
हर साल अगस्त में पश्चिम बंगाल में धूम मचाने वाली 'पूजा की भावना' इस बार जोर नहीं पकड़ रही. दीपावली तक बनी रहने वाली दुर्गा पूजा अक्तूबर में चार दिवसीय उत्सव तक अपने शिखर पर रहती आई है. सामाजिक मनोदशा का असर कारोबार पर भी पड़ता ही है.
पिछले साल राज्य की पूजा से जुड़ी अर्थव्यवस्था 50,000 करोड़ रुपए तक पहुंच गई थी. इसमें कपड़े, जूते, घरेलू उपकरण, साज-सज्जा, गैजेट, पर्चे-पोस्टर जैसे खुदरा व्यापार वगैरह का 33,000 करोड़ रुपए का योगदान था. इन आंकड़ों को देखकर खरीदारी के जिस जोश का पता चलता है, उसकी जगह अब उदासीनता ने ले ली है.
इस उदासीनता का सबब वह गमगीन माहौल है जो 9 अगस्त को आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में प्रशिक्षु डॉक्टर के साथ बलात्कार और उसकी हत्या के बाद लंबे समय से चल रहे विरोध प्रदर्शनों के कारण राज्य में फैल गया है. इसी माहौल में 9 सितंबर को एक टेलीविजन कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने प्रदर्शनकारियों से 'उत्सवधर्मिता पर लौटने' का आग्रह किया, जिसने आक्रोश की एक लहर को जन्म दिया.
वैसे स्वत:स्फूर्त विरोध प्रदर्शनों के केंद्र कोलकाता में उदासीनता और चिंता का माहौल सबसे ज्यादा नजर आता है. शहर के तीन बड़े शॉपिंग क्षेत्रों गरियाहाट, न्यू मार्केट और हातीबागान में बिक्री में बेहिसाब गिरावट आई है. अपने अंदर झांककर देखने का प्रचलित मिजाज सोशल मीडिया और स्ट्रीट कैम्पेन की ओर लेकर गया. लोगों से अपनी उत्सवधर्मिता को नियंत्रित करने के आह्वान ने पूजा से जुड़ी अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया, जिस पर ढेर सारे लोगों की आजीविका निर्भर करती है. इस वर्ष दुर्गा पूजा का आयोजन 9 से 12 अक्तूबर के बीच किया जाएगा.

दक्षिण कोलकाता के गरियाहाट के 40 वर्षीय कपड़ा विक्रेता राहुल साहा ने कोरोना महामारी के दो वर्षों के बाद से दुर्गा पूजा से पहले का इतना ठंडा बाजार नहीं देखा था. यहां के दुकानदार प्राय: अगस्त के मध्य से ही काफी सक्रिय हो जाते हैं, क्योंकि ठीक इसी समय पूजा से जुड़ी खरीदारी की चाहत अपने चरम पर होती है. कोलकाता की उमस भरी दोपहर में वे नए माल से भरी अपनी दुकान में ग्राहकों के इंतजार में बैठे रहते हैं. साहा ने इंडिया टुडे को बताया, ''इस सीजन में मेरी रोज की बिक्री 5,000 से 7,000 रुपए तक होती थी. लेकिन अब मैं बमुश्किल 3,000 रुपए कमा पा रहा हूं.''
खुदरा विक्रेताओं के शीर्ष संगठन पश्चिम बंगाल व्यापार संघों के परिसंघ (सीडब्ल्यूबीटीए) के आंकड़ों के अनुसार, पिछले साल की तुलना में कारोबार में 25 से 30 फीसद की गिरावट आई है. परिसंघ के अध्यक्ष सुशील पोद्दार बताते हैं, ''इसमें अनेक कारकों का योगदान रहा है. विरोध प्रदर्शन एक वजह है, लेकिन हमें लगातार बारिश और उसके बाद आई बाढ़ के नकारात्मक प्रभाव को भी ध्यान में रखना चाहिए.''
इस उत्सवी माहौल में जहां बाजार अभूतपूर्व गिरावट का खामियाजा भुगत रहे हैं, वहीं शॉपिंग मॉल्स की स्थिति भी कोई बेहतर नहीं है. कोलकाता के दो बड़े मॉल एक्रोपोलिस और साउथ सिटी ने पुष्टि की है कि उन पर इसका असर पड़ा है. जहां बाजारों में सप्ताहांत में ग्राहकों की औसत आवक में 30 प्रतिशत की गिरावट देखी गई, वहीं मॉल्स में 20 प्रतिशत की गिरावट नजर आई.
