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हरियाणा: बीजेपी के खिलाफ सत्ता-विरोधी लहर या कांग्रेस की अंदरूनी कलह, कौन पड़ेगा किस पर भारी?

हरियाणा में सत्ता-विरोधी भावना का मुकाबला करते हुए कांग्रेस से अपने गढ़ को बचाने की पुरजोर कोशिश में लगी बीजेपी, दूसरी ओर अंदरुनी लड़ाई के बावजूद कांग्रेस उम्मीदों पर सवार

कुरुक्षेत्र में 14 सितंबर को एक रैली में पीएम मोदी, सीएम नायब सिंह सैनी और अन्य भाजपा नेता
कुरुक्षेत्र में 14 सितंबर को एक रैली में पीएम मोदी, सीएम नायब सिंह सैनी और अन्य बीजेपी नेता
अपडेटेड 30 सितंबर , 2024

राजनीति दुश्मनों को भी दोस्त बना सकती है. और अगर यह चुनाव का मौसम हो तो इस तरह की पहल ज्यादा आम हो जाती है. टोहाना के धूल भरे कस्बे में गृह मंत्री अमित शाह ने 23 सितंबर को भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की रैली को संबोधित करते हुए हरियाणा विधानसभा चुनाव के लिए इसी तरह का लहजा दिखाया. उनके भाषण में पार्टी के केंद्र और राज्य दोनों जगह एक दशक के शासन के दौरान किए गए कामों का भी जिक्र था. फिर भी, जिस बात ने हर किसी का ध्यान खींचा, वह यह थी कि उन्होंने कांग्रेस की प्रतिद्वंद्वी नेता—सिरसा की सांसद और पार्टी का दलित चेहरा—कुमारी शैलजा को लेकर चिंताएं जाहिर कीं.

शैलजा ने मुख्यमंत्री की कुर्सी हासिल करने की अपनी महत्वाकांक्षाओं को छिपाया नहीं है और वे अपने लिए तथा अपने 35 वफादारों के लिए टिकट मांग रही थीं लेकिन सिर्फ 13 को ही टिकट मिला और उनमें भी उनका खुद का नाम नहीं था. तब से ही, यह पूर्व केंद्रीय मंत्री चुनाव अभियान से काफी हद तक दूर ही रहीं. यहां तक कि वे 18 सितंबर को पार्टी के दिल्ली मुख्यालय में कांग्रेस का घोषणापत्र जारी किए जाने के समय भी वे मौजूद नहीं थीं. उनके घावों पर नमक छिड़कते हुए एक पार्टी उम्मीदवार के समर्थकों—जो उनके कट्टर प्रतिद्वंद्वी भूपेंद्र सिंह हुड्डा का वफादार है, ने कथित तौर पर उनको निशाना बनाते हुए जातीय टिप्पणियां कीं.

ये टिप्पणियां हिसार के नारनौंद में नामांकन भरने के दौरान की गईं. टोहाना में रैली को संबोधित करते हुए शाह ने तुरंत ही इन घटनाओं को "दलित की बेटी" का अपमान और कांग्रेस को "दलित विरोधी" पार्टी बताया. यह उसके बाद हुआ जब केंद्रीय मंत्री और हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने दावा किया कि बीजेपी कांग्रेस सांसद के लिए "पेशकश के साथ तैयार" है. मगर शैलजा ने उसी शाम आज तक के एक कार्यक्रम में इस तरह की अटकलों को खारिज कर दिया. हालांकि उन्होंने "चोट पहुंचने" की बात कुबूल की—यह संकेत बताता है कि कांग्रेस के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है.

हरियाणा में बीजेपी और कांग्रेस दोनों के लिए ऊंचे दांव के साथ जंग छिड़ी हुई है. राज्य में 5 अक्टूबर को मतदान होना है. गुटबाजी के बावजूद कांग्रेस का मनोबल ऊंचा है. जून में हुए संसदीय चुनाव में उसने बीजेपी से 10 में से 5 सीटें छीनी थीं. अब वह राजधानी नई दिल्ली की बगल में भगवा पार्टी से गढ़ को छीनने के लिए एक दशक के सत्ताविरोधी रुझानों का फायदा उठाना चाहती है. यह सबसे पुरानी पार्टी काफी हद तक अपने पक्ष में जाट-मुस्लिम-दलित वोटों की एकजुटता पर भरोसा कर रही है, साथ ही वह बीजेपी के ऊंची जाति के हिंदुओं और अन्य पिछड़ा वर्ग के एकजुट गठजोड़ की दरारों में भी संभावनाएं देख रही है. 

