
मार्च 2005 में चुनाव जीतने के बाद कांग्रेस में करीब एक हफ्ते तक तनावपूर्ण बैठकों का दौर चला, जिसके बाद पार्टी ने 57 वर्षीय भूपेंद्र सिंह हुड्डा को हरियाणा के मुख्यमंत्री पद की कमान सौंप दी. साथ ही इस कुर्सी पर तीन बार के पूर्व सीएम भजनलाल का दावा कमजोर साबित हुआ, जो उस समय 74 वर्ष के थे. भजनलाल तब पार्टी के सबसे बड़े नेता हुआ करते थे और उन्हें 90 सदस्यीय विधानसभा के लिए चुने गए कांग्रेस के 67 विधायकों में से अधिकांश का समर्थन हासिल था.
हुड्डा ने 1990 के दशक में जाट बहुल क्षेत्र रोहतक में चौटाला परिवार के दिग्गज देवीलाल को लगातार तीन संसदीय चुनावों में हराकर सियासी रुतबा हासिल किया था. सबसे बड़ी बात यह कि पार्टी के आंतरिक झगड़े में उन्होंने तत्कालीन कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी का खुलकर समर्थन किया. यही वजह थी कि गांधी परिवार ने 'युवा' जाट नेता का पूरा समर्थन किया. फिर क्या था, नवनिर्वाचित विधायक भी भजनलाल का साथ छोड़ उनके पीछे आ खड़े हुए.
दो दशक बाद अब जब 5 अक्तूबर को हरियाणा में एक बार फिर विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं तब हुड्डा, पूरी तरह न सही लेकिन कुछ हद तक खुद को उसी स्थिति में पा रहे हैं. उनकी आयु 76 वर्ष हो चली है और उम्र में उनसे छोटी उनकी प्रतिद्वंद्वी और सिरसा से सांसद 61 वर्षीया कुमारी शैलजा ने गांधी परिवार में बेहतर पैठ बना ली है. कुछ साल पहले हुड्डा 'जी-23' का हिस्सा बन गए थे. यह पार्टी में व्यापक सुधारों की मांग उठाने वाला कांग्रेस नेताओं का एक समूह था, जिसे गांधी परिवार के वर्चस्व के खिलाफ बगावत करने वाला माना गया.
हालांकि, 2022 के बाद से उन्हें पार्टी की हरियाणा इकाई अपने हिसाब से चलाने का अधिकार मिला हुआ है. लेकिन आंतरिक सूत्र बताते हैं कि उनकी निष्ठा अब पहले जैसी 'बेदाग नहीं रही' है. वैसे, दो बार के पूर्व मुख्यमंत्री ने हालिया आम चुनाव में सत्तारूढ़ भाजपा के साथ कड़े मुकाबले में 10 लोकसभा सीटों में से पांच पर जिताकर कांग्रेस को मजबूत स्थिति में ला दिया. इसकी बड़ी वजह यह रही कि जाट वोट उनके पीछे लामबंद हो गया था. फिर भी पार्टी 2019 से नेता विपक्ष की जिम्मेदारी संभाल रहे हुड्डा को सीएम पद का उम्मीदवार बनाने से परहेज कर रही है.
शैलजा के करीबियों का मानना है कि उन्हें आगे रखकर कांग्रेस न केवल हरियाणा बल्कि पड़ोसी राज्यों पंजाब, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी दलित वोटों को साध सकती है. कुछ उसी तरह, जिसकी कोशिश पार्टी ने तीन वर्ष पूर्व चरणजीत सिंह चन्नी को पंजाब का सीएम बनाकर की थी. वह प्रयोग भले ही नाकाम हुआ हो लेकिन हरियाणा को पहला दलित सीएम मिलना गेमचेंजर हो सकता है. इस बीच, शैलजा ने हुड्डा खेमे की धड़कनें बढ़ा रखी हैं. हाल में मीडियाकर्मियों से बातचीत में उन्होंने कांग्रेस की जीत पर पूरा भरोसा जताया. साथ ही कहा कि सीएम का फैसला पार्टी आलाकमान करेगा जो दलित भी हो सकता है.
