मुकाबला तो बराबरी का ही था, लेकिन उस समय केंद्रीय मंत्री और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता गजेंद्र सिंह शेखावत के लिए स्थितियां थोड़ी जटिल हो गई थीं. वे अपने गृहनगर जोधपुर के प्रतिद्वंद्वी, राजनैतिक दांव-पेच में माहिर और पिछले दिसंबर तक राजस्थान के मुख्यमंत्री रहे अशोक गहलोत के साथ एक राजनैतिक और कानूनी विवाद में उलझ गए. शेखावत ने पिछले हफ्ते बयान दिया, "गहलोत के राजनैतिक प्रतिद्वंद्वियों में से मैं अकेला हूं जो उनके खतरनाक हमलों के बावजूद अपना राजनैतिक करियर बचा पाया." उनके शब्द इस बात के संकेत थे कि हालात अब बदल रहे हैं. 25 सितंबर को हुई दो अलग-अलग घटनाओं ने जहां शेखावत को एक बढ़त दी है तो गहलोत के लिए मुश्किलें खड़ी की हैं.
इस झगड़े की शुरुआत 2020 में हुई, जब कुछ लीक हुई फोन रिकॉर्डिंग के साथ गहलोत ने शेखावत और अपनी ही पार्टी के सहयोगी सचिन पायलट दोनों पर, उनकी सरकार को गिराने की साजिश रचने का आरोप लगाया था. इसके बाद पायलट से उप-मुख्यमंत्री और राज्य कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी छीन ली गई और लीक हुई रिकॉर्डिंग गहन जांच का विषय बन गई. राजद्रोह का मुकदमा दर्ज हुआ और शेखावत को नामित आरोपी बनाया गया. राजस्थान पुलिस के स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप (एसओजी) को शुरुआत में जांच की जिम्मेदारी सौंपी गई. बाद में इसे भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो को सौंप दिया गया था.
मामला उस वक्त और उलझ गया जब गहलोत सरकार में संसदीय कार्य मंत्री शांति धारीवाल ने भूलवश विधानसभा में यह स्वीकार कर लिया कि उस फोन टैपिंग की रिकॉर्डिंग मुख्यमंत्री के विशेष कार्य अधिकारी (ओएसडी) लोकेश शर्मा ने मीडिया को भेजी थी. शेखावत ने मंत्री की इस स्वीकारोक्ति का लाभ उठाया और मार्च 2021 में शर्मा के खिलाफ दिल्ली पुलिस में अवैध फोन टैपिंग के लिए प्राथमिकी दर्ज करवाई.
कहानी में एक और नाटकीय मोड़ आया जब 2023 विधानसभा चुनाव में टिकट नहीं मिलने से नाराज शर्मा एक व्हिसलब्लोअर (भ्रष्टाचार के मामले उजागर करने वाले) बन गए. मीडिया को जारी की गई विज्ञप्तियों में उन्होंने कई आरोप लगाए और 25 सितंबर को दिल्ली पुलिस को लिखित में इसके विवरण सौंपे. शर्मा ने इंडिया टुडे से बात करते हुए दोहराया कि गहलोत ने उन्हें एक पेन ड्राइव देकर कहा था कि इसकी सामग्री को मीडिया में फैलाने के बाद इसे नष्ट कर देना. उस पेन ड्राइव में कुछ ऑडियो रिकॉर्डिंग थीं. शर्मा ने यह भी कहा, "जब भी दिल्ली पुलिस कहेगी, मैं सारे सबूत उसके हवाले कर दूंगा."
लेकिन फोन टैपिंग की यह कहानी राजनीति के बड़े रंगमंच का सिर्फ एक नाटक भर है. शेखावत 2018 के संजीवनी क्रेडिट कोऑपरेटिव सोसाइटी मामले में भी उलझे हुए हैं. कथित तौर पर इस संजीवनी योजना के माध्यम से हजारों निवेशकों को ठगा गया था. हालांकि शेखावत और उनके रिश्तेदार इस कोऑपरेटिव सोसाइटी के पूर्व निदेशक थे, लेकिन आरोपपत्र में उन्हें कभी भी आरोपी के रूप में नामित नहीं किया गया था. एसओजी ने इस साल 25 सितंबर को राजस्थान हाइ कोर्ट को बताया कि उनके निदेशक रहने के दौरान किसी तरह के गलत काम के कोई सबूत नहीं थे, जिसके बाद अदालत ने आदेश दिया कि बिना ट्रायल कोर्ट की अनुमति के केंद्रीय मंत्री के खिलाफ आगे कोई जांच नहीं होगी.
इससे शेखावत को मानहानि के उस मुकदमे में बढ़त मिल गई है, जो उन्होंने गहलोत की ओर से मीडिया के सामने अपनी दिवंगत मां को आरोपी बताने के लिए दायर किया था. वहीं गहलोत भी इस बात पर अड़े हुए हैं कि शेखावत को क्लीन चिट नहीं मिली है. फोन टैपिंग मामले में अपने पूर्व ओएसडी के आरोपों पर उन्होंने कोई टिप्पणी नहीं की. उनका तर्क है, "सरकार बदलने के कारण एसओजी ने यह यू-टर्न ले लिया है."
राजनैतिक प्रतिद्वंद्विता का नया अध्याय शुरू हो गया है जो दिखाता है कि राजस्थान के सियासी रेगिस्तान की उड़ती रेत में जो आज विजेता था वह कल कैसे धूल धूसरित हो सकता है. तो क्या कहानी में कोई और मोड़ आने वाला है?
कैसे बदले हालात
> अशोक गहलोत पर 2020 में राजनैतिक प्रतिद्वंद्वियों के फोन की अवैध टैपिंग कराने के आरोप हैं. इनमें केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत भी शामिल हैं.
> अपने पूर्व ओएसडी और आरोपी लोकेश शर्मा के व्हिसलब्लोअर बन जाने से 2021 में दिल्ली पुलिस की ओर से दर्ज मामले में पूर्व मुख्यमंत्री को कानूनी नतीजों का सामना करना पड़ सकता है.
> इसी बीच, संजीवनी सहकारी समिति मामले की जांच कर रहे राज्य पुलिस के एक प्रकोष्ठ ने राजस्थान हाइ कोर्ट को बताया कि उसके पास शेखावत के खिलाफ कोई सबूत नहीं है.
> हाइ कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की अनुमति के बिना आगे कोई और जांच न करने का आदेश दिया है; इससे गहलोत के खिलाफ मानहानि के मामले में शेखावत को मजबूती मिली है.

