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जम्मू-कश्मीर में अलगाववादियों का चुनाव लड़ना क्या संकेत देता है?

जमात पर 2019 में लगा प्रतिबंध अब भी बरकरार है, मगर केंद्र के साथ कथित गुपचुप बातचीत के बाद चुनावों को लेकर जमात के रुख में नर्मी आई है

कुलगाम विधानसभा क्षेत्र में रोडशो के दौरान जमात सदस्य सयार अहमद रेशी
कुलगाम विधानसभा क्षेत्र में रोडशो के दौरान जमात सदस्य सयार अहमद रेशी
अपडेटेड 20 सितंबर , 2024

कभी आतंकवाद का गढ़ रहे दक्षिण कश्मीर के कुलगाम में बड़ा बदलाव नजर आ रहा है. विधानसभा चुनाव के मौसम में उत्साह का माहौल है. ओधुरा गांव में सुबह की खिली धूप के बीच एक छोटे-से गश्ती दस्ते ने मुख्य सड़क पर उत्सुकता के साथ जुटी भीड़ की सुरक्षा पर पैनी नजर बना रखी है. उन्हें राजनीतिशास्त्र में एमफिल कर चुके 42 वर्षीय सयार अहमद रेशी का इंतजार है, जो कुलगाम से चुनाव मैदान में उतरे प्रतिबंधित जमात-ए-इस्लामी (जेईआइ) के उम्मीदवार हैं. अतीत में बहिष्कार का चलन था, मगर इस बार जमात और हुर्रियत कॉन्फ्रेंस नेताओं समेत करीब दर्जनभर 'अलगाववादी' चुनाव मैदान में हैं. उनमें एक रेशी भी हैं.

'नारा-ए-तकबीर, अल्लाहु अकबर' और 'इंकलाब जिंदाबाद' के आम नारों के बीच रेशी ने अपनी पहली चुनावी तकरीर शुरू की, पर उनकी बयानबाजी भी इस बार अलग थी. रेशी ने बार-बार भारतीय संविधान और उसमें निहित मौलिक अधिकारों का जिक्र किया और कहा, "हम भारत के नागरिक हैं और हमें देश के अन्य नागरिकों के समान ही अधिकार हासिल हैं. बदलाव शुरू हो गया है. मैं बेजुबानों की आवाज बनूंगा, हम साबित कर देंगे कि भारत और लोकतंत्र के प्रति हमसे ज्यादा वफादार कोई और नहीं है." वैसे कहरोटे गांव स्थित रेशी का घर उन ठिकानों में से एक था, जहां फरवरी में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने आतंकी फंडिंग मामले में छापे मारे थे.

अलगाववादियों के चुनाव बहिष्कार के आह्वान के बीच 1996 से कुलगाम सीट का प्रतिनिधित्व भाकपा नेता एम.वाई. तारिगामी करते रहे हैं. रेशी ने यह भी कहा, "हमने (जमात) कभी चुनाव बहिष्कार नहीं किया, मगर हम (1987 में हुई) धांधली का विरोध करते थे. मुझे निर्दलीय चुनाव लड़ने पर बाध्य होना पड़ा. अगर वे (केंद्र) जमात पर प्रतिबंध हटा देते तो हमने अपने खुद के चुनाव चिह्न पर लड़ने की योजना बना रखी थी."

स्वागत हुर्रियत नेता सैयद सलीम गिलानी का 1 सितंबर को अपनी पार्टी में स्वागत करतीं पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती

पाकिस्तान समर्थक जमात और यासीन मलिक के नेतृत्व वाला जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) उन संगठनों में शामिल हैं, जिन्हें फरवरी 2019 में गैरकानूनी गतिविधियों के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया. आतंकवादी संगठन हिज्बुल मुजाहिदीन का वैचारिक चेहरा होने के कारण जमात को तबसे कई बार अपने सदस्यों पर कार्रवाई का सामना करना पड़ा है. मगर 5,000 से अधिक सदस्यों वाली इस पार्टी ने इन मुश्किलों से निबटने के लिए 2022 में एक समिति गठित की. कहा जा रहा कि जमात ने गुपचुप तरीके से नई दिल्ली के साथ बातचीत की, जिसकी मध्यस्थता अपनी पार्टी के प्रमुख अल्ताफ बुखारी ने की, और प्रतिबंध हटने पर चुनावी राजनीति में लौटने की इच्छा जाहिर की.

