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जम्मू-कश्मीर चुनाव में गर्त में क्यों चले गए निर्दलीय उम्मीदवार?

कुल 873 उम्मीदवारों में से 40 फीसद निर्दलीय हैं, फिर भी पूर्व मुख्यमंत्रियों महबूबा मुफ्ती और उमर अब्दुल्ला समेत कई लोग उन पर मुस्लिम बहुल घाटी में वोट काटने की गरज से चुनाव लड़ने का आरोप लगाते दिखे

20 सितंबर को सोपोर में चुनाव प्रचार करते इंजीनियर रशीद
20 सितंबर को सोपोर में चुनाव प्रचार करते इंजीनियर रशीद
अपडेटेड 15 अक्टूबर , 2024

शरद ऋतु के आगमन के साथ कश्मीर में धूप ज्यों-ज्यों मद्धिम होती जा रही है, जम्मू-कश्मीर विधानसभा की 90 सीटों के लिए चुनाव लड़ रहे 365 निर्दलीय उम्मीदवारों की किस्मत भी धुंधली पड़ती जा रही है.

बीते दो दशकों में यह पहली बार नहीं है जब इतने ज्यादा निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरे हैं. अमरनाथ श्राइन बोर्ड को जमीन देने पर विवाद के फौरन बाद 2008 में हुए चुनाव में भी 468 उम्मीदवार खड़े हुए थे, और 2014 के चुनाव में 274 उम्मीदवार थे.

इस बार 346 उम्मीदवारों में से 34 को लंगेट से दो बार विधायक रह चुके शेख अब्दुल 'इंजीनियर' रशीद की अगुआई वाले राजनैतिक धड़े अवामी इत्तेहाद पार्टी (एआइपी) ने नामजद किया है. एआइपी ने जमात-ए-इस्लामी जम्मू-कश्मीर के साथ गठबंधन किया है, जिसने 2019 से लगी पाबंदी के बावजूद 10 निर्वाचन क्षेत्रों से छद्म उम्मीदवार उतारे हैं.

हालांकि कुल 873 उम्मीदवारों में से 40 फीसद निर्दलीय हैं, फिर भी पूर्व मुख्यमंत्रियों महबूबा मुफ्ती और उमर अब्दुल्ला समेत कई लोग उन पर मुस्लिम बहुल घाटी में वोट काटने की गरज से चुनाव लड़ने का आरोप लगा रहे हैं. ऐसे में वोट मांगने के लिए प्रचार करते वक्त इंजीनियर रशीद और कई निर्दलीयों को भाजपा की बी टीम होने के आरोपों का जवाब देना पड़ रहा है. इस संदेह को बल इस बात से मिला कि भगवा खेमे ने घाटी की 47 सीटों में से महज 19 पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं और इसकी जगह हिंदू बहुल जम्मू पर पूरा ध्यान लगाया है.

भाजपा को उम्मीद है कि जब सरकार बनाने की बारी आएगी, संख्याबल जुटाने के लिए वह इन निर्दलीयों को अपने साथ ला सकती है. यह बात छनकर लोगों के दिलो-दिमाग तक भी पहुंच गई लगती है. शायद इसीलिए निर्दलीयों की रैलियों में भीड़ उम्मीद से कम होती गई है. कुलगाम के देवसर निर्वाचन क्षेत्र की एक रैली में बहुत ही कम लोग दिखाई दिए, जहां इंजीनियर रशीद की पार्टी के निर्दलीय उम्मीदवार को महज दर्जन भर लोग घेरे खड़े थे.

दंश महसूस होते ही 58 वर्षीय इंजीनियर रशीद अब आरोप का रुख पलटने की कोशिश कर रहे हैं. वे कहते हैं, "मेरे पास अकाट्य सबूत हैं कि उत्तरी कश्मीर और दूसरी जगहों पर इंजीनियर रशीद को हराने के लिए उमर अब्दुल्ला और सज्जाद लोन गिरोह बंद हो गए हैं. क्या अब उमर अब्दुल्ला हमें बता सकते हैं कि भाजपा की बी टीम कौन है?"

