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जम्मू-कश्मीर के आठ बड़े नेताओं ने घाटी की राजनीति के बारे में क्या बड़ा खुलासा किया?

जम्म-कश्मीर के आठ प्रमुख सियासतदानों ने ग्रुप एडिटोरियल डायरेक्टर राज चेंगप्पा से अपनी आकांक्षाओं और आशंकाओं के बारे में बात की

उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ़्ती
उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ़्ती
अपडेटेड 3 अक्टूबर , 2024

प्र. इस चुनाव की कितनी अहमियत है?\

उमर अब्दुल्ला (पूर्व मुख्यमंत्री, जम्मू-कश्मीर; पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री; उपाध्यक्ष, जम्मू-कश्मीर नेशनल कांफ्रेंस) : जम्मू-कश्मीर में यह विधानसभा चुनाव भारत सरकार की तरफ से काफी मारामारी और चीखने-चिल्लाने के बाद हो रहा है. उन्हीं पर छोड़ देते तो हमारे यहां ये चुनाव नहीं होते. यह चुनाव सितंबर की 30 तारीख से पहले करवाने का फरमान देकर सुप्रीम कोर्ट ने उन पर थोपा है.

महबूबा मुफ्ती (पूर्व मुख्यमंत्री, जम्मू-कश्मीर; अध्यक्ष, जम्मू-कश्मीर पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी) : नई दिल्ली ऐसा दिखाने की कोशिश कर रही है कि मानो उसने हम पर बहुत बड़ा एहसान किया है. हालात में सुधार के उनके तमाम दावों के बावजूद चुनाव करवाने में उन्हें 10 साल लगे जो लोकतंत्र में रूटीन होने चाहिए थे. यह बदकिस्मती की बात है.

जितेंद्र सिंह (केंद्रीय राज्य मंत्री; उधमपुर के सांसद; सदस्य, भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी) : यह लोकतांत्रिक आकांक्षाओं का फिर से उभरना है—हाल के लोकसभा चुनाव के भारी मतदान में हमने यह देखा. पहली बार लोगों को लगा कि उन्हें अपने नुमांइदे चुनने का मौका मिला है और इसमें कोई हेरफेर नहीं होगी.

तारिक हमीद कर्रा (पूर्व सांसद, श्रीनगर; अध्यक्ष, जम्मू-कश्मीर प्रदेश कांग्रेस कमेटी) : यह गैरमामूली चुनाव है. जम्मू और कश्मीर के लोगों के लिए यह आला दर्जे की अहमियत रखता है.

इंजीनियर रशीद (बारामुला के सांसद; संस्थापक, अवामी इत्तेहाद पार्टी) : यह चुनाव तथाकथित नए कश्मीर की मोदी की कोशिशों को हराएगा. इसकी बदौलत लोग इस उपमहाद्वीप को सारे गड़बड़झाले से बाहर निकाल पाएंगे और ऐसा करने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि कश्मीर मुद्दे का हल निकाला जाए.

सज्जाद लोन (पूर्व विधायक; अध्यक्ष, जम्मू-कश्मीर पीपल्स कॉन्फ्रेंस) : जमीन पर मुझे बहुत ज्यादा जोश दिखाई नहीं देता. एक वजह तो यह है कि यह उस राज्य विधानसभा के लिए है जिसके पास लोगों की राय में उनकी जिंदगियों में बदलाव लाने के लिए बहुत ज्यादा अधिकार नहीं होंगे. दूसरी वजह यह हो सकती है कि यह खेती का मौसम है और लोग काम में मशगूल हैं. इलेक्शन कमिशन ऑफ इंडिया को इसके बारे में सोचना चाहिए था.

अल्ताफ बुखारी (अध्यक्ष, जम्मू-कश्मीर अपनी पार्टी) : नई दिल्ली ने हमसे जो छीन लिया है, उसे वापस पाने की दिशा में यह पहला कदम है. जम्मू और कश्मीर के लोगों को लगता है कि ऐसा करने का सबसे अच्छा तरीका बैलट के जरिए है.

रवींद्र रैना (पूर्व विधायक; अध्यक्ष, जम्मू-कश्मीर भाजपा): यह चुनाव जम्मू और कश्मीर के नसीब और तकदीर का फैसला करेगा. दुनिया एक नया कश्मीर देख रही है.

प्र. चुनाव के प्रमुख मुद्दे क्या हैं?