हरियाणा में दलित मतदाता, आबादी का पांचवें से ज्यादा हिस्सा हैं लेकिन उनके मतदान का कोई निश्चित पैटर्न नहीं है. हालांकि राज्य में मात्र 17 सीटें ही आरक्षित हैं फिर भी 90 विधानसभा सीटों में से 49 में दलित वोटों में कोई भी बदलाव उम्मीदवारों का भाग्य बदल सकता है. क्षेत्रीय सत्ता केंद्रों—जैसे अभय चौटाला के नेतृत्व वाले इंडियन नेशनल लोकदल (आइएनएलडी या इनेलो) और उनके भतीजे दुष्यंत चौटाला की जननायक जनता पार्टी (जेजेपी)—का जाटों, दलितों और अन्य पिछड़ा वर्ग के बीच समर्थन आधार एक तरह से खत्म-सा हो गया है और यह काफी हद तक कांग्रेस और बीजेपी के बीच बंट गया है.

लोकसभा चुनाव में देखा गया कि राज्य में दलित वोट भगवा खेमे से निकलकर कांग्रेस की तरफ भारी संख्या में शिफ्ट हुए, जिससे बीजेपी को सिरसा और अंबाला दोनों आरक्षित सीटों पर नुक्सान उठाना पड़ा. उनका विश्वास फिर से जीतने के लिए बीजेपी की राज्य इकाई जुलाई से ही घर-घर संपर्क अभियान चला रही है. उसने मनाने के लिए गरीबों की खातिर विभिन्न मुफ्त योजनाओं का वादा किया है जिनमें पिछड़े वर्ग और अनुसूचित जाति के छात्रों के लिए पूर्ण छात्रवृत्ति भी शामिल है, जो भारत के किसी भी सरकारी कॉलेज में मेडिकल और इंजीनियरिंग पढ़ने वाले छात्रों को मिलेगी. कांग्रेस ने भी सात गारंटी का वादा किया है, जिसमें अनुदान के साथ-साथ जाति जनगणना का वादा भी शामिल है. जाति जनगणना का मसला राहुल गांधी जोर-शोर से उठाते आ रहे हैं. इस सबके बीच शैलजा के "अपमान" ने बीजेपी को दलितों तक पहुंचने के लिए नया सहारा दे दिया है.

बीजेपी के लिए हरियाणा इतना अहम क्यों

आगामी महीनों में महाराष्ट्र, झारखंड और दिल्ली में चुनाव होने वाले हैं. ऐसे में, अगर बीजेपी हरियाणा हार जाती है तो इसका असर अन्य राज्यों में भी पड़ सकता है. वहीं अगर बीजेपी, जाटों के गढ़ में जीत जाती है तो यह उसके लिए बड़ी राहत की बात होगी क्योंकि वह काफी समय से किसानों के गुस्से का सामना कर रही है और लोकसभा चुनाव में खराब प्रदर्शन के बाद पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश में फिर से अपनी पकड़ बनाने के लिए संघर्ष कर रही है. इसके अलावा पार्टी यह कतई नहीं चाहेगी कि उत्तर भारत के दो महत्वपूर्ण राज्यों पंजाब और हिमाचल प्रदेश के बाद एक और राज्य विपक्ष की झोली में चला जाए.

बीजेपी के एक शीर्ष नेता बताते हैं कि हरियाणा नई दिल्ली के लिए एक सुरक्षा कवच का काम भी करता है. इस साल की शुरुआत में, जब पंजाब के किसान फिर से राष्ट्रीय राजधानी की घेराबंदी करना चाहते थे, तब हरियाणा पुलिस ने उन्हें पंजाब से लगती राज्य की सीमा अंबाला में ही रोक दिया था. वे कहते हैं कि अगर ऐसा न हो पाता तो केंद्र के लिए एक बार फिर से वैसा ही सिरदर्द पैदा हो सकता था जैसा 2020-21 में दिल्ली की सीमाओं पर अब निरस्त हो चुके कृषि कानूनों के खिलाफ  चले आंदोलन के दौरान हुआ था.

हरियाणा में सत्ता को बरकरार रखने के कुछ दूसरे रणनीतिक फायदे भी हैं. निवेश को आकर्षित करने के लिए भारत के सबसे तेजी से विकसित होने वाले क्षेत्र—बेंगलूरू, हैदराबाद और चेन्नै—विपक्ष शासित राज्यों में पड़ते हैं. मुंबई भी इस कतार में है, जहां बीजेपी और उसके सहयोगियों को सत्ता बरकरार रखने के लिए कठिन चुनौती का सामना करना पड़ रहा है. इस तरह बीजेपी के विकसित भारत के सपने के लिए हरियाणा एक प्रमुख कड़ी बन जाता है क्योंकि निवेश को आकर्षित करने वाले उत्तर भारत के प्रमुख स्थानों में पड़ोसी उत्तर प्रदेश के नोएडा के अलावा गुरुग्राम और फरीदाबाद इसी राज्य में स्थित हैं.

