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भूमि घोटाला मामले में घिरे कर्नाटक सीएम सिद्धारमैया के लिए आगे क्या रास्ता?

मुख्यमंत्री सिद्धारमैया का कहना है कि इन आरोपों का मकसद उनके चार दशक के 'बेदाग' सियासी करियर को कलंकित करना है

बेंगलूरू में 22 अगस्त को कांग्रेस विधायकों की बैठक के दौरान मुख्यमंत्री सिद्धरामैया और उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार
बेंगलूरू में 22 अगस्त को कांग्रेस विधायकों की बैठक के दौरान मुख्यमंत्री सिद्धरामैया और उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार
अपडेटेड 16 सितंबर , 2024

कर्नाटक में कथित 'भूमि घोटाला' मुख्यमंत्री सिद्धरामैया के लिए चुनौती बन गया है. विपक्षी दल भाजपा और जनता दल (सेक्युलर) उन्हें पद से हटाने की मांग पर अड़े हैं. इस बीच, सत्तारूढ़ कांग्रेस भी मई 2023 में सत्ता में आने के बाद पहली बार पूरी आक्रामकता के साथ इस संकट से उबरने के लिए एकजुट दिख रही है.

अगस्त के शुरू में परस्पर विरोधी अभियानों के कारण सत्ता पक्ष और विपक्ष की सियासी दुश्मनी खुलकर सामने आ गई. सिद्धरामैया को असली झटका 16 अगस्त को लगा जब कर्नाटक के राज्यपाल थावर चंद गहलोत ने मैसूर शहरी विकास प्राधिकरण (एमयूडीए) में अनियमितताओं के आरोपों पर मुख्यमंत्री के खिलाफ जांच और मुकदमा शुरू करने संबंधी याचिकाओं को मंजूरी देने का फैसला किया.

सिद्धरामैया ने राज्यपाल के आदेश को 'गैर-कानूनी और अमान्य' घोषित करने की मांग वाली एक याचिका के साथ 19 अगस्त को कर्नाटक हाइकोर्ट का रुख किया. उस याचिका में कहा गया कि पूरे मामले पर मंत्रिपरिषद की सलाह को दरकिनार कर मुकदमा चलाने की मंजूरी संबंधी आदेश जारी किया गया. यह भी कहा गया कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17ए के तहत ऐसी मंजूरी की निर्धारित प्रक्रियाओं की अनदेखी की गई है. हाइकोर्ट ने 29 अगस्त को सीएम की याचिका खारिज कर दी.

गहलोत ने यह फैसला सामाजिक कार्यकर्ताओं टी.जे. अब्राहम तथा स्नेहमयी कृष्णा और जद (एस) के कानूनी प्रकोष्ठ के अध्यक्ष प्रदीप कुमार की याचिकाओं पर सुनाया. इनमें एमयूडीए भूखंड आवंटन में अनियमितताओं, खासकर 2021 में सिद्धरामैया की पत्नी पार्वती को मैसूरू के विजयनगर के तीसरे और चौथे चरण के पॉश इलाकों में 14 आवासीय भूखंड आवंटित किए जाने का मुद्दा उठाया गया. राज्यपाल गहलोत ने अपना रुख जाहिर करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के 2004 के एक फैसले (मध्य प्रदेश पुलिस प्रतिष्ठान बनाम मध्य प्रदेश सरकार) का हवाला दिया और कहा कि "प्रथम दृष्ट्या उन्हें यही लगता है कि आरोप और उसके संबंध में पेश सामग्री अपराध होने का खुलासा करती है."

सिद्धरामैया के खिलाफ करीब तीन दशक के दौरान 3.16 एकड़ कृषि योग्य भूमि से जुड़े घोटाले में शामिल होने का आरोप है, जो मूलत: 1992 में आवासीय भूखंड के तौर पर विकसित करने के लिए एमयूडीए की ओर से अधिग्रहण के लिए अधिसूचित भूमि का हिस्सा थी. सवालों के घेरे में आए इस भूखंड को छह साल बाद गैर-अधिसूचित कर दिया गया था. 2004 में यह भूखंड पार्वती के भाई बी.एम. मल्लिकार्जुनस्वामी ने खरीदा, फिर 2010 में बतौर भेंट उनके नाम कर दिया. सिद्धरामैया का तर्क है कि उनकी पत्नी ने यह जानने के बाद कि मौजूदा आवासीय लेआउट बनाने के लिए प्राधिकरण ने उनकी संपत्ति पर अतिक्रमण किया है, एमयूडीए के समक्ष याचिका दी. फिर, 2021 में जब कर्नाटक में भाजपा सरकार थी तो एक मुआवजा योजना के तहत उन्हें 14 आवासीय भूखंड देने का फैसला किया गया.