उमर अब्दुल्ला: आप उस किस्म के बदलावों को छोड़ भी दें जो अनुच्छेद 370 को खत्म करके हम पर थोपे गए, तो लोगों के सामने रोजमर्रा के मसले भी हैं जो बीते कुछ सालों में बेहतर होने के बजाए बदतर ही हुए हैं. तो बात बुनियादी राजकाज और सेवाओं की डिलिवरी की है. बात बढ़ती बेरोजगारी की है. बात उस नदारद निवेश की है जिसके बारे में बातें तो बहुत की गईं पर जो जमीन पर कहीं दिखाई नहीं देता. बात उन परियोजनाओं की है जिनकी बातें तो बहुत की गईं पर जो लागू नहीं की जा रही हैं. बात उस चीज की भी है जो जम्मू में जनादेश को मजबूत करते हुए घाटी में जनादेश को खंडित करने का कदम और कोशिश मालूम देती है.

महबूबा मुफ्ती: हमारे लिए कश्मीर मुद्दे का समाधान प्राथमिकता और सबसे अहम चीज है. फिर बेरोजगारी, महंगाई, पर्यावरण और नशाखोरी के मसले आते हैं. बेरोजगारी की दर सबसे ज्यादा है—युवाओं की एक तिहाई—और सरकारी नौकरियों को छोड़कर रोजगार के कोई रास्ते नहीं हैं. सरकार लोगों को किसी वजह या कैफियत के बगैर उग्रवाद से जुड़ा बताकर सरकारी नौकरियों से बर्खास्त कर रही है और बाहर फेंक रही है.

जितेंद्र सिंह: अनुच्छेद 370 के समर्थक चाहे जो कहें, कश्मीरी नागरिक और खासकर नौजवान, जो बेहद आकांक्षी हैं, इस मौके को चूकना नहीं चाहेंगे जो प्रधानमंत्री मोदी लेकर आए हैं और जिसने भारत को पिछले 10 साल में रोजगार के अवसरों की सबसे आकर्षक मंजिलों में से एक बना दिया है. यही नहीं, मोटे तौर पर पर्यटन पर निर्भर स्थानीय लोगों को इससे पहले वस्तुत: भूखा रहना पड़ता था. उनके लिए यहां 2.5 करोड़ सैलानियों का आना भारी राहत की बात है और वे इसे जारी रखना चाहेंगे.

तारिक अहमद कर्रा: बात केवल हमारे विकास या हमारी गलियों-नालियों की नहीं है. बात हमारी जमीन और रोजगार की गारंटियों के साथ राज्य का दर्जा बहाल करने की है. बात हमारी उस खोई हुई गरिमा को बहाल करने की है जिसे बहुत अलोकतांत्रिक और असंवैधानिक रास्ता अपनाकर हमसे लूट लिया गया. बात जम्मू और कश्मीर के लोगों का आत्मसम्मान बहाल करने की है.

इंजीनियर रशीद: सबसे बड़ा मुद्दा तो कश्मीर ही है, अटल टनल और दूसरी परियोजनाएं नहीं. हम स्थायी शांति चाहते हैं, कब्रिस्तान का सन्नाटा नहीं. मैं एनडीए की सरकार और प्रधानमंत्री से अपील करना चाहता हूं कि खुदा के लिए अपने अंत:करण की आवाज सुनिए. एक लाख लोग मर चुके हैं. अगर आप कश्मीर का मुद्दा हल कर देते हैं, तो आप विश्वगुरु बन जाएंगे.

सज्जाद लोन: (लोगों में) गुस्सा बहुत है. बीते पांच साल से लोगों को लगातार अपमानित किया जाता रहा है. वे अपनी आवाज खो बैठे हैं. उनके अपने नुमाइंदे नहीं हैं. तो मुद्दा इसी जज्बात के इर्द-गिर्द रहेगा.

अल्ताफ बुखारी: कश्मीर को वे हक दें जिसका वह भारत के संविधान के तहत हकदार है. हम अपनी पहचान, संस्कृति, जमीनों और नौकरियों की हिफाजत करना चाहते है—हमें वही विकल्प दें जो देश के हर राज्य को हासिल हैं. हमें सामान्य भारतीयों की तरह जिंदगी बसर करने का मौका दें. इस चुनाव का बड़ा मुद्दा यह है कि जघन्य अपराधों के आरोपियों को छोड़कर उन सभी लोगों को आम माफी दें जिन्हें गिरफ्तार करके जेलों में डाल दिया गया है. 

रवींद्र रैना: विकास, न्याय, पारदर्शिता और ईमानदारी. जो लोग पाकिस्तान, सेल्फ-रूल और आतंकवाद की बात कर रहे हैं, वे अब स्कूलों और सड़कों के निर्माण सहित विकास की बात करने को मजबूर हैं.