कश्मीर में यह बदलाव ऐसे ही नहीं आया, इसमें अलगाववादियों पर कार्रवाई समेत कई कारकों की भूमिका रही. सबसे अहम साबित हुआ हालिया लोकसभा चुनाव, जिसमें वोटरों का उत्साह भारी मतदान (58.4 फीसद) के तौर पर सामने आया. यहां 35 साल बाद इतनी बड़ी जनभागीदारी दिखी. इस चुनाव में यहां के पांच लोकसभा क्षेत्रों में 2,400 से अधिक रैलियां हुईं. पहली बार वोट डालने वाले जमात के एक सदस्य ने कहा, "हमें यह मानना होगा कि चुनाव स्वतंत्र एवं निष्पक्ष हुए. बहिष्कार की नीति निरर्थक साबित हुई. अब हम यही चाहते हैं कि कोई ऐसा शख्स हमारा नेतृत्व करे जो हमारा भविष्य बदल सके."

बदलाव हर तरफ दिख रहा है. 1 सितंबर को वरिष्ठ अलगाववादी नेता और तीन दशकों तक हुर्रियत का आधार स्तंभ रहे सैयद सलीम गिलानी पाला बदलकर महबूबा मुफ्ती की पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी में चले गए. उनके मुताबिक, वे "लोगों की सेवा करना और मुख्यधारा की राजनीति का हिस्सा बनना चाहते हैं." वे कहते हैं, ''हुर्रियत की राजनीति की सीमाएं हैं. हम लोगों की समस्याओं का हल नहीं निकाल सकते. पीडीपी में मैं उनकी जरूरतें बेहतर ढंग से पूरी कर पाऊंगा.''

उत्तरी कश्मीर के लंगेट से चुनाव में उतरे नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एनआईटी) से कंप्यूटर साइंस में पीएचडी डॉ. कलीमुल्लाह लोन भी ऐसा ही मानते हैं. वे जेल में बंद सांसद शेख अब्दुल 'इंजीनियर' रशीद के गृह निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे हैं. प्रभावशाली जमात नेता गुलाम कादिर लोन के बेटे कलीमुल्लाह यही चाहते हैं कि कश्मीर के युवा देश के अन्य हिस्सों में युवाओं के साथ प्रतिस्पर्धा करते दिखें. वे कहते हैं कि अगर जमात पर प्रतिबंध हट जाता तो उनके पिता चुनाव लड़ते. 35 वर्षीय लोन का कहना है, "अगर वे (जमात) एक समस्या हैं तो ऐसे प्रावधान भी तो हैं, जिनके तहत समूह को बदलने का मौका दिया जा सकता है."

नीतिगत मामलों से जुड़े एक वरिष्ठ सरकारी अफसर का मानना है कि अगस्त 2019 के बाद "अलगाववादियों का मुख्यधारा में आना जमीनी स्तर पर शासन की मजबूती का संकेत है. उन्हें इसका एहसास हो गया कि हिंसा या पत्थरबाजी लंबे वक्त तक नहीं चल सकती. अशांत दक्षिण कश्मीर में चुनावी राजनीति का बड़ा असर नैरेटिव और धारणा में बदलाव दर्शाने वाली एक बड़ी जीत है."

गांवों में पहली बार वोट डालने वाले कई वोटर जमात के चुनावी राजनीति में आने से खुश हैं. पर कई सवाल भी उठा रहे कि पूर्व में मुख्यधारा के पार्टी कार्यकर्ताओं की हत्या की जिम्मेदारी कौन लेगा? कुलगाम के अदजान गांव में कश्मीर के सूफी संत शेख-उल-आलम की दरगाह के बाहर एक युवा वोटर रेशी के बार-बार यह कहने पर कटाक्ष करता है कि वे एक 'भारतीय नागरिक' हैं. वह युवा कहता है, "वे नहीं चाहते कि हम झूठे लोगों को वोट दें. हम पूछना चाहते हैं कि क्या जमात झूठ नहीं बोल रही थी? पहले वे 'कश्मीर बनेगा पाकिस्तान' का राग अलापते थे. अब जब उन्हें लगता है कि (प्रधानमंत्री) मोदी ताकतवर हैं तो वे उनकी कतार में खड़े होने की कोशिश कर रहे हैं."

- मोअज्जम मोहम्मद, कुलगाम में

 

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