दोनों मॉल अब अपने-अपने तरीके से प्रोमोशन के काम में जुटे हैं. एक्रोपोलिस के जनरल मैनेजर शुभदीप बसु ने एक कैंपेन शुरू किया है जहां कम से कम एक तय रकम की खरीदारी करने पर ग्राहकों को ट्रॉली बैग जीतने का मौका मिलेगा. वे बताते हैं, ''हालांकि अभी 2023 के मुकाबले कम ग्राहक आ रहे हैं, फिर भी उन परिवारों की आमद बढ़ रही है जो अपने बच्चों के लिए जूते और कपड़े खरीदने का इंतजार कर रहे थे.''
वहीं साउथ सिटी मॉल ने भी इसके लिए अपने स्तर पर कोशिश की है. मॉल हेड ऑफ ऑपरेशंस दीप विश्वास बताते हैं कि उनके यहां एक विशाल पूजा आयोजन की तैयारी के लिए सजावट हो रही है और वे इस तरह ग्राहकों को आकर्षित कर रहे हैं.
राज्य में 19 सितंबर को उस समय उम्मीद की किरण दिखाई दी, जब प्रदर्शनकारी जूनियर डॉक्टरों ने 42 दिन पुरानी अपनी हड़ताल वापस ले ली. इससे दुकानदारों को उम्मीद जगी कि अब लोग अपना मन बदल लेंगे. कुछ मामलों में थोड़ा रुझान बदलना शुरू हो गया है. हातीबागान मर्चेंट वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष रंजन रॉय कहते हैं कि रविवार, 15 सितंबर से यहां आने वालों की संख्या में इजाफा हो रहा है.
इस निराशाजनक मनोदशा ने कॉर्पोरेट प्रायोजकों को भी प्रभावित किया है, जिस पर अधिकांश बड़े/मध्यम पूजा आयोजक निर्भर रहते हैं. 500 से ज्यादा सदस्यों वाले कोलकाता के पूजा आयोजकों के सबसे बड़े संगठन फोरम फॉर दुर्गोत्सव को अब तक लगभग 25 प्रतिशत कम प्रायोजक मिले हैं, जबकि विज्ञापनदाताओं/प्रायोजकों ने पहले भारी रुचि दिखाई थी. वे भी आशा में जी रहे हैं.
फोरम के सचिव शाश्वत दास कहते हैं, ''जून में प्रतिक्रिया इतनी जबरदस्त थी कि अगर वे सभी प्रायोजक मिल जाते तो हममें से हरेक दो पूजाएं आयोजित कर सकता था. लेकिन आर.जी. कर की घटना ने सब कुछ बदल कर रख दिया.'' लेकिन दास भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि पिछले कुछ दिनों में माहौल में धीरे-धीरे बदलाव आया है और पैसों का आना शुरू हो चुका है. दास कहते हैं, ''हम सभी न्याय की मांग के साथ खड़े हैं. लेकिन हम आशा करते हैं कि मां दुर्गा की कृपा के चलते आर्थिक नतीजे बहुत अधिक कठोर नहीं होंगे.''
इस बीच राज्य सरकार की ओर से सीडब्ल्यूबीटी के सहयोग से 20 से 24 सितंबर के बीच आयोजित शहरव्यापी शॉपिंग फेस्टिवल में दसियों हजार की संख्या में लोग उमड़े. सभी को लगता है कि पूजा के अंतिम दिनों में चीजें काफी बेहतर हो जाएंगी. हालांकि, शुरुआत के दिनों में जो नुक्सान हो चुका है, उसकी भरपाई शायद ही हो पाए.
- अर्कमय दत्ता मजूमदार
बेरौनक बाजार
> बंगाल की 50,000 करोड़ रुपए की दुर्गा पूजा से जुड़ी अर्थव्यवस्था आर.जी. कर की घटना से दुखी लोगों की उदासी से बुरी तरह प्रभावित हुई है, जिससे लोगों की रोजी-रोटी पर असर पड़ रहा है.
> चोटी के शॉपिंग क्षेत्रों, मॉल्स में बिक्री में 25 फीसद से अधिक की गिरावट; कॉर्पोरेट प्रायोजकों में भी कमी.
> पूजा के अंतिम चरण में कारोबार में तेजी आ रही है, लेकिन शुरुआती नुक्सान की भरपाई मुश्किल.