कांग्रेस हरियाणा में जाटों, दलितों और मुसलमानों को साथ लाकर एक नया सियासी समीकरण तैयार करना चाहती है. इस रणनीति के पीछे इरादा यह है कि राज्य के मतदाताओं में एक-चौथाई हिस्सेदारी वाले जाट समुदाय के बीच हुड्डा की लोकप्रियता का लाभ उठाया जाए. शैलजा की दलित पृष्ठभूमि का इस्तेमाल कर अनुसूचित जातियों को भी साध लिया जाए, जिनकी हिस्सेदारी कुल मतदाताओं में करीब 20 फीसद है. पार्टी का मानना है कि परंपरागत मुस्लिम वोटबैंक के साथ इस समीकरण को जोड़ना आगामी चुनावों में उसकी जीत का बेहतर फॉर्मूला साबित हो सकता है. हालांकि, इस समीकरण को साधना एक चुनौती भी है. जाट और मुस्लिम वोटबैंक कांग्रेस के साथ रहने की संभावना है, लेकिन दलित वोटों को लेकर निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता. विपक्षी गुट के 'संविधान खतरे में है' वाले नैरेटिव की वजह से भले ही आम चुनाव में दलितों ने कांग्रेस का समर्थन किया हो. लेकिन इस लामबंदी को ज्यादा समय के लिए टिकाऊ नहीं माना जा सकता.

बहुजन समाज पार्टी और भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर की आजाद समाज पार्टी (एएसपी) का क्रमश: इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) और जननायक जनता पार्टी (जेजेपी) के सहयोगी के तौर पर चुनाव मैदान में कूदना समीकरणों को बदलकर रख सकता है. ऐसे में दलित जनाधार को जोड़े रखने में शैलजा की भूमिका ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है. पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक केंद्रीय नेतृत्व को यह भी लगता है कि कहीं खुलकर हुड्डा का समर्थन करना इसके खिलाफ अन्य समुदायों के ध्रुवीकरण का कारण न बन जाए.
सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस को उम्मीद है कि वह एक दशक पुरानी भाजपा सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी भावना के दम पर जीत हासिल करेगी. चौटाला के नेतृत्व वाली इनेलो और जेजेपी के व्यावहारिक विकल्प के तौर पर उभरने में असमर्थ रहने से उसका आत्मविश्वास और बढ़ गया है. यही नहीं, कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी (आप) के साथ गठबंधन के दरवाजे तकरीबन बंद कर दिए हैं जबकि लोकसभा चुनाव में दोनों पार्टियों ने मिलकर 47.6 फीसद वोट हासिल किए थे, जो भाजपा के 46.1 फीसद वोटशेयर की तुलना में अधिक थे.
करीबी मुकाबलों में इन वोटों का इस तरह बंटना खासकर उत्तर और मध्य हरियाणा में खेल बिगाड़ सकता है. सूत्रों के मुताबिक, राहुल गांधी ने तो आप और समाजवादी पार्टी—विपक्षी गठबंधन इंडिया ब्लॉक के दोनों प्रमुख घटकों—को साथ लाने पर विचार किया था लेकिन हुड्डा खेमे ने ऐसे किसी भी कदम का कड़ा विरोध किया.
इसमें कोई दो राय नहीं कि हुड्डा ने भाजपा सरकार के खिलाफ जाटों की नाराजगी—जो 2016 के हिंसक आरक्षण आंदोलन, किसानों के प्रदर्शनों और हाल में दिल्ली में पहलवानों के आंदोलन से और भड़की थी—को पूरी सफलता से कांग्रेस के लिए वोटों में बदलने में सफलता पाई है. लोकनीति-सीएसडीएस (सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज) के चुनाव-बाद सर्वे की मानें तो जाटों के बीच कांग्रेस का समर्थन 2019 के लोकसभा चुनाव की तुलना में 33 फीसद से बढ़कर इस साल 64 फीसद हो गया है.
