अगस्त में गुजरात ने औपचारिक रूप से काला जादू और ऐसी अमानवीय प्रथाओं को गैरकानूनी बना दिया. लेकिन मील का पत्थर बने जिस विधेयक ने मानव बलि, क्रूर प्रथाओं के कानून को मुमकिन बनाया उसे अभी एक शुरुआत ही माना जा रहा है.
अश्विन करिया के लिए यह बहुत गर्व का क्षण था. कानून के इस पूर्व प्रोफेसर की गुजरात हाइकोर्ट में दायर जनहित याचिका (पीआइएल) गुजरात मानव बलि और अन्य अमानवीय, क्रूर तथा अघोरी प्रथाओं और काला जादू रोकथाम एवं उन्मूलन विधेयक, 2024 के निर्विरोध पारित होने सबब बनी.
गुजरात-मुंबई तर्कवादी संघ के संस्थापक प्रो. करिया ने बच्चों की दर्दनाक मौत और अन्य क्रूरताओं की वजह बनीं ऐसी अंधविश्वासी प्रथाओं के खिलाफ दो दशकों से अधिक समय तक चलाए गए अभियान के बाद जनवरी में एक जनहित याचिका दायर की थी. छह महीने के भीतर ही सरकार ने ऐसी अमानवीय प्रथाओं पर लगाम कसने के लिए कानून बनाने का वादा किया और दो महीने बाद अगस्त में विधेयक को सर्वसम्मति से मंजूरी मिल गई.
प्रो. करिया ने यह सोचकर राहत की सांस ली कि आखिरकार सरकार ने पहली बार माना कि ये प्रथाएं गैर-कानूनी हैं. लेकिन ग्रामीण लोगों के बीच जागरूकता फैलाने की उनकी चुनौतियां बदस्तूर जारी हैं, जिनमें धार्मिक मान्यताओं के साथ भगवान, अघोरी बाबाओं और जादू-टोना करने वालों के प्रति अगाध अंध आस्था कायम है. गृह राज्य मंत्री हर्ष सांघवी ने विधानसभा में विधेयक पेश करते हुए कहा कि इसका उद्देश्य लोगों को ऐसे ठगों और धोखेबाजों से बचाना है, जो अलौकिक शक्तियों का दावा करते हैं और फिर तकलीफें, भूत-प्रेत, बीमारियां भगाने का झांसा देकर उनके पैसे और जमीन आदि हड़प लेते हैं.
यही नहीं, कई मामलों में बीमारों को डॉक्टरी इलाज नहीं मिल पाता या फिर बच्चों की बलि चढ़ा दी जाती है. मंत्री ने कहा कि यह विधेयक धार्मिक आस्थाओं और अंधविश्वासी कुप्रथाओं के बीच एक स्पष्ट रेखा खींचता है. ऐसे मामलों में छह महीने से लेकर सात साल तक सजा और 5,000 से लेकर 50,000 रुपए तक जुर्माने का प्रावधान किया गया है.
हालांकि, प्रो. करिया का कहना है कि इस कानून में लोगों के बीच जागरूकता फैलाने के लिए आशा कार्यकर्ताओं या व्यापक पैठ वाले अन्य ब्लॉक-स्तरीय अधिकारियों के सरकारी नेटवर्क का इस्तेमाल करने को शामिल नहीं किया गया है. वे कहते हैं, "यह काम अब भी हमारे जैसे तर्कवादी संगठनों के पास ही है." बहरहाल, उनका मानना है कि यह विधेयक स्कूलों, कॉलेजों और सामुदायिक स्तर पर युवाओं की सभाओं आदि में उनके अभियान में मददगार साबित होगा.
साथ ही, उनके सरकार के साथ लगातार जुड़े रहने से जागरूकता की खाई भरती रहेगी. वे कहते हैं, "किसी तकलीफ या बीमारी को दूर करने के नाम पर किसी व्यक्ति या बच्चे की जान लेने के लिए उकसाना या नर बलि देने जैसे गंभीर अपराध को हत्या संबंधी धाराओं के साथ जोड़ा जाना चाहिए, जिसमें बहुत सख्त सजा का प्रावधान है. यही नहीं, कुछ धार्मिक कुप्रथाओं को विधेयक के दायरे में शामिल नहीं किया गया है, इस पर पुनर्विचार की जरूरत है."
वैसे, जादू-टोने जैसी अवैध गतिविधियों में संलिप्त रहने वालों ने इन अमानवीय प्रथाओं को धर्म के साथ जोड़ रखा है, और यही वजह है कि सरकार के लिए इन पर लगाम कसना मुश्किल है. अब, ताजा विधेयक के मामले में ही देखें तो मृत साधु-संतों और धार्मिक उपदेशकों के 'चमत्कारों' के प्रचार-प्रसार को प्रतिबंधित नहीं किया गया है. प्रो. करिया कहते हैं कि जिन दंतकथाओं का वैज्ञानिक आधार नहीं है, जो अंधविश्वास बढ़ाती हैं उन पर रोक लगनी चाहिए. सांघवी ने चतुराई से 'सुस्थापित धार्मिक आस्थाओं' को इतर रखकर जोर दिया कि सरकार इनमें या "ख्यात धर्मगुरुओं और संतों के चमत्कारों" के मामले में कोई दखल नहीं देगी.
गांधीधाम के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. राजेश माहेश्वरी कहते हैं कि उन्होंने ''शरीर पर जले के निशान वाले हजारों बच्चों'' का इलाज किया है. इनमें कुछ बच गए और कुछ को बचाया नहीं जा सका. वे कहते हैं, ''कम से कम कच्छ जिले में तो बच्चों को 'इलाज' के नाम पर लोहे की गर्म छड़ से दागने की प्रथा लगभग बंद हो गई है, लेकिन अन्य अमानवीय कुप्रथाएं जारी हैं.'' हाइकोर्ट में याचिकाकर्ता की पैरवी करने वाले वकील हर्ष रावल, प्रो. करिया के छात्र हैं. उनका सुझाव है, "समाज कभी भी आस्थाओं को पूरी तरह बदलने के लिए तैयार नहीं होगा. कुछ कृत्यों को अमानवीय करार दिया जा सकता है."
कानून में सतर्कता अधिकारी नियुक्त करने का प्रावधान है, जिसका काम अंधविश्वास से जुड़ी आपराधिक घटनाओं को रोकना, ऐसी गतिविधियों का पता लगाना और उन पर कार्रवाई करना है. अब यह जागरूकता सुनिश्चित करनी होगी कि ऐसा कानून है और लोग उसका प्रयोग करें.