मगर निर्दलीय जहां भाजपा की परछाईं से पिंड छुड़ाने के लिए जूझ रहे हैं, वे जमे-जमाए खिलाड़ियों की मुश्किलें भी बढ़ा रहे हैं. मसलन, कुलगाम में जमात समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार सय्यार ऋषि नेशनल कॉन्फ्रेंस-कांग्रेस गठबंधन की तरफ से चुनाव लड़ रहे कम्युनिस्ट उम्मीदवार मोहम्मद यूसुफ तारिगामी के खिलाफ खड़े हैं. तारिगामी यह सीट 1996 से जीतते आ रहे हैं. कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार तारिगामी के मन में कोई शक नहीं कि इन छद्म उम्मीदवारों को भाजपा ने सरकार बनाने की गरज से 46 सीटों के निशान तक पहुंचने के लिए मैदान में उतारा है. वे कहते हैं, "अभी भी भाजपा को पता है कि यहां उसे कोई सीट नहीं मिलेगी. इस वक्त इंजीनियर रशीद को रिहा करने और निर्दलीय उम्मीदवारों और जमात को उनके समर्थन का मकसद वोट काटना है."

इस बीच इंजीनियर रशीद को भले प्रचार के लिए छोड़ दिया गया है, 38 वर्षीय सरजन अहमद वागे अब भी जेल में हैं, वे बीरवाह और गांदरबल से चुनाव लड़ रहे हैं, जहां से उमर अब्दुल्ला भी मैदान में हैं. वागे का प्रचार अभियान उनकी 16 वर्षीया बेटी सुगरा बरकती चला रही हैं. वे गांव-गांव जाकर अपने माता-पिता का दुखड़ा रो रही हैं और उनके कसीदे गा रही हैं, और बदले में हमदर्दी और टॉफियां बटोर रही हैं. इससे बडगाम पंचायत की जिला विकास परिषद के अध्यक्ष नजीर खान दहशतजदा हो उठे, जिनके वालिद विधानसभा में बीरवाह की नुमाइंदगी करते थे. इंजीनियर रशीद समर्थित नजीर सुगरा को निशाना बनाते हुए वे सवाल कर रहे हैं कि "छोटी-सी लड़की अजनबी मर्दों के साथ कैसे घूम सकती है?"

निर्दलीयों का तीसरा धड़ा सियासी दिग्गजों का है, जिन्होंने अपनी-अपनी पार्टियों को छोड़ दिया है. इनमें बारामूला से चुनाव लड़ रहे पीडीपी के पूर्व सरपरस्त और उप-मुख्यमंत्री मुजफ्फर हुसैन बेग, उड़ी से कांग्रेस के पूर्व मंत्री ताज मोहिउद्दीन, जम्मू-कश्मीर अपनी पार्टी के विधायक-द्वय उस्मान मजीद बांदीपोरा से और  नूर मोहम्मद शेख शाल्टेंग से, और जादीबल से श्रीनगर नगर पालिका के पूर्व मेयर जुनैद अजीम मट्टू शामिल हैं.

अनुच्छेद 370 के खात्मे ने जम्मू-कश्मीर की जमीन पर एक नई सियासी हकीकत उकेर दी है. ऐसे में इनमें से कई खंडित जनादेश की संभावना को देखते हुए अपने को प्रासंगिक बनाए रखने की खातिर स्वतंत्र रास्ता तलाश रहे हैं. राजनैतिक विश्लेषक नूर अहमद बाबा कहते हैं, "भविष्य डांवांडोल देखकर कुछ विधायकों सहित कई लोग अब विधानसभा चुनाव में निर्दलीय उतरे हैं." मगर जरूरी नहीं कि उनकी उम्मीदें फलीभूत हों. 2014 के चुनाव में उतरे ऐसे 274 उम्मीदवारों में से महज तीन जीते थे और 267 की जमानत जब्त हो गई थी. 

मोअज्जम मोहम्मद

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