मुख्यमंत्री का कहना है कि इन आरोपों का मकसद उनके चार दशक के 'बेदाग' सियासी करियर को कलंकित करना है. 22 अगस्त को मुख्यमंत्री ने पार्टी विधायकों का समर्थन जुटाने के लिए बेंगलूरू में कांग्रेस विधायक दल की बैठक बुलाई. उसके बाद वे और उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार पार्टी आलाकमान को पूरे घटनाक्रम से अवगत कराने दिल्ली रवाना हुए. 23 अगस्त की बैठक के बाद कांग्रेस महासचिव रणदीप सुरजेवाला ने दावा किया कि भाजपा और जद (एस) ने निर्वाचित सरकार को 'अस्थिर' करने की कोशिश के तहत 'कठपुतली राज्यपाल' के जरिए 'सुनियोजित हमला' किया. सुरजेवाला ने कहा, "यह पिछड़े वर्ग के एक मुख्यमंत्री पर भी हमला है, जो अब देश के सबसे वरिष्ठ मुख्यमंत्रियों में शुमार हैं."

सिद्धरामैया सरकार भी अब इसी तर्ज पर विपक्ष को जवाब देने में जुटी है. 22 अगस्त को मंत्रिपरिषद ने विपक्षी नेताओं के खिलाफ मुकदमे की मंजूरी मांगने संबंधी ऐसी ही लंबित याचिकाओं पर राज्यपाल को 'सहायता और सलाह' प्रदान करने का निर्णय लिया. कानून मंत्री एच.के. पाटील का कहना है कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए और 19 से संबंधित चार प्रमुख याचिकाएं गहलोत के समक्ष लंबित हैं. इनमें नवंबर, 2023 में लोकायुक्त का एक आवेदन शामिल है, जिसमें जद (एस) नेता और केंद्रीय मंत्री एच.डी. कुमारस्वामी के खिलाफ श्री साई वेंकटेश्वर मिनरल्स नामक फर्म को खनन पट्टा देने से संबंधित भ्रष्टाचार के मामले में आरोपपत्र दाखिल करने की मंजूरी मांगी गई है.

यह 2007 में उनके मुख्यमंत्री पद पर रहने के दौरान का मामला है. इसके अलावा, भाजपा विधायक शशिकला जोले, जी. जनार्दन रेड्डी और पूर्व विधायक मुरुगेश नीरानी के खिलाफ मुकदमे की मंजूरी संबंधी याचिकाएं लंबित हैं. पहली याचिका दिसंबर, 2021 की है, तो अन्य दोनों याचिकाएं क्रमश: मई और फरवरी, 2024 में दायर हुई थीं.

कुमारस्वामी ने जवाब में कहा कि सरकार के घोटालों को उजागर करने के कारण उन्हें निशाना बनाया जा रहा है. 21 अगस्त को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने दलील दी कि कांग्रेस ऐसे मामले को आगे बढ़ा रही है जिसमें 'कोई दम नहीं' है. उन्होंने सवाल उठाया, ''आखिर (लोकायुक्त) विशेष जांच दल को जांच करने में कितना वक्त लगता है?'' उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने 2016 के आदेश में तीन महीने में जांच पूरी करने को कहा था. दूसरी ओर, पाटील ने सियासी बदले का आरोप खारिज करते हुए कहा कि कैबिनेट ने यह कदम इसलिए उठाया ताकि जिन मामलों में जांच हुई है, उनमें कार्रवाई सुनिश्चित हो सके. उन्होंने एक प्रेस ब्रीफिंग में कहा, ''सिद्धरामैया के मामले में एक निजी शिकायत थी और कोई जांच नहीं हुई है. इसमें एक बड़ा अंतर है.'' बहरहाल, जैसे-जैसे कर्नाटक में सियासी पारा चढ़ेगा, आरोप-प्रत्यारोप और तेज होंगे.

- अजय सुकुमारन

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