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छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग पर क्यों लग रहे हैं धांधली के आरोप?

सीबीआई ने अपनी जांच के बारे में चुप्पी साध रखी है लेकिन शिकायतकर्ता घोटाले में कोचिंग सेंटरों की भूमिका की ओर इशारा करते हैं

रायपुर के पीएससी मुख्यालय में जुलाई 2022 को भर्ती घोटाले के खिलाफ प्रदर्शन करते भाजपा नेता गौरी शंकर श्रीवास
रायपुर के पीएससी मुख्यालय में जुलाई 2022 को भर्ती घोटाले के खिलाफ प्रदर्शन करते भाजपा नेता गौरी शंकर श्रीवास
अपडेटेड 16 सितंबर , 2024

पूजा खेड़कर मामला अभी लोगों के दिमाग से पूरी तरह उतरा भी नहीं था कि एक और भर्ती घोटाला भारत की विशिष्ट सेवाओं की नींव हिलाता नजर आया. दरअसल, केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने हाल में छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (सीजीपीएससी) के पूर्व पदाधिकारियों और कुछ अन्य लोगों के परिसरों पर छापे मारे. यह कार्रवाई पिछले साल मई में राज्य में सामने आए कथित भर्ती घोटाले के सिलसिले में की गई.

सीबीआई ने राज्यभर में 16 जगहों पर छापे मारे, जो एक महीने के भीतर उसका दूसरा अभियान था. एजेंसी सूत्रों के मुताबिक, छापे के दौरान पर्याप्त इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य जब्त किए गए, जिन्हें परीक्षण के लिए लैब भेजा गया है. आखिर यह घोटाला क्या है?

मई 2023 में सीजीपीएससी ने 2021-22 में आयोजित सिविल सेवा परीक्षा के परिणामों की घोषणा की. इस पर जब बारीकी से नजर डाली गई तो पता चला कि ऊंची रैंकिंग के साथ सफल अभ्यर्थियों में सीजीपीएससी अधिकारियों के कई रिश्तेदार भी शामिल हैं, जिससे भर्ती परीक्षा में भाई-भतीजावाद के आरोप लगे.

तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने तो इस कथित धांधली के आरोपों की जांच से इनकार कर दिया लेकिन भाजपा ने वादा किया कि अगर वह सत्ता में आई तो सीबीआई जांच कराएगी. नई सरकार बनने के बाद फरवरी में राज्य की आर्थिक अपराध शाखा ने मामला अपने हाथ में ले लिया और फिर सरकार से इसे सीबीआई को सौंपने को कहा. जुलाई मध्य में एजेंसी ने तत्कालीन सीजीपीएससी अध्यक्ष और पूर्व आईएएस अधिकारी तमन सिंह सोनवाने, सचिव जे.के. ध्रुव और परीक्षा नियंत्रक आरती वासनिक के खिलाफ मामला दर्ज किया. मामला दर्ज किए जाने के बाद सोनवाने, ध्रुव और कांग्रेस नेता राजेंद्र शुक्ल सहित कई लोगों के परिसरों की तलाशी ली गई.

सोनवाने जब सीजीपीएससी अध्यक्ष थे, उसी दौरान उनके बेटे का डिप्टी कलेक्टर और बहू का दूसरे पद पर चयन हुआ. भतीजा पुलिस उपाधीक्षक (डीएसपी) बना और भतीजियां श्रम अधिकारी और जिला आबकारी अधिकारी पद पर चयनित हुईं. वहीं, ध्रुव के बेटों का चयन भी सहायक वन संरक्षक (एसीएफ) और डीएसपी के पदों पर हुआ. इस मामले में राजेंद्र शुक्ल के अलावा एक अन्य कांग्रेस नेता सुधीर कटियार भी जांच के घेरे में हैं. कटियार की बेटी और दामाद तथा शुक्ल की बेटी के चयन की जांच हो रही है. एक अन्य पूर्व आइएएस अधिकारी अमृत खलको और एक डीआईजी रैंक के आईपीएस अधिकारी के बच्चों के चयन की भी जांच जारी है.