बीजेपी इस चुनाव को और ज्यादा स्थानीय बनाने का प्रयोग कर रही है. पिछले चुनावों में पार्टी का सबसे बड़ा आकर्षण रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अब तक केवल एक रैली को संबोधित किया है और 3 अक्टूबर को चुनाव प्रचार खत्म होने से पहले उनके इक्का-दुक्का रैलियां करने की ही संभावना है. यहां तक कि मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी और उनके पूर्ववर्ती खट्टर को भी खुली छूट नहीं दी गई है. हालांकि सैनी लगभग 90 रैलियों को संबोधित करने वाले हैं, और राव इंद्रजीत सिंह, अनिल विज, धर्मबीर सिंह और कृष्ण पाल गुर्जर जैसे अन्य भगवा क्षत्रपों को भी बड़े पैमाने पर प्रचार करने की अनुमति दी गई है, जिससे सीएम पद के लिए उनकी उम्मीदें बनी हुई हैं.

यहां तक कि कांग्रेस ने भी भूपिंदर सिंह हुड्डा को भले ही प्रत्याशियों के चयन और चुनाव अभियान की रूपरेखा बनाने की जिम्मेदारी दी है, बावजूद इसके उन्हें मुख्यमंत्री का चेहरा बनाने से परहेज किया है. दो बार मुख्यमंत्री रह चुके हुड्डा ने लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के पक्ष में जाटों  का समर्थन जुटाने में अहम भूमिका निभाई थी. राज्य की कुल आबादी का लगभग एक-चौथाई जाट हैं और वे अन्य पिछड़े समुदायों पर भी अपना प्रभाव रखते हैं.

अब, कांग्रेस खुद को पहलवान, किसान और जवान (यहां अग्निवीर) के हितों के रखवाले के रूप में प्रोजेक्ट कर रही है और ये सभी मुद्दे जाट मतदाताओं के दिल के करीब हैं. राजनैतिक पर्यवेक्षक इसे बीजेपी के खिलाफ जाटों के गुस्से को और हवा देने की कांग्रेस की चाल के रूप में देखते हैं. 2014 में बीजेपी ने गैर-जाट खट्टर को मुख्यमंत्री बनाया. तब से जाट बीजेपी से कुछ खफा थे और 2016 के हिंसक आरक्षण आंदोलन, किसान विरोध की लहरों और हाल ही में दिल्ली में पहलवानों के प्रदर्शन जैसे कई अन्य कारणों से उनकी नाराजगी लगातार बढ़ती चली गई.

मगर बीजेपी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि जाटों का गुस्सा राज्य के केवल दो क्षेत्रों—मध्य हरियाणा में देशवाल और पश्चिम में बांगर तक ही सीमित है. भाजपा को उम्मीद है कि इनेलो और जेजेपी अपने सहयोगियों—बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर के नेतृत्व वाली आजाद समाज पार्टी (एएसपी) के साथ कम से कम बांगर में तो कांग्रेस को बढ़त बनाने से रोक ही लेंगे. यह क्षेत्र दक्षिण पंजाब से भी सटा हुआ है, जो आम आदमी पार्टी (आप) का मजबूत आधार है. आप स्वतंत्र रूप से लड़ रही है और इसने मुकाबले को बहुकोणीय बना दिया है. कांग्रेस के जाट-दलित गठबंधन से मुकाबला करने के लिए बीजेपी 'अगड़े-पिछड़े’ के फॉर्मूले पर काम कर रही है. इसके अलावा, सिरसा के साथ बांगर पर शैलजा का भी प्रभाव है.

अगड़ा-पिछड़ा फॉर्मूला

बीजेपी सभी 24 फसलों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर खरीदने की प्रतिबद्धता जताकर कृषि समुदायों के बीच गुस्से को कम करने की कोशिश कर रही है. इस तरह उसने एमएसपी के लिए कानूनी गारंटी प्रदान करने के कांग्रेस के वादे को भी साधने की कोशिश की है. सैनी ने इंडिया टुडे को बताया, "हम पहले से ही 14 फसलें एमएसपी (पूरे भारत में सबसे अधिक) पर खरीद रहे हैं. हम सब्जी किसानों को भावांतर (कीमत में अंतर) का भुगतान करते हैं. यदि आप आंकड़ों पर नजर डालें तो हमारे शासनकाल में कृषि में 8.1 फीसद की वृद्धि हुई है."

