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नेपाल की भयावह बारिश ने बिहार का कितना किया नुकसान?

राहत की बात यही है कि नेपाल में बारिश बंद हो गई है और कोसी और गंडक में जलप्रवाह फिर से सामान्य हो गया है. इससे आपदा खुद नियंत्रित होने लगी है

कोसी के तटबंध के बीच बसे एक गांव में फंसे बाढ़ पीड़ित लोग
कोसी के तटबंध के बीच बसे एक गांव में फंसे बाढ़ पीड़ित लोग
अपडेटेड 15 अक्टूबर , 2024

सत्ताइस सितंबर (शुक्रवार) की शाम अचानक एक मैसेज सोशल मीडिया पर चमका कि नेपाल में भारी बारिश हो रही है. अगले चौबीस घंटे में कोसी बराज और गंडक बराज पर पानी का बहाव काफी तेज होने वाला है. डिस्चार्ज एक दिन में छह से सात लाख क्यूसेक तक जा सकता है. रात 9.30 बजे बिहार सरकार के जल संसाधन विभाग ने भी इस खबर की पुष्टि कर दी कि नेपाल में हुई तेज बारिश की वजह से 28 सितंबर को रात 12 बजे गंडक बराज का डिस्चार्ज छह लाख क्यूसेक और कोसी बराज का डिस्चार्ज 6.81 लाख क्यूसेक तक जाने की संभावना है. अक्टूबर

इन दोनों बराजों से होने वाला पानी का यह अनुमानित डिस्चार्ज असामान्य और डराने वाला था क्योंकि पिछले 56 वर्ष में कोसी बराज का डिस्चार्ज कभी इस स्तर पर नहीं गया था. इससे पहले 5 अक्टूबर, 1968 को कोसी बराज का डिस्चार्ज 7.88 लाख क्यूसेक गया था. गंडक बराज का डिस्चार्ज जरूर 31 जुलाई, 2003 को 6.39 लाख क्यूसेक तक गया था. मगर उस बात को भी 21 साल बीत चुके थे. जब यह सूचना जारी हुई तो कोसी बराज से डिस्चार्ज सिर्फ 1.18 लाख क्यूसेक ही था, यानी अगले कुछ घंटों में यह डिस्चार्ज लगभग छह गुना बढ़ने वाला था.

पिछले कुछ दशकों में दोनों बराज के आसपास और नदियों के बेड में गाद की मात्रा काफी बढ़ गई. इसके अलावा बराज भी काफी पुराना हो गया है. और ऐसा लगने लगा कि बराज और नदी पानी का इतना बहाव झेल भी पाएंगे या नहीं.

इन परिस्थितियों में बिहार के जल संसाधन महकमे ने अपने अभियंताओं की छुट्टी कैंसल कर उन्हें तटबंधों की सुरक्षा के लिए भेज दिया. आपदा प्रबंधन विभाग ने तटबंधों के बीच रहने वाले लोगों को ऊंचे स्थान पर जाने का मशविरा जारी कर दिया.

सरकार के इन दोनों महकमों ने यह दावा करना शुरू कर दिया कि उनकी तैयारी पुख्ता है. मगर कोसी में भरी गाद ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया. 27 की रात से ही पानी का बढ़ना शुरू हो गया था. 28 की शाम तक जब कोसी बराज का डिस्चार्ज 5.57 लाख क्यूसेक पर पहुंच गया तो बराज के एक क्षतिग्रस्त दरवाजे से टकरा-टकरा कर पानी बराज पर फैलने लगा. बराज से आवागमन रोक दिया गया. रात होते-होते बराज पर कोसी का पानी बह रहा था. 29 सितंबर की सुबह पांच बजे कोसी बराज से जल बहाव 6.61 लाख क्यूसेक को पार कर गया.

कोसी तटबंध के बीच बसे 300 से ज्यादा गांव डूबने लगे. लोगों ने इलाका खाली कर दिया. इस आपदा की इंतिहा उस वक्त हुई जब कोसी का यह भयावह पानी 30 सितंबर की रात दरभंगा जिले के कीरतपुर प्रखंड के भुभोल गांव के पास पश्चिमी कोसी तटबंध के ऊपर से बहने लगा और रात दो बजे तटबंध टूट गया.