दिलचस्प बात यह है कि जून 2023 में भर्ती घोटाला सामने आने के कुछ ही हफ्तों बाद सीजीपीएससी बाकायदा एक निविदा जारी करके उत्तर पुस्तिकाएं नष्ट कराना चाहता था, जिसमें उन वर्षों की उत्तर पुस्तिकाएं भी शामिल थीं, जब कथित लाभार्थियों का चयन हुआ. हालांकि, विरोध के बाद निविदा को वापस ले लिया गया.

हालांकि, सीबीआई ने अपनी जांच के बारे में चुप्पी साध रखी है लेकिन शिकायतकर्ता घोटाले में कोचिंग सेंटरों की भूमिका की ओर इशारा करते हैं. उनकी राय में, हो सकता है कि बहुविकल्पीय परीक्षाओं में कुछ प्रश्न चयनित उम्मीदवारों को लीक किए गए हों, और निबंध-आधारित उत्तरों के लिए गुप्त स्थानों पर विशेष कोचिंग दी गई हो. घोटाला उजागर करने वाले भाजपा नेता गौरीशंकर श्रीवास कहते हैं, "भूपेश बघेल जब मुख्यमंत्री थे तब सोनवाने उनके सचिवालय में थे. उन्हें पीएससी अध्यक्ष नियुक्त करने का क्या कारण था? 2020-22 से पहले भी कुछ गलत काम हुए हैं, जिन्हें जांच में शामिल किया जाना चाहिए."

इस बीच, छत्तीसगढ़ हाइकोर्ट ने आदेश दिया कि संदिग्ध उम्मीदवारों को सेवा में शामिल होने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए. डिप्टी कलेक्टर, डीएसपी और एसीएफ राज्य के सिविल सेवक हैं. लेकिन सेवा वर्षों की संख्या सहित कुछ मानदंडों को पूरा करने के बाद आईएएस, आईपीएस और भारतीय वन सेवा (आईएफएस) जैसे शीर्ष पदों पर पहुंचने के पात्र होते हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो कई डिप्टी कलेक्टर, डीएसपी और एसीएफ राज्य सेवा में कुछ वर्षों के बाद आईएएस, आईपीएस और आईएफएस अधिकारी बन जाते हैं.

कांग्रेस प्रवक्ता सुशील आनंद शुक्ल कहते हैं, "सीबीआई जांच भाजपा के दुष्प्रचार का हिस्सा है. कांग्रेस नेता किसी भी घोटाले में शामिल नहीं हैं. कांग्रेस नेताओं के बच्चे भी परीक्षा दे सकते हैं और अपनी योग्यता के आधार पर उन्हें पास कर सकते हैं. पूर्व अध्यक्ष के रिश्तेदारों के चयन के संबंध में पार्टी सीबीआई जांच का स्वागत करती है और चाहती है कि एजेंसी सचाई का पता लगाए."

बहरहाल, इस पूरे घटनाक्रम से छत्तीसगढ़ में सिविल सेवा परीक्षा देने वाले अभ्यर्थी निराश महसूस कर रहे हैं. रायपुर के रहने वाले केशव साहू कहते हैं, "इतने महीनों के बाद भी पीएससी के किसी अधिकारी को जवाबदेह नहीं ठहराया गया. मैंने छह बार पीएससी सिविल सेवा परीक्षा दी और तीन बार मुख्य परीक्षा दी. चयन प्रक्रिया को लेकर संदेह के कारण मैंने परीक्षा देना ही छोड़ दिया है. अब मैं रियल एस्टेट क्षेत्र में काम कर रहा हूं."

साहू और उनके जैसे कई अन्य लोगों का इन परीक्षाओं पर भरोसा फिर से बहाल करना सीबीआई पर निर्भर है.

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