प्र. अनुच्छेद 370 को हटाने पर आपका क्या रुख है?

उमर अब्दुल्ला: हम अनुच्छेद 370 की बहाली की बात कर रहे हैं, लेकिन अच्छी तरह जानते हैं कि यह इस विधानसभा के जरिए नहीं हो सकता. यह यहां की सरकार के स्तर पर मुमकिन नहीं है. हम लोगों को बताना चाहते हैं कि भाजपा को यह कदम उठाने में दशकों लग गए हैं. इसे बहाल करने की लड़ाई चुटकियों में खत्म नहीं होने वाली नहीं है. इसलिए, यह हमारी मुहिम का अंतिम लक्ष्य नहीं है. हमें यहां के रोजमर्रा के जीवन को प्रभावित करने वाले मुद्दों पर भी ध्यान देना है.

महबूबा मुफ्ती: कश्मीर मसला सुलझाने की इच्छुक देश की किसी भी सरकार को शुरुआत 370 की बहाली के साथ करनी होगी. यह जम्मू-कश्मीर और देश के बाकी हिस्सों के बीच की खाई को पाटने वाला एक पुल था. लेकिन उन्होंने इसे तोड़ दिया.

जितेंद्र सिंह: यह एक ऐसा मुद्दा है जो केवल पीडीपी और नेशनल कॉन्फ्रेंस जैसे दो-तीन राजनैतिक दलों के लिए बयानबाजी का विषय बना हुआ है. आम कश्मीरी आवाम के लिए यह कोई मुद्दा ही नहीं है. यह केवल मुट्ठी भर लोगों के लिए मददगार था, जो आज अनुच्छेद 370 के सबसे बड़े पैरोकार बन रहे हैं. अपनी सत्ता कायम रखने के लिए उन्होंने इसके दुरुपयोग में कोई कसर नहीं छोड़ी थी.

तारिक हमीद कर्रा: इतिहास गवाह है कि कांग्रेस पार्टी ने ही अनुच्छेद 370 दिया था लेकिन यह कोई दान में नहीं दिया गया. बल्कि उस समय भारत और जम्मू-कश्मीर के सबसे बड़े नेताओं के बीच इस अनुच्छेद पर बातचीत हुई थी. अगर अब सत्ता में बैठे लोग कहते हैं कि अनुच्छेद 370 उनके लिए बेहद संवेदनशील मुद्दा है तो ऐसे दूसरे तरीके भी हैं जिनसे हमें इसमें निहित अधिकार प्रदान किए जा सकते हैं. हमें 370 की संख्या से कोई लेना-देना थोड़े है. यही मायने रखता है कि हम अपने खोए और छीने गए अधिकार वापस पा सकें. हम तो बस यही चाहते हैं कि संविधान के तहत पूर्वोत्तर राज्यों, हिमाचल और अन्य प्रगतिशील राज्यों के लिए जो व्यवस्था की गई है, हमें भी वही चीजें मिलें, भले ही किसी भी रूप में हों.

इंजीनियर रशीद: कांग्रेस, नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी ने अनुच्छेद 370 को पहले ही कमजोर कर दिया था. संसद से पारित हर कानून यहां लागू होता है. अगर वे अनुच्छेद 370 का वाकई कोई सम्मान कर रहे होते तो राज्य विधानसभा कभी भी जम्मू-कश्मीर में यूएपीए लागू नहीं करती या जम्मू-कश्मीर तक केंद्रीय एजेंसियों की पहुंच नहीं होती. उन्हें जीएसटी को लागू नहीं करना चाहिए था. इस सबके बावजूद हमारे लिए अनुच्छेद 370 बेहद महत्वपूर्ण है. यह जम्मू-कश्मीर और देश के बाकी हिस्सों के बीच एक पुल की तरह रहा है. 

सज्जाद लोन: उन्होंने अनुच्छेद 370 को ऐसे बदनाम कर दिया मानो इसके जरिए कुछ लूट लिया गया. अनुच्छेद 370 एक संघीय समाधान है, और दुनियाभर के कई हिस्सों में इस तरह की संघीय व्यवस्थाएं की गई हैं. इसे राष्ट्र-विरोधी या अलगाववादी नहीं कहा जा सकता. संघीय समाधान असल में बफर जोन की तरह काम करते हैं और अलगाववादी भावनाएं दबाने में कारगर होते हैं. 

अल्ताफ बुखारी: कोई भी बुलेट या फिर बैलेट के जरिए ही 370 वापस नहीं ला सकता. यह सिर्फ राजनैतिक बातचीत से ही संभव हो सकता है. इस मामले को अदालत ले जाना सबसे बड़ी गलती थी. राजनैतिक मुद्दे केवल राजनैतिक नेतृत्व के माध्यम से ही सुलझाए जाने चाहिए.