2008 की भीषण आपदा के बाद पहली बार कोसी तटबंध टूटा था और इसने दरभंगा जिले के कोसी और कमला नदी के बीच बसे दो प्रखंडों के दो दर्जन से ज्यादा गांवों को जलमग्न कर दिया. रविवार रात को ही इस आपदा के बाद बेघर हुए हजारों परिवार तटबंध और आसपास के दूसरे स्थानों पर शरण लिए हुए हैं. कोसी नवनिर्माण मंच से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता महेंद्र यादव कहते हैं, "जल संसाधन विभाग के अभियंताओं ने तटबंध को बचाने में पूरी मुस्तैदी नहीं दिखाई. रेस्क्यू के नाम पर भी दिखावा हुआ, दो-तीन बोट चलती रहीं. 35 घंटे बाद भी अंदरूनी गांवों में लोग फंसे थे. नावें भी पर्याप्त नहीं थीं. कीरतपुर से भुभोल के रास्ते में मंगलवार, 1 अक्टूबर की दोपहर तक कम्युनिटी किचेन नहीं खुला था. हैरत की बात है कि सरकार हर साल आने वाली बाढ़ के मद्देनदर अप्रैल महीने से ही तैयारी करती है, मगर वह तैयारी भी जमीन पर नहीं दिखी."

यह आपदा सिर्फ दरभंगा में ही नहीं आई है. चूंकि नेपाल के 77 में से 56 जिलों में शुक्रवार से ही भारी बारिश शुरू हो गई थी जो रविवार तक चलती रही, इसलिए नेपाल से भारत और खास कर बिहार के इलाके में आने वाली सभी नदियों में अचानक ढेर सारा पानी आ गया.

इंडिया टुडे को नेपाल का हाल बताते हुए वहां के वरिष्ठ पत्रकार चंद्रकिशोर कहते हैं, "काफी दिनों के बाद ऐसा हुआ कि नेपाल में एक साथ पूरब से पश्चिम तक हर तरफ जबरदस्त बारिश हुई. मौसम विभाग बताता है कि हमारे यहां 54 साल बाद इतनी ज्यादा बारिश हुई है. काठमांडो घाटी में तो बादल फटने की घटना हुई और पहाड़ी शहर काठमांडो में सड़कों पर चार फुट पानी जमा हो गया. इसी तरह कोसी नदी के पहाड़ी इलाकों में भी बादल फटने की घटना हुई और कोसी और सहायक नदियां भी पानी से लबालब हो गईं. पिछले कुछेक वर्षों में हमारे यहां छोटी-छोटी नदियां सूखने लगी थीं और उन पर अतिक्रमण किया जाने लगा था. वे सभी नदियां इस भारी बारिश में फिर से जिंदा हो गईं."

इस बारिश ने नेपाल को बुरी तरह तबाह कर दिया है. दो सौ से ज्यादा लोग मारे गए. जगह-जगह सड़कें टूट गईं. लैंड स्लाइड भी शुरू हो गई. इस समय नेपाल में राष्ट्रीय आपदा की स्थिति है. 

जाहिर है, नेपाल की इस भारी बारिश का असर वहां से भारत आने वाली अस्सी से ज्यादा सभी छोटी-बड़ी नदियों पर पड़ना था. उत्तर बिहार में अलग-अलग नदियों पर बने सात तटबंध टूट गए. सबसे ज्यादा चार तटबंध सीतामढ़ी जिले में टूटे. काठमांडो शहर के पास से होकर बहने वाली नदी बागमती में भी काफी मात्रा में पानी आएगा, इसका आकलन बिहार का जलसंसाधन महकमा नहीं कर पाया था. मगर जब काठमांडो में बादल फटा और मजबूरन नेपाल को कुलेखानी डैम का फाटक खोलना पड़ा तो वह पानी बिहार में भी आया और सीतामढ़ी जिले में बागमती के किनारे बने तटबंधों को चार जगहों पर तोड़कर दर्जनों गांवों में बाढ़ का पानी घुस गया. इसके अलावा शिवहर जिले में भी बागमती पर बना तटबंध एक जगह टूट गया.