कॉलेज जाने वाले ग्रामीण क्षेत्रों के प्रत्येक छात्र के लिए स्कूटर और 36 छोटे पिछड़े समुदायों के लिए पर्याप्त फंड के साथ एक अलग कल्याण बोर्ड के वादे के साथ कई और लुभावने वादे भी किए गए हैं. ऐसे वादों से पार्टी जाटों की नाराजगी को तो दूर नहीं कर सकती, लेकिन ये राज्य के जीटी रोड (उत्तरी हरियाणा) और अहीरवाल-मेवात (दक्षिण) बेल्ट के ओबीसी किसानों को लुभाने में तो मददगार हो ही सकते हैं.

खट्टर शासन के दौरान जाटों की तरह, गुर्जर, अहीर और अन्य ओबीसी नेता भी उपेक्षित महसूस कर रहे थे. इस साल आम चुनाव से कुछ हफ्ते पहले बीजेपी ने सैनी को सीएम बनाकर राज्य को पांच दशकों में अपना पहला गैर-जाट ओबीसी मुख्यमंत्री दिया. इस कदम से वह पिछड़े वर्ग के वोटों का एक बड़ा हिस्सा हासिल करना चाहती है. कांग्रेस ने 20 ओबीसी को टिकट दिया है तो बीजेपी ने 22 को. भाजपा के एक अंदरूनी सूत्र का दावा है कि इस बार किसी भी लोकप्रिय या जन नेता को नजरअंदाज नहीं किया गया है.

मसलन, एक अन्य शीर्ष नेता और सांसद कृष्ण पाल गुर्जर के बेटे देवेंद्र चौधरी को मैदान में उतारने में पार्टी असमर्थ थी, फिर भी उनके कम से कम पांच वफादारों को टिकट दिया गया है. इसी तरह, केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत सिंह की बेटी आरती सिंह के अलावा उनके नौ अन्य वफादारों को टिकट मिला है. खट्टर भले ही अपने 12 वफादारों को प्रत्याशी बनवाने में सफल रहे, मगर उनके नौ करीबी सहयोगियों को टिकट देने से मना कर दिया गया. वहीं, उनके खेमे के विरोध के बावजूद, बीजेपी ने पूर्व गृह मंत्री अनिल विज (अंबाला कैंट) और विधानसभा अध्यक्ष ज्ञान चंद गुप्ता (पंचकूला) जैसे दिग्गज नेताओं पर भरोसा जताया है.

जहां तक जाटों की बात है बीजेपी ने 16 जाट प्रत्याशी उतारे हैं, जो कांग्रेस के 29 से काफी कम हैं जिनमें हुड्डा भी शामिल हैं. राज्य में 37 सीटें ऐसी हैं जहां 25 फीसद से अधिक मतदाता जाट हैं. लोकसभा चुनाव में, कांग्रेस इनमें से 27 पर बढ़त बनाने में सफल रही, जबकि शेष 10 पर बीजेपी आगे रही. कांग्रेस को जाटों (इस मामले में हुड्डा) का भारी समर्थन मिलने की उम्मीद है, इसलिए बीजेपी ने नई जमीन हासिल करने के लिए अगड़ी और पिछड़ी जातियों के उम्मीदवारों के मिश्रण को चुना है.

ग्रामीण हरियाणा में, जाटों और ब्राह्मणों को पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखा जाता है. इसलिए जहां 14 सीटों पर दोनों पार्टियों के जाट उम्मीदवारों का आमना-सामना होगा वहीं बीजेपी ने जाट-बहुल तीन निर्वाचन क्षेत्रों में 11 ब्राह्मण उम्मीदवारों को उतारा है. बीजेपी को उम्मीद है कि इस कड़े मुकाबले में अगड़ी जातियों का अटूट समर्थन उसकी नैया को पार लगाएगा.


अंतत:, चुनाव परिणाम इस बात पर निर्भर करेगा कि विभिन्न जाति और समुदाय के ये समीकरण जमीन पर कितना असर छोड़ते हैं और दोनों पार्टियां अपने-अपने वोट बैंक को कितने प्रभावी तरीके से एकजुट रख पाती हैं. इस चुनाव के नतीजे का असर केवल हरियाणा तक सीमित नहीं रहने वाला, बल्कि यह पूरे उत्तर भारत के राजनैतिक समीकरणों पर अपना गहरा असर छोड़ेगा.

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