राज्य में 37 सीटें ऐसी हैं, जहां इस खेतिहर समुदाय का समर्थन राजनैतिक दलों के उम्मीदवारों की हार-जीत में निर्णायक होता है. इसे भुनाने के लिए ही कांग्रेस ने जाट बहुल जुलाना निर्वाचन क्षेत्र से ओलंपियन विनेश फोगाट को मैदान में उतारा, जो भारतीय कुश्ती महासंघ (डब्ल्यूएफआइ) के पूर्व अध्यक्ष और भाजपा नेता बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ विरोध प्रदर्शन का प्रमुख चेहरा रही हैं. सूत्रों का दावा है कि इसके लिए हुड्डा ने जोर लगाया था. हुड्डा की वजह से ही कांग्रेस भाजपा के विभिन्न गैर-जाट समुदायों वाले वोटबैंक में सेंध लगाने में सफल रही है.
बहरहाल, भाजपा भी सत्ता विरोधी लहर से उबरने के लिए कड़ी मशक्कत कर रही है, जिसने अपने 41 में से 15 विधायकों के टिकट काट दिए हैं. दूसरी तरफ, कांग्रेस ने अपने सभी 28 विधायकों को मैदान में उतारने की घोषणा की है और उनमें से अधिकतर हुड्डा समर्थक हैं. इनमें राव दान सिंह (महेंद्रगढ़), धर्म सिंह छोकर (समालखा) और सुरेंद्र पंवार (सोनीपत) प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई का सामना भी कर रहे हैं. पंवार सलाखों के पीछे हैं जबकि छोकर के बेटे को हाल में गिरफ्तार किया गया था. वहीं, मम्मन खान (फिरोजपुर झिरका) पर पिछले साल नूंह दंगों में कथित भूमिका के लिए गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम के तहत आरोप लगाए गए हैं. अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि हुड्डा के समर्थन के कारण ही इन सबको पार्टी का टिकट मिला है.
उधर, पूर्व मुख्यमंत्री के आलोचकों का आरोप है कि हुड्डा ने पार्टी के भीतर अपने विरोधियों पर लगाम कसने के लिए हरियाणा के एआइसीसी प्रभारी दीपक बाबरिया से हाथ मिला लिया है. बहरहाल, शैलजा भी प्रदीप चौधरी (कालका) और शमशेर सिंह गोगी (असंध) जैसे अपने समर्थकों के लिए टिकट हासिल करने में कामयाब रही हैं.
शैलजा के अलावा 57 वर्षीय राज्यसभा सांसद रणदीप सुरजेवाला भी हुड्डा के लिए चुनौती बने हुए हैं. चुनाव बाद सीएम की कुर्सी के लिए अपनी दावेदारी मजबूत करने के इरादे के साथ दोनों सांसद अपने-अपने गढ़ उकलाना (हिसार) और कैथल (कुरुक्षेत्र) से चुनाव लड़ने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं. हुड्डा गढ़ी सांपला-किलोई (रोहतक) से मैदान में हैं, वहीं उनके बेटे और लोकसभा सांसद दीपेंद्र सिंह हुड्डा ने भी सियासी माहौल गर्म रखने के लिए चुनाव लड़ने की इच्छा जताई है.
सर्वसम्मति के अभाव में नामांकन की आखिरी तारीख 12 सितंबर तक प्रत्याशी घोषित होते रहे. सुरजेवाला के पुत्र आदित्य को कैथल से और हुड्डा तथा शैलजा के कुछ समर्थकों को भी टिकट मिल गया है. शैलजा को टिकट नहीं मिला लेकिन वे इस बात से राहत महसूस कर सकती हैं कि 2005 में हुड्डा जब रोहतक से सांसद थे तो उन्होंने इस्तीफा देकर मुख्यमंत्री पद संभाला था.