सीतामढ़ी के सामाजिक कार्यकर्ता नागेंद्र सिंह कहते हैं, "बागमती पर तटबंध बने 50 साल से ज्यादा हो गया है, मगर इसकी मरम्मत के काम में सिर्फ दिखावा किया जाता है. इस बार भी विभाग ने कोई तैयारी नहीं की. जब नेपाल से पानी आना शुरू हुआ तो बागमती तटबंध पर दर्जनों जगह रिसाव हो रहा था. गांव के लोग फोन करते रह गए, मगर जल संसाधन विभाग के अधिकारियों ने कोई नोटिस नहीं लिया. आखिरकार पांच जगह तटबंध टूट गया. सीतामढ़ी और शिवहर जिले के साठ से ज्यादा गांव प्रभावित हैं. सात लोगों के डूबकर मरने की खबर है. यह आपराधिक कृत्य है. इसके खिलाफ हमारे जिले के सामाजिक कार्यकर्ता जल संसाधन विभाग के आला अधिकारियों और अभियंताओं पर आपराधिक मुदकमा दर्ज करने जा रहे हैं."

गंडक नदी में भारी पानी आने की चेतावनी थी ही, 28 सितंबर को गंडक बराज पर डिस्चार्ज 4.49 लाख क्यूसेक चला गया. इसकी वजह से बगहा के पास गंडक तटबंध टूट गया और कई गांव जलमग्न हो गए. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, इस वक्त बिहार के 16 जिलों की 269 पंचायतों की 9.90 लाख आबादी बाढ़ से प्रभावित है. इन 16 जिलों में नेपाल की सीमा पर पश्चिम से पूरब तक बसे सभी जिले यथा पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, सीतामढ़ी, शिवहर, मधुबनी, सुपौल, अररिया और किशनगंज हैं. इसके अलावा दरभंगा, सहरसा, पूर्णिया, सारण, सीवान, गोपालगंज, मधेपुरा और मुजफ्फरपुर जिले के कई इलाकों में भी बाढ़ आई हुई है.

इन सूचनाओं के बाद 30 सितंबर को आपदा प्रबंधन विभाग के अपर मुख्य सचिव प्रत्यय अमृत और 1 अक्टूबर को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बाढ़ प्रभावित इलाकों का हवाई सर्वे किया. इसके बाद हेलिकॉप्टर से राहत सामग्री की एयर ड्रॉपिंग भी शुरू की गई. सरकार का दावा है कि वह बचाव कार्य में भी मुस्तैद रही और अब राहत कार्य भी अच्छे तरीके से चला रही है.

आपदा प्रबंधन विभाग के मुताबिक, लोगों को बाढ़ प्रभावित इलाके से बाहर निकालने के लिए 800 नावों का परिचालन किया जा रहा है. प्रभावित जिलों में 71 राहत शिविरों का संचालन हो रहा है, जिसमें 54,700 पीड़ित शरण लिए हुए हैं. 127 सामुदायिक रसोई केंद्रों में 49,400 लोगों को भोजन कराया जा रहा है. हालांकि जमीन पर काम कर रहे लोग इन आंकड़ों को बढ़ा-चढ़ा कर बताया जा रहा कहते हैं. पर अगर इन आंकड़ों को भी सच मान लिया जाए तो 9.90 लाख पीड़ितों में से सरकार अभी तक सिर्फ 54,700 लोगों को रहने की जगह और एक लाख से कुछ ज्यादा लोगों को भोजन उपलब्ध करा पा रही है. शेष आठ लाख से अधिक बाढ़ प्रभावित इस भीषण बाढ़ में असहाय हैं.

हैरत की बात है कि सरकार तटबंध पर शरण लिए बाढ़ पीड़ितों को रहने के लिए पॉलिथीन शीट उपलब्ध करा रही है. वह उन्हें टेंट तक की सुविधा नहीं दे पा रही. इन पॉलिथीन शीटों के लिए भी पीड़ित इलाकों में मारा-मारी मची है. राहत की बात यही है कि नेपाल में बारिश बंद हो गई है और कोसी और गंडक में जलप्रवाह फिर से सामान्य हो गया है. इससे आपदा खुद नियंत्रित होने लगी है. उम्मीद है, सरकार आपदा प्रबंधन और बाढ़ नियंत्रण के उपायों के बारे में गंभीरता से विचार करेगी.

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