रवींद्र रैना: डॉ. फारूक अब्दुल्ला कहते हैं कि अनुच्छेद 370 बहाल करेंगे. 
फिर साथ ही यह भी कहते हैं कि ऐसा करने में 100 साल लग जाएंगे. संसद और अदालत की तरफ से अनुच्छेद 370 हटाने पर मुहर लग चुकी है और अब इसे बदला नहीं जा सकता.

प्र. आप पांच साल के केंद्रीय शासन का आकलन कैसे करेंगे?

उमर अब्दुल्ला: मेरे लिए इस बारे में ज्यादा कुछ कह पाना मुश्किल है, सिवाय इसके कि कम से कम खुलकर अलगाववादी राजनीति होने में तो कुछ कमी आई है. फिर भी, अगर इंजीनियर राशिद अच्छा प्रदर्शन करते हैं तब तो यही कहना उचित होगा कि भारत सरकार ऐसी राजनीति पर काबू पाने में नाकाम रही है.

महबूबा मुफ्ती: इस सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि इसने जनमत संग्रह, आत्मनिर्णय की भावना को उभारा है. इंजीनियर राशिद पर आतंकवाद को वित्तपोषित करने का आरोप लगाया जा रहा था, फिर भी लोगों ने उन्हें वोट दिया. इससे पता चलता है कि कश्मीर की मूल भावना क्या है.

जितेंद्र सिंह: कानून-व्यवस्था बहाल करने और बुनियादी ढांचा मजबूत करने के अलावा देर से ही सही, स्टार्ट-अप सेक्टर और उद्योगों के लिए नए रास्ते खुल रहे हैं. उदाहरण के तौर पर, जम्मू-कश्मीर में दो औद्योगिक पार्क बनने जा रहे हैं, जो बड़े बदलाव में सहायक साबित होंगे.

तारिक हमीद कर्रा: उनका कश्मीर मॉडल एक जुमले के अलावा कुछ नहीं है. यह वास्तव में जम्मू-कश्मीर के लोगों पर अत्याचार, दमन और अन्य तरह के दबाव बढ़ाने वाला मॉडल है.

इंजीनियर रशीद: उनकी उपलब्धि बस यही है कि उन्होंने सरकारी कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया, और कश्मीर मुद्दे के समाधान की मांग करने वाले हर कश्मीरी को राष्ट्र-विरोधी करार दे रहे हैं. उन्होंने जम्मू और कश्मीर के बीच की खाई को भी घटा दिया है, क्योंकि अब तो जम्मू के लोग भी मानने लगे हैं कि मोदी सरकार ने उनके साथ धोखा किया है.

सज्जाद लोन: सरकार का सबसे महत्वपूर्ण गुण यही होता है कि वह जनता के प्रति जवाबदेह होती है. पांच साल बाद आप सत्ता में बने रहने के लिए फिर वोट मांगते हैं. यही लोकतंत्र की खूबसूरती है. लेकिन इस शासनकाल में वह खूबसूरती नदारद है. और इसलिए मौजूदा ढांचा बदसूरत ही कहा जाएगा, क्योंकि इसमें लोकतंत्र की मूल भावना का अभाव है.

अल्ताफ बुखारी: विकास के मोर्चे पर उन्होंने कोई बड़ी क्रांति नहीं कर दी है. मुगल सुरंग या गुरेज और तंगधार वाली सुरंगें कहां हैं? वे कहते हैं कि वे 70,000 करोड़ रुपए का निवेश लाए हैं. मुझे 7,000 करोड़ ही दिखा दो, जो लाए हों. कश्मीर और कश्मीरी आर्थिक रूप से बदहाल हैं. कोई कारोबार नहीं है. कोई पैसा नहीं है. जमीन की कीमतें 50 फीसद घट गई हैं. कोई नौकरी नहीं है. हमारे पास 16 लाख बेरोजगार स्नातक और स्नातकोत्तर युवा हैं.

रवींद्र रैना: शांति, समृद्धि और भाईचारा कायम होना मुख्य उपलब्धियों में शुमार है. लोग बिना किसी डर के आराम से घूम रहे हैं, पत्थरबाजी की कोई घटना नहीं हो रही है. कहीं भी दहशत का माहौल नहीं है; स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय खुल रहे हैं. 'कश्मीर स्वर्ग है’ वाली कहावत अब सही मायने में सच होती दिख रही है.

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