साल यह पत्र 20 मार्च, 2024 को जारी हुआ. पत्र में बाढ़ पूर्व तैयारियों को लेकर 26 तरह के निर्देश थे, जिन्हें 31 मई, 2024 तक पूरा कर लेना था. इनके प्रमुख निर्देश:

संभावित बाढ़ प्रभावित क्षेत्र और संकटग्रस्त लोगों की पहचान: किन इलाकों में बाढ़ आ सकती है, इसकी पहचान और वहां के निराश्रित, बीमार, दिव्यांग, गर्भवती महिलाओं, बच्चों आदि की सूची तैयार करना, ताकि आपदा की स्थिति में उन्हें सबसे पहले बचाया जा सके.

नाव और गोताखोर: इलाके की सभी नावों, मोटरबोटों की सूची बनाकर उन्हें आकस्मिक स्थिति के लिए तैयार करना. लाइफ जैकेट आदि की व्यवस्था करना. स्थानीय स्तर पर गोताखोरों को प्रशिक्षित कर उन्हें बाढ़ अवधि के लिए तैयार रखना. इनके साथ होमगार्ड और दूसरे कर्मियों को मिलाकर बचाव और राहत दल तैयार करना.

राहत सामग्री: बाढ़ से पहले स्थानीय बाजार में राहत सामग्री जैसे पॉलीथीन शीट, चना, चूड़ा, गुड़, सत्तू और नमक उपलब्ध कराने वाले आपूर्तिकर्ताओं को फाइनल कर लेना ताकि वे आपदा की स्थिति में तत्काल सामान उपलब्ध कराएं.

बाढ़ राहत कैंप: बाढ़ आई तो राहत शिविर किस जगह बनेगा यह तय कर लेना. अमूमन यह स्कूल, पंचायत भवन या किसी ऊंची जगह पर हो सकता है. वहां शौचालय और बिजली की व्यवस्था देखना. वहां भोजन, मेडिकल कैंप, महिलाओं के लिए सैनिटरी सुविधा, प्रसव की व्यवस्था, बच्चों के लिए विशेष भोजन और टीकाकरण की भी व्यवस्था करनी है. जानवरों के लिए चारा और पीने का साफ पानी भी उपलब्ध रखना है.

सामुदायिक रसोई: तटबंध या हाइवे पर शरण लेने वाले बाढ़ पीड़ितों को खाना खिलाने के लिए सामुदायिक रसोई कहां खुलेगी, यह तय करना.

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